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    –चों रे चम्पू! ब्रजभूमी में मैटरो चलन लगि जायं तौ वामैं अलाउंसमिंट कैसै करिंगे? बताय सकै?

     

    –आपने ज़रूर कहीं न कहीं से कुछ सुना है, तभी पूछ रहे हैं।

     

    –तैनैं बात पकरि लई। पर मैंनैं अपईं तरफ ते जोड़-घटाय कै लिखी ऐ, सुन! राधे राधे! जे मथरा मैटरो ऐ, जामैं आप सबन कौ स्वागत ऐ! अगलौ टेसन धौली प्याऊ कौ ऐ। दरवज्जा उल्टे हाथ माऊं खुलिंगे। जिनकूं होली दरवज्जे की बेढ़ईं या संकर हलवाई कौ मीठौ लैनौ होय, यईं पै फट्टसीना उतरि जायं। जाके बाद मैटरो सीदी टैंक चौराए पै रुकैगी। दरवज्जान ते चिपकबे की जरूलत नाएं, फंसि गए तौ तुमाई जान कौ और हमाए माल कौ नुक्सान है जायगौ। गुटका खाइबे की और बीड़ी ऐ पीबे की तौ सोचियौंऊं मती, नईं तौ पान्सै ते तिलक है जायगौ। अगाड़ी के दो डब्बा औरतन कूं ऐं, उन डब्बन में कोई लपका पकरौ गयौ तौ तबीअत ते खातिद्दारी है जायगी। धक्का-मुक्की करियौं मती, बड़े-बूढ़ेन कूं पैलै जगै दइयौं! ईमानदारी ते टिकट लैकै चलिबे कौ काम है। जादा हुसियारी करी तौ कैमरा लगि रए ऐं, जो पकरौ जायगौ, जेल के जंगला की हवा खायगौ। राधे राधे!

     

    –वाह चचा वाह, कमाल कर दिया। आपको तो दो-तीन दिन पहले जयपुर में होना चाहिए था।

     

    –जयपुर में का भयौ?

     

    –जयपुर लाफ्टर फेस्टिवल। वहां तुम्हारे चम्पू को भी बुलाया गया था। पहले तो सोचा कि शायद मैं वहां ‘ऑड मैन आउट’ सिद्ध हो जाऊंगा, सहज हास्यकार तो हूं नहीं। हंसाना टेढ़ा काम है, मुझे बहुत नहीं आता। हालांकि थोड़ी-बहुत प्रत्युत्पन्नमति और निरीक्षण की क्षमता है। हास्य का शास्त्रज्ञ भी हूं। हास्य का पक्षधर हूं, इस नाते जा भी सकता हूं। सो चला गया। वहां मुझे ‘स्टैंडिंग ओवेशन’ के रूप में श्रोताओं का जो प्यार मिला चचा, मैं तो उपकृत हो गया। दो दिन तक चला मेला। वहां एक हास्य-ग्राम बनाया गया था। हास्य पर गंभीर बातें भी हास्य में ही हो रहीं थीं। भारत के लाफ्टर शोज़ में आने वाले फ़िल्म और टी.वी. के ख्यातनाम पच्चीस-तीस हास्यकर्मी इकट्ठा हुए थे। राजू श्रीवास्तव, शक्ति कपूर, राकेश बेदी, नावेद जाफ़री, सुनील ग्रोवर गुत्थी, उपासना सिंह बूआ, रासबिहारी गौड़, ख़्याली, राजीव निगम, संजय झाला को तो आप जानते होंगे। और भी बहुत थे।

     

    –तैनैं का कियौ व्हां पै?

     

    –उन्होंने कुछ सत्र रखे थे, समाज में हास्य की भूमिका और योगदान, हास्य का भविष्य, पति, पत्नी, परिवार और हास्य, प्रादेशिक हास्य, पत्रकारिता और साहित्य में हास्य, फैशन, ग्लैमर और हास्य, टीवी और फिल्म में हास्य का स्तर। कविसम्मेलन और हास्य का कोई सत्र नहीं था। शायद आयोजकों ने मान लिया था कि अब हास्य कविसम्मेलन और लाफ्टर शोज़ में ख़ास अंतर नहीं रह गया है। मुझे जिस सत्र में बोलना था उसका शीर्षक था ज़िन्दगी के खिलखिलाते पल। मेरे साथ राकेश बेदी, ख्याली, बनवारी झोल, सुरेन्द्र यादवेन्द्र, हरविन्दर मांक्कर और राजीव कौल थे। मैंने सोचा हास्य पर कोई गंभीर चर्चा होगी, पर सभी वहां हास्य के टोटकों का इस्तेमाल कर रहे थे। ख्याली ने अच्छी हाज़िरजवाबी दिखाई। मेरे और राकेश बेदी के साथ प्रश्नोत्तर काल भी अच्छा रहा।

     

    —तू अपनी बता।

     

    —हास्य के बारे में मेरे सारे दृष्टिकोण आप जानते हैं। मैंने कहा कि ह्यूमर फ़ॉर द सेक ऑफ़ ह्यूमर न हो, ह्यूमर फ़ॉर द सेक ऑफ़ ट्यूमर हो। समाज में बहुत तरह के ट्यूमर हैं, ह्यूमर अपने कोमल पंख से उनका ऑपरेशन कर सकता है। सब मानते हैं कि हंसना एक ईश्वरीय वरदान है, जो सिर्फ़ मनुष्य को मिला है, लेकिन सवाल यह है कि किस मनुष्य को मिला है? फ्रांस में चार्ली हेब्दो से जुड़े लोगों और पेशावर में बच्चों की नृशंस हत्या करने वाले भी अट्टहास कर रहे हैं। अपनी एक कविता ’हंसी चीज़ करामाती’, के उद्धरणों से हंसी के प्रकार बताए। रात में सम्मान की पगड़ी पहनी, शॉल, प्रशस्ति-पत्र लिए और सार्वजनिक रूप से एक सलाह देकर चले आए।

     

     

    —का सलाह दई?

     

    —जेएलएफ़ जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल के नाम से जाना जाता है, आपने भी जेएलएफ़ रख लिया, जयपुर लाफ़्टर फेस्टीवल। हो सके तो बदलिए। लाफ़्टर की जगह ह्यूमर या कॉमेडी रख कर जेएचएफ़ या जेसीएफ़ कर लीजिए। गूगल पर किसी ने जेएलएफ़ ढूंढा तो आप सौवें पेज पर चले जाएंगे। आयोजक मित्रोदय गांधी, सोमेन्द्र शर्मा और एकेश पार्थ ने कहा कि इस पर पुनर्विचार करेंगे।

     

    —तू अनचाही सलाह मत दियौ कर!

     

     

    wonderful comments!