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  • हरिद्वार वाया रुड़की

    —चौं रे चम्पू! पिछले हफ्ता कहां-कहां की सैर करी रे?

    —सैर मत कहो, पैर का चक्कर कहो चचा! इस हफ़्ते का तो याद है, पिछले हफ़्ते की पूछोगे तो दिमाग़ पर ज़ोर डालना पड़ेगा। मुम्बई में रूमी जाफ़री और शशिरंजन के गंगो-जमन मुशायरे से रांची गया। रांची से जमशेदपुर की स्टेट बैंक शाखा की नव्वैवीं वर्षगांठ का कविसम्मेलन। जमशेदपुर से दिल्ली हारा-थका लौटा। अगली सुबह फिर शताब्दी पकड़ कर रुड़की हरिद्वार होते हुए देहरादून पहुंचा। उत्तराखंड हिंदी अकादमी के ‘महाकवि पार्थसारथि डबराल स्मृति समारोह’ के लिए। अभी लौटा हूं और कल फिर जाना है।

    —कोई खास बात बता सफर की।

    —ख़ास बात क्या चचा! खूब सारे लोग मिलते हैं। कहते हैं, आपको बचपन से सुनते आ रहे हैं। सुनकर संकोच सा होता है। सोचता हूं, मेरा तो बचपन अब शुरू हुआ है, बहुत सिखा लिया, अब बहुत कुछ सीखने की तमन्ना है। हे बुज़ुर्गो, तुम मुझे बचपन से कैसे सुन रहे हो!

    —तौ चल इन दिनन के बचपने की कछू बता।

    —जमशेदपुर से रांची तक का सफ़र प्रदीप चौबे और प्रवीण शुक्ल के साथ किलकारियां भरते गुज़रा। तीन घंटे कैसे बीते पता ही नहीं चला। रांची हवाई अड्डे पर इनोवा से उतरते हुए प्रवीण बोला, भाईसाहब इस यात्रा की सबसे बड़ी ख़ूबी ये रही कि किसी ने किसी की निंदा नहीं की।

    —निंदा के बिना मजा कैसै आयौ रे?

    —प्रदीप डियर को दूसरे शायरों के बेशुमार शेर याद हैं। हुआ यों कि प्रदीप चौबे इनोवा में सबसे पीछे वाली सीट पर बैठे। बीच वाली दो सीटों पर मैं और प्रवीण। आगे ड्राइवर के साथ आयोजक अशोक कुमार सिंह। प्रदीप जी का पीछे बैठना मेरे लिए हैरानी की बात थी। पिछले तीस साल से देख रहा हूं, वे हमेशा ड्राइवर के साथ अगली सीट पर बैठना पसंद करते रहे हैं। कारण मेरी समझ में कुछ-कुछ आ रहा था, पर मैं कुछ बोला नहीं।

    —का कारन हतो?

    —सही नहीं भी हो सकता है, पर मेरा अनुमान है, सन दो हज़ार नौ में इनोवा गाड़ी में विदिशा से भोपाल आते हुए सड़क दुर्घटना में चार कवि, ओमप्रकाश आदित्य, ओम व्यास, नीरज पुरी और लाड़ सिंह गुर्जर दिवंगत हो गए थे। बचे वही जो पिछली सीट पर बैठे थे। पर ये कहने की बात थोड़े ही थी। मैंने प्रदीप से पूछा, पिछली सीट पर आराम से तो हैं? बहुत उछल रही है। उन्होंने पीछे से शकील ग्वालियरी का एक शेर उछाल दिया।

    —सुना! मैंऊ लपकिबे की कोसिस करूं!

    —‘हो गया पथराव फिर उस पार से, फ़ायदा क्या बीच की दीवार से? हम तो अपनी ही नज़र से गिर गए, हमको क्या लेना कुतुब मीनार से।’ शेर संजीदा थे पर मैंने और प्रवीण ने ठहाका लगाया। आपको मालूम ही है, उन चार कवियों के जाने के कुछ दिन बाद ही अल्हड़ बीकानेरी भी चले गए थे। फिर पूरे रास्ते अल्हड़ जी की चर्चा होती रही, पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में ख़ुश हैं। हास्य-व्यंग्य में तो वे बाद में आए, लेकिन उस्ताद शायरों की सोहबत में वे भी उस्ताद शायर बन चुके थे। उनकी जिस ग़ज़ल ने रास्ते में मज़ा दिया, उसके चन्द शेर सुनिए!

    —इरसाद-इरसाद।

    —’दिन बुरे आए तो हम तुम पे फ़िदा हो बैठे, सुर्ख होठों के तबस्सुम पे फ़िदा हो बैठे।’ अगला था, ‘शेर तो उनके वजनदार नहीं थे लेकिन, नासमझ लोग तरन्नुम पे फ़िदा हो बैठे।’ एक शेर और भी देखिए, ‘ऊब कर भीड़ भरे शहर के हंगामों से, आज अपने दिले गुमसुम पे फ़िदा हो बैठे।’ पांचों दिवंगत कवि याद आ रहे हैं चचा, बताओ अपने दिले गुमसुम का क्या करूं?

    —कछू हंसी की बात सुना।

    —अरे चचा प्रवीण ने बताया कि अल्हड़ जी कोई गीत लिख रहे थे, एक अंतरे में तीन तुकांत मिल गए, चौथा नहीं मिल पा रहा था। पहली तीन पंक्तियां थीं, ‘सेठ कल्लू ने मेरे घर की करा दी कुड़की, चाय वाले ने मुझे चाय थमा दी गुड़ की, थाने वाले भी सुबह दे गए आकर घुड़की,’ कुड़की, गुड़ की, घुड़की के बाद चौथी तुक ज़रा देर में पकड़ में आई, ‘कल मैं हरिद्वार चला जाऊंगा वाया रुड़की!’

    —दहरादून ते आय कै तैनैं चाय सुड़की कै नायं सुड़की?

    wonderful comments!

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