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  • हतश्री निराश व्यथित और प्रफुल्ल त्यागी
  • हतश्री निराश व्यथित और प्रफुल्ल त्यागी

     

     

    —चौं रे चम्पू! इत्ती देर है गई, कछू बोल चौं नायं रयौ?

    —चचा! नवोदित कवि हतश्री निराश व्यथित के बारे में सोच रहा था।

    —कौन ऐं जे?, हतसिरी कौ का मतलब?

    —हतश्री तो मैंने अपनी तरफ से जोड़ा है। हतश्री, यानी, जिसके चेहरे की रंगत उड़ी हुई हो। उनका नाम सिर्फ निराश व्यथित नहीं, अतिनिराश अतिव्यथित होना चाहिए था। आत्महत्या का इरादा रखते थे और बेहद परेशान थे। कल लखनऊ के एअरपोर्ट पर मिले। मुझे पहचान गए थे। पास आकर बैठ गए। फ्लाइट दो घंटे लेट थी। बैठकर ब्रीफकेस खोलने लगे। मैंने सोचा, अपना विज़िटिंग कार्ड निकाल रहे होंगे, लेकिन निकाला दवाई का पाउच। आठ-दस तरह की रंग-बिरंगी गोलियां बिना पानी के ही गटक गए। फिर दुख की ऐसी-ऐसी दास्तानें सुनाईं कि किसी का भी दिल दहल जाए।

    —तेरौ ऊ दिल दहल गयौ का?

    —नहीं चचा आपका पट्ठा हूं। बगीची की सुपर ट्रेनिंग है। निराशा के पल किसके जीवन में नहीं आते, पर यहां आपने जिन्दगी में हंसने-हंसाने के जो पाठ पढ़ाए हैं, बड़े काम आते हैं। आपने एक बार कहा था कि तुम पर दुख पड़े तो उसे देखो जो तुमसे हजार गुना दुखी है। उसका दुख दूर करने की कोशिश करो, तुम्हारा भी कम होने लगेगा। चचा, ये जिन्दगी कभी ठहरती नहीं है। हंसी के पहिये लगा दोगे तो दौड़ती नजर आएगी। निराश, व्यथित और हतश्री हो गए तो जाम होने का भ्रम देगी। मनहूसियत जिन्दगी को चूस लेती है चचा। उस मनहूसाचार्य को मैं एक घंटे तक समझाता रहा, पर उसकी सुई बहुत बुरी तरह अटकी हुई थी।

    —का भयौ वाके संग?

    —आजकल का आम चलन है। मल्टीनेशनल कम्पनी की अच्छी नौकरी थी। सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रेम करने वाली सुन्दर पत्नी थी। थी नखरीली और मौज-मस्ती के साथ विलासिता की प्रेमन। वह भी कहीं छोटी-मोटी नौकरी करती थी। मज़े से कट रही थी। अचानक शानदार नौकरी छूट गई। पत्नी ने शुरू में हिम्मत दिखाई कि कम में गुजारा कर लेंगे। एक दिन मनहूसाचार्य ने उसे अपने कुलीग के साथ हंसी-ठट्ठा करते देख लिया। घुस गया दिमाग में शक का कीड़ा, घर में कलह करने लगी क्रीड़ा और बढ़ गई दिल की पीड़ा। तन गए तिश्ने-ताने और बीबी को मिल गए घर छोड़ने के बहाने। इन्होंने तरह-तरह के जाल फैंके, लेकिन वो पहुंच गई मैके। अब इसलिए दुखी हैं कि तलाक से पहले ही उसके मां-बाप ने लड़का खोजना शुरू कर दिया है।

    —मूरख ऐ जो दुखी ऐ। खुद चौं नायं ढूंढै दूसरी नौकरी और दूसरी छोकरी?

    —मैंने समझाया! पर यहीं तो सुई अटकी हुई है। कहने लगे, जीवन में एक बार प्यार किया है, किसी और के बारे में सोच तक नहीं सकते। हर पल ख़्यालों में वही रहती है इसलिए किसी भी नौकरी में मन नहीं लगता। मैंने कहा, प्यारे! जिन्दगी के ज़मीनी मोर्चे पर प्रेम-व्रेम कुछ नहीं होता। प्रेम भावनाओं में लिपटा हुआ स्वार्थ ही तो है। सुख-समृद्धि बनी रहे तो प्यार हर साल कटने वाला केक होता है, अन्यथा बुरी तरह ब्रेक होता। प्रेम में एक-दूसरे का भाना आसान है पर आड़ा वक्त आने पर निभाना मुश्किल है। कवयित्री मधुमोहिनी उपाध्याय ने ढाई अक्षर वाले प्यार के ढाई अक्षर वाले ही अनेक पर्यायवाची गिनाए हैं— प्रेम, इश्क, स्नेह, प्रीति, भक्ति, निष्ठा, आस्था, सख्य, दास्य, आत्म, प्राण वगैरा-वगैरा, और अंत में बताया कि प्यार का सबसे अच्छा पर्यायवाची है त्याग। इसलिए व्यथित जी अपना नाम अब निराश त्यागी रख लीजिए। वे चुप थे और मानसिक रूप से थोड़े शांत भी लग रहे थे। शायद दवाइयों का असर हो। बोले कि निराश व्यथित नाम तो अभी हाल में ही रखा था, मेरा मूल नाम तो प्रफुल्ल त्यागी ही है। मेरी कविताएं सुनकर उसी ने एक दिन कहा था कि अपना नाम निराश व्यथित रख लो। और मैंने सचमुच रख लिया। इसी नाम से इन दिनों दनादन कविताएं लिख रहा हूं।

    —तोय कित्ती कबता सुनाईं?

    —मैंने एक भी नहीं सुनी। उन्होंने अपनी कविताओं की डायरी पर मेरे ऑटोग्राफ मांगे। मैंने लिख कर दिया– श्रीमान प्रफुल्ल त्यागी! उपनाम रखिए जीवनानुरागी।

     

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