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    —चौं रे चम्पू! कल हिन्दी दिवस ऐ, का तैयारी ऐ?

    —चचा, हिन्दी की बात मत करो! अभी ऐसी सभा से चला आ रहा हूं, जहां सब हिन्दी जानते थे, सब अंग्रेज़ी भी जानते थे पर सब अंग्रेज़ी बोल रहे थे। अध्यक्ष महोदय जब गंभीर बात करते थे तो अंग्रेज़ी में बोलते और जब उनका मन हल्की-फुल्की बात करने का होता था और चेहरे पर मुस्कान और आंखों पर चमक होती थी और ख़ूबसूरती अचानक बढ़ने लगती थी तब उनके मुंह से हिन्दी झरती थी। लेकिन अचानक कोई सांस्कृतिक कलावंत अंग्रेज़ी में अनौपचारिक होने की कोशिश करते हुए लगभग याद दिला देता था, अरे! अध्यक्ष महोदय आप क्या कर रहे हैं, गंभीरता न छोड़िए तो अध्यक्ष महोदय वापस अंग्रेज़ी की रंगरेज़ी के शिकार के हो जाते थे।  गंभीर मुद्दे और गंभीर अंग्रेज़ी और हिन्दी खुश कि थोड़ा सा सही पर मौका तो दिया अध्यक्ष महोदय ने। सभा में जब सारे लोग आपस में खुसर-पुसर करते थे तो हिन्दी में लेकिन जैसे ही अध्यक्ष महोदय को संबोधित करते थे तो मुखारबिंद से अंग्रेज़ी फूटती थी और गोली की तरह छूटती थी और हिन्दी गोली के खोल में छिप जाती थी।

    —तू बरौ हिन्दी बाला बने ऐ तौ तू कैसे खोल में घुस गयौ?

    —चचा, हिन्दी बोलने वालों ने अपनी भद्द खुद पिटा रखी है। उनके बारे में यह धारणा बन गई है कि यह लोग आवश्यकता से अधिक और अनर्गल बोलते हैं। बात गंभीर तभी मानी जाएगी जब अंग्रेज़ी में बोले जाएगी क्योंकि सुगठित होगी, बिंदूवार होगी, क्रिस्प होगी। और हिन्दी चिप्स के चूरे की तरह बिखर जाएगी और ठोस ठायं-ठायं नहीं कर पाएगी इसलिए अंग्रेज़िदां लोग सिर्फ हिन्दी बोलने वालों से डरते हैं। वे समझते हैं कि अच्छी राय देने की जगह यह रायता फैला देगा। जब उसकी बोलने की बारी आती है तो सब घबराते हुए पिंड छुड़ाने की मुद्रा बनाते हुए उसे हतोत्साहित करते हैं। कहते हैं कि समय बहुत हो चुका है कि लंच का समय होने वाला है, मीटिंग जल्दी खत्म करनी है।

    —जा का मतलब ऐ कि तू कछू बोल नाय पायौ।

    —चचा, हालांकि मुझे संक्षेप में राय देनी थी रायता नहीं फैलाना था। पर मैंने यह देखा कि हिन्दी की खाने वाले और बाहर की दुनिया में हिन्दी-हिन्दी गाने वाले और हिन्दी का हरा चोला पहन कर, हिन्दी के खिचड़ी बाल बढ़ाकर उसमें घी अंग्रेज़ी का ही डालते हैं। भरी सभा में हिन्दी में कोई नहीं टोक सकता। हिन्दी के विद्वान में चार बार अंग्रेज़ी बोलकर अपना सिक्का जमा लिया। एक हिन्दी के परम विद्वान मौन बैठे रहे कि कौन बोले। जब विद्वान माने ही जा चुके है तो बोलने न बोलने से फर्क क्या पड़ता है। समझदार थे। हिन्दी बोलकर, पंगा ले कर नंगा क्यों हुआ जाए। हिन्दी पर कभी-कबार नहीं सदैव आरूढ़ रहने वाले थोड़ी सी गूढ़ अंग्रेज़ी बोलकर दो हिन्दी वालों को मूढ़ सिद्ध कर चुके थे। उनकी आत्मा में परम आत्म आंग्ल संतोषअभिभूत थी।

    —तेरौ का भयौ , तू बोलौ के नाय?

    —चचा, तुम्हारा पट्ठा हूं, अंग्रेज़ी के अखाड़े में पिट कैसे आता। अपनी बात फिट करके माना और हिट भी हो गई।

    —का बौलो जे बता?

    —मैंने बोलने के लिए हाथ उठाया तो अध्यक्ष महोदय बोले, लंच का टाइम हो रहा है। मैंने कहा हां जी हो रहा है। लेकिन मैं इस बात के लिए क्षमा ना मांगते हुए कि हिंदी में बोल रहा हूं और इसकी प्रशंसा ना करते हुए कि हिन्दी के परम विद्वान माने जाने वाले लोग अंग्रेज़ी बोल रहे हैं वह अपनी बात कहना चाहता हूं जो लंच से पहले सूप का काम करेगी। पहली बात तो यह कि जिस भारतीय संस्कृति की हम बात कर रहे हैं उसके पहिए भाषा में लगे हुए है। अपनी भाषा के पहिओं के बिना अपनी संस्कृति का रथ सर्पट नहीं दौड़ सकता। जहां अवरोध हो वहां अनुवाद हो। तो भाषा का अवसाद नहीं होगा। हमारे देश में स्थानीय स्तर पर मातृ भाषा, देश में सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी और अंतरराष्ट्रीय सम्पर्क के स्तर पर अंग्रेज़ी ज़रूरी है पर जब देश में बात करें तो अपनी भाषा को मान लेने में क्या जाता है। महोब्बत में लोग जान दे देते हैं और आप जानबूझ कर महोब्बत की जान निकाल रहे हो। बहरहाल लंच से पहले इतना ही बताना है कि आज यूनिकोड की महागोद मिलने के बाद हिन्दी बड़े आमोद की स्थिति में आ सकती है। आज उसे वह सारी सुविधाएं कम्प्यूटर पर उप्लब्ध हैं जो अब तक हम समझते थे कि अंग्रेज़ी के पास हैं। कल हिन्दी दिवस है गूगल पर जाएं वहां सीधे हिन्दी में टाईप करें। चाहें तो रोमन कीबोर्ड से चाहे इनस्क्रिप्ट से और चाहे तो पुराने टाइपराइटर कीबोर्ड से। दुनिया के किसी भी छोर पर मेल खुलेगी तो अपनी जगमगाती देवनागरी लिपि में खुलेगी और ऐसे सॉफ्टवेयर आ चुके हैं जो उस पत्र को किसी भी लिपि में पढ़ा जा सकता है। भारत की सारी भाषाएं राजनीति और क्षेत्रीयतावाद के प्रपंचों में आकर भले ही लड़ रही हो पर कम्प्यूटर के मंच पर प्रेम से खिलखिला रही हैं। फिर मालूम है कि अध्यक्ष महोदय क्या बोले?

    —चलो लंच की ताईं।

     

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