मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • शॉल
  • शॉल

     

     

    —चौं रे चम्पू! तोय कोई झटका लगै तौ तू का करै?

    —यह तो झटके की तीव्रता पर निर्भर करता है कि क्या किया जाए। भूकम्प रैक्टर स्केल से नापे जाते हैं। तीन दिन पहले मुझे एक झटका बड़ी ज़ोर से लगा। विडम्बनापूर्ण बात क्या थी कि विध्वंस का कोई चिन्ह नहीं था। कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि हंसते-खिलखिलाते लोग अन्दर से कितने व्यथित थे।

    —चौं, का भयौ?

    —चचा, मुझसे बहुत स्नेह रखने वाले पद्मश्री से सम्मानित, सन पैंतालीस से फोटो पत्रकारिता करने वाले, वीरेन्द्र प्रभाकर जी की पौत्री की शादी का निमंत्रण मिला। निमंत्रण से पहले इसी महीने उन्होंने फोन भी मिलाया था कि तुम्हें आना ज़रूर है। अठारह तारीख को विवाह समारोह में सपत्नीक बड़े उल्लास के साथ गया। भव्य समारोह था। द्वार पर उनके पुत्र ने स्वागत किया। मैंने उनसे पूछा वीरेन्द्र जी कहां हैं? उन्होंने ये बताते हुए झटका दिया कि वे अब नहीं रहे। मैं स्तब्ध रह गया। माना, इक्यासी वर्ष के थे, फिर भी बड़े चाक-चौबंद, कर्मठ और युवाओं जैसे सक्रिय। मुझे वहां की चकाचौंध, जगर-मगर, एक नज़र में बड़ी बेमानी सी लगी। फिर उनके पुत्र ने कहा, ‘तैयारियां सारी हो चुकी थीं, निमंत्रण-पत्रों का काम तो उन्होंने ही किया था। ये तो जीवन है।’ मैंने भी सोचा कि हां, ये तो जीवन है। सदैव आगे की ओर बढ़ता है। मुझे अपनी पंक्तियां याद आने लगीं— ‘सुख-दुख के आने-जाने पर, चलता है किसी का ज़ोर नहीं। सुख ढोल बजाता आता है, दुख का होता कोई शोर नहीं।’

    —मोय तौ पतौ ई कै बे गए। एक अखबार में न्हैंनी सी खबर पढ़ी हती मैंने। मैं मिल चुकौ ऊं उन्ते! अपनी तकलीफन कौ जिकर जादा नायं कत्ते। बालकन की ओर ते भौत दुखी ए। ब्याह कैसौ भयौ?

    —शादी में अच्छी व्यवस्थाएं थीं। समूह में सभी लगभग प्रसन्न नज़र आ रहे थे, लेकिन व्यक्तिगत रूप से जब मैं लोगों से मिलता था, तो वीरेन्द्र जी की याद करते हुए, अचानक ग़मगीन हो जाते थे। एक साहब बोले, रात में अच्छे खासे सोए थे, सुबह नहीं उठे। मैं हैरान था कि मेरी जानकारी में क्यों नहीं आ पाया। आपने भी मुझे नहीं बताया। अख़बारों में वे बड़ी ख़बर तो नहीं बन नहीं पाए थे। जिस हिंदी भवन से वे प्रारंभ से जुड़े रहे, वहां भी कोई शोक सभा नहीं हुई। कुटुम्बीजन ने यह शोक समाचार व्यापक स्तर पर यह सोचकर नहीं दिया होगा कि बिटिया की शादी करनी है और वीरेन्द्र जी के आशीर्वाद को फलीभूत करना है।

    —तू कब मिल्यौ ओ उन्ते?

    —मेरा परिचय उनसे तीस-चालीस साल पुराना तो रहा होगा। मेरे हर कार्यक्रम में वे शिरकत करते थे। हर कार्यक्रम में सहभागी रहते थे। परिवार की तरह मानते थे। वे मुझे पसन्द करते थे, तो बस करते थे। उस पसंद में न अतिरिक्त प्रशंसा थी न निंदा। कविसम्मेलनों में मैंने देखा है कि वे सदैव दूसरी पंक्ति में बैठना पसन्द करते थे। ये बात दूसरी है कि पहली पंक्ति का कोई व्यक्ति उनका हाथ पकड़ कर उन्हें आगे बिठा लेता था। दूसरी-तीसरी पंक्ति में मुक्त दिखते हैं लेकिन अगली में अर्ध-सकुचाए हुए से। न वे यह पसन्द करते थे कि उनके नाम का उल्लेख बार-बार किया जाए और न इस बात को कि उनकी उपेक्षा कर दी जाए। सादगी में महनीय और महानता में सादगी रखते थे। उन्होंने अपनी कद-काठी को अपने अनुशासन की लाठी से मज़बूत रखा था।

    —खादी की सफारी पैहर कै खूब जम्ते हते।

    —संकोची थे, मंच पर नहीं आते थे। आते थे तो इतना संस्कार अवश्य निभाते थे कि सब भले ही जूते पहनकर खड़े हों, वे कभी काव्य-मंच पर जूते पहनकर नहीं चढ़े। मेरे बारे में एक परिचय-पुस्तिका उन्होंने ’चित्र-कला-संगम’ की ओर से प्रकाशित की थी। कितनी ही संस्थाओं की मदद करते थे। परिवार के लिए वे समर्पण-भाव से क्या करते थे, पूरा ज़माना नहीं जान पाया। गुपचुप-गुपचुप चुप से गुप हो गए। उनका अंतरंग जीवन एक श्रेष्ठ उपन्यास का विषय हो सकता है। एक पुरानी बात बताता हूं। हिंदी अकादमी के सौजन्य से फिक्की सभागार में मेरा एकल काव्यपाठ था। अगली सुबह उनका फोन आया- ‘भैया! किसी मालिश वाले का नम्बर बताना। कल इतनी तालियां बजाईं कि हथेलियों में अभी तक दर्द हो रहा है। फिर उन्होंने ठहाका लगाया। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि! लेकिन ठहाका तीन-चार दिन से गूंज रहा है चचा।

     

    wonderful comments!