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    —चौं रे चम्पू! आज तीन अगस्त ऐ, दावत पै घर चौं नायं बुलायौ?

    —हम लोग दिल्ली में नहीं हैं चचा! बच्चापार्टी हमारी शादी की चालीसवीं सालगिरह बाली में मना रही है। वैसे ऐसा अभी तक नहीं हुआ कि तीन अगस्त के दिन आपको और अपने परिजनों को आलू-पूरी, दही-बड़ा और हलुआ-रायते की पंगत में न बिठाया हो।

    —अरे वाह! मजे करौ बाली में! पर दावत की चीजन कौ क्रम तौ सही कल्लै! हलुआ-पूरी, आलू, मटर-पनीर, कासीफल, दही-बड़ा, रायतौ, मूलीकस, धनिया पुदीना की चटनी और घेवर-रसगुल्ला। तेरी दावत की एक-एक चीज याद ऐ। अब तू पिछले चालीस साल कौ कछू तौ बता!

    —हर पड़ाव से आप परिचित हैं, कब जनपथ से मन के राजपथ पर आ गया और कब राजपथ से मन के जनपथ। दावत के व्यंजनों जैसी ही होती है ज़िन्दगी। बीच में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे अनुभव न हों तो मीठे का महत्त्व कहां रहता है। काका हाथरसी जी मेरे पापा राधेश्याम प्रगल्भ जी को बेटा कहा करते थे। विजातीय होने के बावजूद दोनों को कोई दिक्कत नहीं थी। काका ने पापा को पोस्टकार्ड पर एक दोहा लिखकर भेजा था, ‘जाने कब हो जाय क्या, भली करेंगे राम। काका के समधी बने, बेटा राधेश्याम।’ दहेज-विरोधी पिताजी ने भी एक दुमदार दोहा लिख भेजा, ‘घड़ी सुहानी आ गई, काका का आशीष। जल्दी परिणय-पर्व हो, कहें झुकाकर शीश। प्यार देना-लेना है, न कुछ ‘लेना देना’ है।’ तीन अगस्त सन छियत्तर को दरियागंज के हिंदी पार्क की एक घर्मशाला में हुई थी शादी। मैं तो कोर्ट-मैरिज करना चाहता था, पर आपकी लाली नहीं मानी। फिर भी कुल सात हज़ार के बजट में हो गई पारंपरिक लीला। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी ने जगह दिलवाई थी। पिताजी ने अपने हस्तलेख में कार्ड बनाया। श्राद्धों के दिनों में अध्यापक साथी राधेश्याम पाठक जी ने जीवन में पहली और अंतिम बार विवाह के मंत्र पढ़े थे। घोड़ी, बैंड-बाजे और आतिशबाजी सब कट। मेरे एक नाना पं. ब्रह्मदत्त शर्मा ने सारे प्रबन्ध कराए। जामिआ मिल्लिआ और दिल्ली विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ साथी आए। पहले बीस साल निकल गए घरौंदा बनाने और बच्चों के लालन-पालन में। अगले बीस साल जीवन-मंच के संचालन में। चालीसवीं सालगिरह बच्चे मना रहे हैं बाली में। खुश है आपका चम्पू और प्रसन्नता है आपकी लाली में। प्यार आपस में बाँटा है। पूल में केक काटा है। बाक़ी बातें लौटने पर।

    wonderful comments!

    1. पवन पाल अक्टूबर 16, 2016 at 8:56 पूर्वाह्न

      सही पकडे़ हो !

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