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    —चौं रे चंपू! गुम्मसुम्म सौ चौं ऐ?

     

    —अंदर कैफ़ी साहब का एक गीत गूंज रहा है, ’बिछुड़े सभी बारी-बारी।’ कागज़ के फूल का गाना था। पिछले दो-तीन महीनों में श्मशान घाटों पर जाते-जाते थक गया हूं चचा! घबराता हूं कल कहीं दूसरी ख़बर न आ जाए। परिवार के सदस्यों के अलावा परिकर के अनेक मित्र चले गए। गीतकार-संगीतकार रवीन्द्र जैन, कवि पंकज सिंह, कथाकार-संपादक रवीन्द्र कालिया, चार दिन पहले कवि ब्लॉगर अविनाश वाचस्पति, चित्रकार-कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग, प्रभात प्रकाशन के प्रभात जी की मां, मुनव्वर भाई की मां और शायर निदा फ़ाज़ली। मैं निदा साहब के साथ तो एक सप्ताह पहले ही था। ग़ज़ब की ठण्ड थी। वहां की ठंड ही उन्हें ले गई।

     

    —कहां की बात ऐ?

     

    —गोरखपुर महोत्सव में मुशायरा-कविसम्मेलन था। कवियों और श्रोताओं के ऊपर कोई तम्बू-शामियाना नहीं था। दरसल वह मंच हाई-फ़ाई म्यूज़िक में नौजवानों के थिरकने के लिए बनाया गया था। साउंड के बड़े-बड़े कॉलम और सैकड़ों रंग-बिरंगी लाइट्स के साथ लोहे का एक विराट फ्रेम खड़ा कर दिया जाता है। उसे ढंका नहीं जाता है, क्योंकि टॉप एंगिल शॉट लेने के लिए छोटा सा हैलीकॉप्टरनुमा ड्रोन कैमरा आता है। नौजवान तो बर्फ़ पर भी नंगे बदन नाच सकते हैं, लेकिन वह शायर क्या करे जो उम्र के अठहत्तरवें वर्ष में हो और सर पर टोपी तक न हो। मेरी बारी जल्दी आ गई। मैंने तो कहा भी था कि श्रोताओं में से कोई चल बसा तो पता नहीं चलेगा कि शायरी से मरा कि ठंड से। श्रोता तो ख़ैर तैयारी से आए थे, लेकिन शायर नाज़ुक होते हैं, उन्हें इस चुनौतीपूर्ण स्थिति का क्या पता था। निदा साहब को सीनियर पोएट मानकर अंत तक बिठाए रखा गया। उस गाने में आता है न, ‘रात भर मेहमां हैं बहारें यहां, रात गर ढल गई, फिर ये खुशियां कहां? पल भर की खुशियां हैं सारी। बढ़ने लगी बेक़रारी। बिछुड़े सभी बारी-बारी।’

     

    —बड़ौ अफसोस भयौ!

     

    —तालियों में पल भर की ख़ुशियां होती हैं। रात ढल जाने के बाद लिफ़ाफ़ा ख़ुशियों में थोड़ा इजाफ़ा करता है। और फिर कुप्रबंध के उस सितम के बाद जो बेकरारी बढ़ती है, वह किसी को दिखाई नहीं देती। बहारें फ़क़त रात भर की मेहमां होती हैं। एक सप्ताह बाद चले गए निदा फ़ाज़ली।  बढ़िया शायर! एक बात आप जानते ही होंगे उनके बारे में!

     

    —का बात?

     

    —विभाजन के समय इनके माता-पिता तो पाकिस्तान चले गए, लेकिन इन्होंने इंकार कर दिया। लड़कपन से ही किसी सहपाठिन से गहरी दोस्ती मानते थे। उसकी मृत्यु के समाचार ने विरह का ऐसा झटका दिया कि शायर हो गए। हिंदी-उर्दू साहित्य की मिली-जुली परम्परा के एक मानवतावादी शायर थे। जाना तो सभी को है चचा, बिछुड़ जाते हैं सभी बारी-बारी, लेकिन मैंने देखी है उनकी यारी। पिछले तीस-पैंतीस बरस में न जाने कितने मुशायरे उनके साथ किए हैं, और सफ़र भी। इतनी ही पुरानी मैत्री सुधीर तैलंग के साथ थी! निहायत ज़िंदादिल इंसान। सिर्फ़ अपने कार्टूनों के लिए नहीं, पूरी कार्टून विधा के लिए समर्पित रहते थे। निदा मुझसे बारह साल बड़े थे, सुधीर दस साल छोटे। छोटों के जाने का ग़म बहुत भारी होता है चचा!

     

    —सुधीर कूं का भयौ?

     

    —वे डेढ़ साल से कैंसर से जूझ रहे थे। इस बीच मिलते रहते थे कभी राष्ट्रपति भवन में या कभी किसी दूसरे समारोह में। फ़ोन पर बातें होती रहती थीं। पिछले दो-तीन महीने ज़्यादा बीमार रहे।  मन तो होता है कि ऐसे मित्रों के पास ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताया जाए, लेकिन जीवन की आपाधापी का ईवन-ऑड बाधक बन जाता है। बाद में आत्मग्लानि होती है कि हाय हम उतना समय उस दौर में उन्हें न दे पाए। इतनी जल्दी चले जाएंगे, इसका तो गुमान ही न था। मेरा उनके साथ लम्बा कार्मिक संबंध रहा, जो धीरे-धीरे कब पारिवारिक हो गया पता ही नहीं चला। उस गीत में एक पंक्ति आती है, ‘इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से ले लेती है, ये खेल है कब से जारी’। मुझे उल्टा लगता है चचा! दुनिया ऐसे व्यक्तित्व सौ हाथों से देती है, क्योंकि इनका निर्माण बड़ी मुश्किल से होता है। अचानक एक झटके से खींच ले जाती है। बाकी के लोगों को भले ही सौ बार मार कर ले जाती हो, लेकिन ऐसे व्यक्ति एक बार ही मरते हैं और सदा जीवित रहते हैं।

     

    wonderful comments!