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  • भुरभुरी मिट्टी कठोर चट्टान 
  • भुरभुरी मिट्टी कठोर चट्टान 

     

    —चौं रे चंपू! नयौ साल कैसै मनायौ?

    —एक जनवरी को दोपहर बाद अचानक आपकी बहूरानी में नई-सी लहर आई, ‘आज कोई फ़िल्म देखेंगे’। ‘बुकमाईशो’ ऐप ने बताया कि दिल्ली और एनसीआर के लगभग सारे सिनेमा हॉलों में सिर्फ़ एक फ़िल्म चल रही है, ‘दंगल’। आमिर ख़ान के बारे में मैं जानता हूं कि वे किसी भी विषय पर गहराई से शोध करने के बाद ही उसके निर्माण में लगते हैं। हरियाणा प्रांत को जहां एक ओर बालिकाओं के हंता-प्रदेश के तौर पर जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसी प्रांत की बेटियों ने खेल-जगत में सर्वोच्च स्थान बनाए हैं। बेटियों को बचाना और उन्हें पढ़ाना, इस प्रांत की प्राथमिक आवश्यकता है। महावीर फोगाट का नाम सुना है?

     

    —हमें पतौ ऐ फोगाट की कहानी। फिलम की बता!

     

    —क्या अद्भुत गाने थे। ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है।’ ‘हानिकारक’ शब्द सुनकर बड़ा आनंद आया। ‘ऐसी धाकड़ है, धाकड़ है ऐसी धाकड़ है, तन्नैं चारूं खाने चित्त कर देगी, सब पुर्जे फिट कर देगी।’ हरियाणा की पृष्ठभूमि में, एक सरल हास्य-बोध के साथ, सारे गीतों नृत्यों का अच्छा फ़िल्मांकन किया है। दो धाकड़ कन्याओं की सच्ची कहानी में नाटकीयता के रंगों से भरी विजयगाथा देखकर, तबीयत प्रसन्न हो गई और आमिर खान को कसकर गले लगाने का मन किया। फ़िल्म के समापन पर मन अखाड़े की कच्ची मिट्टी जैसा भुरभुरा हो रहा था। हॉल से निकले तो सामने ‘हार्ड रॉक’ कैफे था। यहां अंग्रेज़ीदां सम्पन्न युवाओं का पाश्चात्य संगीत से भरपूर क्रीड़ामंच था। कहां भुरभुरी मिट्टी वाला देसी हरियाणा और कहां अंग्रेज़ी की ‘कठोर चट्टान’ पर दारू परोसते, खाना खिलाते हुए श्यामवस्त्रधारी वेटरनुमा युवा लड़के-लड़कियां। कुल मिलाकर पच्चीस मीटर के व्यास में एक ओर हरियाणा के देसी सांग देसी ठुमके और दूसरी ओर वेस्टर्न सॉंग विदेशी ठुमके। यहां अगर कोई हिंदी बोल दे तो समझिए कि वह भारत का नागरिक ही नहीं है। अचानक वेटर काउंटर पर चढ़कर नाचने लगे। देखा-देखी ग्राहक भी नाचने लगे।

    —अरे लल्ला! संस्कृती कोई होय, नृत्य तौ पइसा करै! आमिर नैं ऊ तौ ढाई सै करोड़ कमाय लए, छै ई दिना में!

     

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