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  • चौं रे चम्पू
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  • हट जा ताऊ पाच्छे नै, अमरीका मा धमक होइबे करी
  • हट जा ताऊ पाच्छे नै, अमरीका मा धमक होइबे करी

     

     

    —चौं रे चंपू! कोई खुसी की बात बता।

    —चचा ख़ुशी की बात ये है कि आप भी स्‍वस्थ हैं, मैं भी स्‍वस्थ हूं और हम दोनों व्यस्त और मस्त हैं।

    —कोई और बात बता लल्‍ला।

    —अच्‍छा सुनो! अमरीका में इन दिनों हरियाणवी का हल्‍ला है। इस आर्थिक मंदी के दौर में जहां बड़ी-बड़ी कंपनियों से लोग निकाले जा रहे हैं, वहीं ओबामा के प्रशासन तंत्र ने हज़ारों पदों के लिए आवेदन मांगे हैं।

    —जामें हरियानवी हल्‍ला का भयौ?

    —चचा तुम्‍हारे अंदर उतावली बहुत है। बता रहा हूं। सुनो तो सही। आवेदन फॉर्म में अंतरराष्‍ट्रीय अनुभव कॉलम के अंतर्गत विश्व भर की एक सौ एक भाषाओं के नाम दिए गए हैं, जिनमें बीस भाषाएं भारत की हैं। पूछा गया है कि इन भाषाओं में से आवेदनकर्ता किन-किन भाषाओं को जानता है। मज़े की बात ये है कि भारत की बीस भाषाएं सारी की सारी वे नहीं हैं, जो भारतीय संविधान की भाषा-सूची में शामिल हैं। छ: भाषाएं ऐसी गिनाई गई हैं, जो हमारे संविधान में अभी तक अधिकृत नहीं की गई हैं।

    —अच्‍छा! जैसे?

    —हरियाणवी, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मगही और मारवाड़ी, ये संविधान की सूची में नहीं हैं।

    —संविधान में कित्ती और कौन-कौन सी ऐं?

    —बाईस हैं चचा— असमी, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़,  मलयालम,  मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, सिंधी, तमिल, तेलगू, उर्दू, बोडो, डोगरी, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मणिपुरी, संस्कृत और संथाली। इनमें से आख़िरी आठ भाषाएं अमरीकी आवेदन-पत्र में नहीं हैं।

    —अब दो सवालन कौ जवाब दै। पहलौ जे कै जो भासा ओबामा ने सामिल करीं वो हमारे संविधान में चौं नाऐं? और जो भासा हमारे संविधान में हतैं वो सारी की सारी ओबामा की सूची में चौं नाऐं?

    —चचा! पहला सवाल भारत सरकार से पूछो, दूसरे का जवाब ये है कि अमरीका किसी की नहीं, सिर्फ अपने जासूसों की मानता है। जासूसों ने यहां जैसा देखा-सुना होगा वैसा वहां जाकर बताया होगा। अमरीका का भाषाई जासूस जब गुड़गांव में घूम रहा होगा तब उसका साबका पड़ा होगा हरियाणा के कितने ही बाशिंदों से, क्योंकि ज़्यादातर अमरीकी कम्पनियां गुड़गांव में हैं। वहां बोली जाती है हरियाणवी। उसने सड़क चौराहों पर सुना होगा— ‘हट जा ताऊ पाच्छै नै’, ‘के कर रह्या सै बावड़ी बूछ’, ‘तन्नै ना बेरा कुछ बी’, अधिकारपूर्वक बोले गए ऐसे दमदार संवाद सुनकर भाषाई जासूस ने नतीजा निकाला होगा कि यही आधुनिक भारत की सर्वाधिक सशक्त भाषा है। जासूस की रिपोर्ट के आधार पर अमरीकी भाषा-शास्त्रियों ने हरियाणवी पर इतना काम कर डाला होगा जितना कोई हरियाणवी भाषा अकादमी न कर पाई होगी। मुम्बई में अमरीकी भाषाई जासूसों ने देखा होगा कि भोजपुरी, मगही, अवधी बोलने वाले इतने अधिक हैं कि मराठी माणूस उनसे घबरा गए। सूची में जुड़ गईं तीन और भाषाएं। फिर वो भाषाई जासूस छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में घोटुल प्रथा के आरपार वाले फोटुल अभियान पर गया होगा, वहां उसे छत्तीसगढ़ी सशक्त लगी होगी। मारवाड़ी लोग दुनिया के किसी भी इलाक़े में चले जाएं, अपनी भाषा और संस्कार नहीं छोड़ते। बड़े उद्योगपतियों में से अधिकांश मारवाड़ी हैं, इसलिए चुनी गई होगी मारवाड़ी भाषा। तो समझे चचा! आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से हमारे यहां सूची बनी।  उन्होंने सड़किक, चौराहिक, कारोबारिक, आरपारिक और सांस्कारिक अनुभवों के आधार पर इन छ: भाषाओं को चुना होगा। हम इन भाषाओं को हिन्दी की बोलियां समझ कर आदरास्पद स्थान नहीं दे पाए। अब जब अमरीका ने इनकी ताकत को पहचाना है तो हो सकता है हमारे रहनुमा भी ध्यान दें।

    —ब्रज भासा चौं नायं आई?

    —अमरीकी भाषाई जासूस ने देखा होगा कि ब्रजवासी एक अदद संतुष्ट प्राणी है। वह अपने गोकुल में इतना मस्त है कि ग्लोबल नहीं होना चाहता और न अपने बल का ग्लो किसी को दिखाता है। बल तो हरियाणवी और भोजपुरी में है। अब मैं भी तुम्हें चचा नहीं, ताऊ बुलाउंगा और कहा करूंगा— ऊटपटांग क्वश्चन मन्ना बूज्झै कर ताऊ! आन्सर ना द्यूं त मेरी पूंछ पाड़ लेग्गा? ईब म्हारी  हरयाणवी इंटरनैसनल सै। अब ई वर्ल्ड मा भोजपुरिया धमक होइबे करी।

     

    wonderful comments!