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  • पूछो फलानों-ढिकानों से 
  • पूछो फलानों-ढिकानों से 

     

     

     

    —चौं रे चंपू! मोबाइल में का देखि रह्यौ ऐ?

     

    —वाट्सऐप पर एक वीडियो दसवीं बार आया है, पहली बार देख रहा हूं। इसमें दिखाया है कि हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा के अध्यापकों और प्रधानाचार्यों की ज्ञान-दशा क्या है! रिपोर्टर पूछता है अमुक प्रांत की राजधानी कहां है? अब मान लीजिए अध्यापक जम्मू-कश्मीर की राजधानी लखनऊ बता दे! तो आप हंसेंगे! लेकिन वह जहां रहता है, वही उसका जिला है, प्रांत है, देश है,  और इस नाते अगर वह उत्तर प्रदेश का है तो लखनऊ ही बताएगा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री कौन हैं? अध्यापक मौन है। रिपोर्टर कहता है, ‘भूल गए क्या?’ अध्यापक सहमति में सिर हिलाते हैं या अपनी सही समझ से ग़लत उत्तर देते हैं। ऐसा वीडियो देखकर आपको सही ही लगेगा कि शिक्षा के मामले में भारत एक अत्यंत पिछड़ा देश है। फिर ऐसे अज्ञानी, अकर्मण्य और अयोग्य अध्यापकों को हटा दें क्या? जिन अध्यापकों को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता हो, जिन्हें मध्याह्न भोजन के लिए गैस, तेल, लकड़ी, कंडे का इंतज़ाम करना हो, जिन्हें वोटर लिस्ट के लिए लगा दिया जाता हो, जनगणना के काम के लिए भगा दिया जाता हो, जो पल्स पोलियो दवा पिलाने के लिए भूखे-प्यासे घर-घर घूमते हों, ऐसी स्थिति में उन्हें सिर्फ़ नानी का नाम याद रहेगा। पत्नी, पिता और बच्चों के नाम भी भूल जाएंगे। बकौल माणिक वर्मा ‘अध्यापक को अगर पांच सौ रुपल्ली तनख्वाह मिलेगी, तो गंगा बंगाल की खाड़ी में नहीं, भोपाल के ताल में ही गिरेगी’। मैं भी अपनी कुछ पंक्तियां सुना दूं?

     

    —सुना-सुना!

     

    —माना कि ज्ञान दिग्दिगंत है, पर मत कहो कि अनंत है। अनंत तो अज्ञान है, ज्ञान तो प्रायः मनगढ़ंत है। अगर अध्यापकगण इस बात पर मौन हैं, कि देश के प्रमुख ठिकाने और फलाने-ढिकाने कौन हैं, उनकी जानकारियां शून्य हैं, आधी हैं या पौन हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी उन्हीं ठिकानों पर है जाने-अनजाने, जहां रहते हैं इस देश के वे फलाने-ढिकाने। पत्रकार महोदय सवाल पूछना है तो उन ठिकानों पर जाकर फलानों से पूछो, देश में अध्यापक कौन हैं ढिकानों से पूछो!

     

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