मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • हिन्दी की वकालत
  • हिन्दी की वकालत

     

    —चौं रे चम्पू! तू इत्तौ खुस तौ भौत कम दिखाई देय, चक्कर का ऐ रे?

    —चचा, खुश क्यों नहीं होऊंगा! वर्षों की साध पूरी होती नज़र आ रही है। चालीस साल पहले जिस पीड़ा ने जन्म लिया था, आज गायब सी हो रही है। बचपन में बताया गया था कि हिन्दी हमारी मातृ भाषा है, राज भाषा है, सम्पर्क भाषा है, सबको जोड़ने वाली है, द्वेष को तोड़ने वाली है और प्रगति की ओर मोड़ने वाली है। सन अड़सठ में दक्षिण भारत में हिन्दी के विरुद्ध जब आंदोलनों की ख़बरें सुनी तो मेरा युवा हृदय धक से रह गया था। ऐसा क्यों? हम एक साथ अनेक भाषाएं सीख सकते हैं। कम से कम तीन भाषाएं हर देश का वासी जानता है। एक वह जो मां की गोदी में अपने आप सीखता है, दूसरी वह जो पूरे देशवासियों से उसे जोड़ती है और तीसरी वह जो पूरी दुनिया से उसे जोड़ती है।

    —खुसी की बात बता।

    —हमारे मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने रविवार को कुछ कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को अपने घर चाय पर बुलाया था। हिन्दी के नामी-गिरामी लोगों के साथ बड़ी रौनकदार पार्टी हुई। कविताएं भी हुईं, विचार भी रखे गए। स्वयं कपिल सिब्बल ने कुछ कविताएं अंग्रेज़ी में और एक हिन्दी में सुनाई। कुल मिलाकर ऐसा अनौपचारिक वातावरण था जिसमें गूढ़ औपचारिक और भविष्यवादी बातें की गईं। कपिल जी बता रहे थे कि प्राथमिक स्तर तक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। प्राथमिक शिक्षा तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, बांग्ला में हो, बिलकुल सही बात है। मुश्किल कहां आती है, जब ये बच्चे दसवीं के बाद मुख्य धारा में आते हैं और हिन्दी से अपरिचित होते हैं। बहुतों की मातृभाषा हिन्दी है, पर सबकी तो नहीं है। जो मातृभाषा हम सबको जोड़ेगी वह हिन्दी ही होगी और जो बाहर की दुनिया से जोड़ेगी वह अंग्रेज़ी। हमें अपनी संस्कृति से जुड़ना है, एकदूसरे से जुड़ना है  और विश्व से जुड़ना है। तीनों ज़रूरी हैं, और इस समय की चुनौती ये है कि तीनों भाषाओं को उनके कद के अनुसार मान देते हुए अपने बच्चों को शिक्षा दी जाए। फिर उन्होंने बताया कि वे कुछ दिन पहले हरियाणा के एक गांव में स्कूल के बच्चों से मिले। उन्होंने बच्चों से उनका प्रिय विषय पूछा, सबने हिन्दी बताया। गणित और विज्ञान में किसी ने अपनी रुचि नहीं दिखाई। कपिल कहते हैं कि चुनौती यह भी है कि केवल हिन्दी में ही रुचि होगी तो क्या हमारा देश शिक्षित हो पाएगा? सारे विश्व में ‘प्रोड्यूसर्स ऑफ़ नॉलिज’ अंग्रेज़ी में हैं। अगर हम अपने बच्चों को अंग्रेज़ी नहीं सिखाएंगे तो वे ज्ञान से वंचित रह जाएंगे। जब हम ‘प्रोड्यूसर्स ऑफ़ नॉलिज’ बन जाएंगे तब लोग हिन्दी को सही महत्ता देंगे। हर बच्चा जीनियस होता है, हर बच्चे की अपनी उड़ान होती है, भाषाओं का ज्ञान उसे बचपन से होगा तो वह स्वयं ‘प्रोड्यूसर ऑफ़ नॉलिज’ बन सकता है।

    —हिन्दी में कौन सी कबता सुनाई?

    —ज्यों की त्यों तो याद नहीं, पर भाव कुछ इस प्रकार था कि ग़रीब बेज़ुबान खोया हुआ इंसान है। बापू ने हमें बताया था कि वही दरिद्रनारायण भगवान है। उसकी सेवा को इंसानियत की सही पहचान बनाते हुए उसको ज़ुबां देकर हमें उसका मान बढ़ाना है। ज़ुबान से उनकी मुराद भाषाओं से भी थी। आज हिन्दी भारत में तेज़ी से फैल रही है, लेकिन हिन्दी में ज्ञान के उत्पादन का साहित्य अधिक नहीं लिखा गया। हमारे युवाओं के अंग्रेज़ी ज्ञान ने ही विश्व स्तर पर हमारे देश की पहचान बनाई है। अफ़सोस कि ज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ गई हिन्दी। वह इस लोकतंत्र की लोकभाषा तो बनी लेकिन शिक्षा और ज्ञान की भाषा नहीं बन सकी।

    —खुसी की बात का ऐ, जे चौं नायं बतावै?

    —आज यह जानकर इतनी खुशी हुई कि कपिल सिब्बल देशभर के सारे स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई को अनिवार्य करने के लिए ज़ोरदार वकालत कर रहे हैं और मानते हैं कि हिन्दी का दायरा मातृ भाषा से बढ़कर ज्ञानोत्पादन और सबको एक सूत्र में बांधने वाली भाषा का हो।

    —जे तौ बढ़िया बात भई चम्पू!

    —हमारे देश का मानव संसाधन मंत्री यदि ठान ले और जनता का समर्थन उसे मिले तो यह सपना साकार होकर रहेगा चचा।  आज़ादी मिलने के बासठ बरस बाद अब अगर कपिल सिब्बल पूरे देश की प्राथमिक शिक्षा में हिन्दी अनिवार्य कर रहे हैं तो सारे हिन्दी-प्रेमी ही नहीं, सारे देश-प्रेमियों को आगे बढ़ कर उनका समर्थन करना चाहिए।

    —बता कहां चलनौ ऐ? चल, समर्थन करिंगे।

     

     

    wonderful comments!