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  • संकल्प-गुल चुनाव    
  • संकल्प-गुल चुनाव    

     

     

     

    –चौं रे चम्पू! दिल्ली के चुनावन में बोट कौन कूं देय्गौ?

     

    –चचा, ये सवाल ऐसा है, जिसे न तो आप मुझसे पूछ सकते हैं, न मैं आपसे पूछ सकता हूं, लेकिन मैं इतना जानता हूं कि अपने-अपने दलों के कट्टर समर्थक भी हिले हुए हैं। सुपर-कट्टर समर्थकों के अलावा दिल्ली के मतदाता अपने आपसे ये सवाल पूछ रहे हैं कि वे वोट किसे देंगे। कुछ-कुछ कन्फ्यूज़न की सी सिचुएशन है।

     

    —हिंदी में बोल।

     

    —अनिर्णयावस्था! अनिश्चय की स्थिति! जिसे हम कह सकते हैं असंकल्प, दुविधा, दोदिली, कशमकश, उलझन, ऊहापोह, भ्रान्ति, पसोपेश, मनोमंथन, शंका, संदेह, शशोपंज, विचलन, ढुलकन, धर्मसंकट, द्वन्द्व, दिग्भ्रम, सोच-विचार, संशय, डावांडोली, दोचित्ती आदि-आदि की स्थिति। और बोलूं हिंदी?

     

    –बोल, बोल, बोले जा! आदि-आदिन्नै और बताय दै, जो बचे हौंयं!

     

    –शंकाग्रस्तता, विकल्पग्रस्तता, अनिर्णयग्रस्तता, अनिश्चितता, संकल्पहीनता, किंकर्तव्यविमूढ़ता…

     

    –अब जे तौ तैनैं सब्द दौहराइबे सुरू कद्दए, ता ता लगाय कै।

     

    –चचा, क्या ता ता और क्या ताताथइया! सवाल ये है कि जनता किसको टाटा कर देगी। मीडिया हवा बनाता है, पर मुझे नदीम का एक शेर याद आता है। एक नहीं दो। सुनिए, ‘भले इक बार होना चाहिए था, किसी से प्यार होना चाहिए था। जो सच है वो छिपा लेते हो मुझसे, तुम्हें अख़बार होना चाहिए था।’ मेरे लिए भी ऐसा अवसर है कि किसके लिए क्या करूं। तीनों के तीनों प्रिय और आत्मीय रह चुके हैं, और हैं भी। किरण बेदी दूरदर्शन के पुराने ज़माने से परिचित हैं, जब नए साल का कार्यक्रम बनाया करते थे। वे गुजरिया बनी थीं। तिरानवै में जब वे जेल अधीक्षिका थीं तब उन्होंने पहली बार एक प्रयोग किया। मुझसे कहा कि मैं कुछ कवियों को लेकर जेल में आकर कैदियों को कविता सुनाऊं। मैं, अरुण जैमिनी, वेद प्रकाश और महेंद्र अजनबी को साथ लेकर गया। मिलकर क़ैदियों को हंसाया। अगले दिन अख़बार में छप गया, ‘चम्पू तिहाड में’। एक बार अमरीका में हम दोनों एक साथ सम्मानित हुए। तेजस्वी महिला हैं। जिस पद पर रहीं, वहां दमदार काम किया है। अब अचानक उन्हें दिल्ली के चुनाव में ला दिया गया है। पीछे से मोदी जी का सहारा, लेकिन बीजेपी में वे क्या करेंगे जो अचानक हो गए बेसहारा।

     

    –और केजरीवाल की का कहैगौ?

     

    –अरे, केजरीवाल एकमात्र ऐसे राजनैतिक नेता हैं, जिन्होंने इतना प्रगाढ़ आलिंगन किया, जितना कभी किसी नेता ने नहीं किया। दरसल, जिस दिन उन्होंने पद-ग्रहण किया, मैंने नैतिक आधार पर ’हिंदी अकादमी’ के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि अध्यक्ष पद मुख्यमंत्री का होता है। वही उपाध्यक्ष का मनोनयन करते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद, अचानक ‘दिल्ली लिटरेरी फेस्टीवल’ में, पहली और अभी तक की अंतिम मुलाकात के दौरान, वे लिपटे तो ऐसे लिपटे कि छोड़ें ही नहीं। आत्मीयता का जो भाव उन्होंने दिखाया, अद्भुत था। मुझे आने का न्यौता दिया। मैं यह सोच कर गया नहीं कि कहीं वे यह न सोचें कि मैं पद पर बने रहना चाहता हूं। मुझे आभारी होना चाहिए कि उन्होंने मेरा इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया।

     

    —माकन तेऊ तेरे अच्छे सम्बन्ध ऐं।  

     

    –अच्छे से बात नहीं बनेगी, और भी ज़्यादा अच्छे हैं। वे बड़े सुशील, सभ्य, सुसंस्कृत और सधे हुए युवा नेता हैं। सुदर्शन हैं। उनमें बड़बोलापन नहीं है। वे भी तिरानवै, चौरानवै में राजनीति में आए थे और विधायक बने थे। जब से बने हैं, तब से वे कविसम्मेलनों में आते रहे हैं। जब और जहां मैंने उनसे आग्रह किया, वे चले आए। राजभाषा विभाग की तीन समितियों की ज़िम्मेदारी उन्होंने मुझे सौंपी, जिनका काम था, सरकारी कामकाज में कम्प्यूटर पर यूनिकोड की अनिवार्यता को व्यावहारिक स्तर पर लागू कराना। मेरे साठवें जन्मदिन पर बड़े ठाठ का समय उनके साथ बीता। मैंने तत्काल बनाकर एक अधूरी-सी पेंटिंग उन्हें भेंट की। वे भी मेरे अपने हैं। खैर, संविधान में एक वोट को तीन हिस्सों में बांट कर देने का विधान होता, तो तीनों में बांट देता।

     

    –तौ अब तू का करैगौ?

     

    –चचा, हालांकि प्रकट में यह एक संकल्प-गुल चुनाव है, पर ऐसा नहीं है कि वोट के तीन टुकड़े करने वाली परंपरा में विश्वास रखता हूं। मेरा निर्णय मेरे दिमाग में सुरक्षित है, आपको क्यों बताऊं? बटन दबाते समय मेरी अंतरात्मा जो कहेगी, खटाक से कर दूंगा। उंगली पर स्याही लगवा कर निकल आऊंगा।

     

    –ठीक है लल्ला, हमऊं नायं बतामैं। हमऊं ऐसौ ई करिंगे।

     

    wonderful comments!