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    —चौं रे चम्पू! तोय छेद वारे सिक्का की याद हतै?

    —याद है, वो एक पैसे का छेद वाला तांबे-पीतल का सिक्का। ख़ूब याद है! बचपन में उस सिक्के को धागे से बांधकर गली के बच्चे लंगड़ लड़ाते थे। जिसका धागा कट जाता था, उसका सिक्का दूसरे का हो जाता था। दूसरे के धागे को काटने में झटके से खींचने का एक विशेष हुनर काम में आता था। सिक्के की बात आपके मन में कहां से आई?

     

    —एक पुरानी पोटरी में भौत सारे निकरे, तौ ऐसेई पूछि लई।

     

    —मुझे भी दे देना दो-चार। पहले माताएं गंडे ताबीज के साथ उस सिक्के को बांधकर बच्चों के गले में लटकाया करती थीं। मेरी नानी इन खूब सारे छेद वाले सिक्कों के बीच में एक मोटा धागा अंजीर की तरह बांध कर अपने पैसों की मल्लिया में रखा करती थीं। फिर बड़ी मुश्किल से गांठ खोलकर बच्चों में बांटती थी। मुझे लगता है गांठ खोलना या अंटी खोलना जैसे मुहावरे छेद वाले सिक्कों के कारण ही बने होंगे। हां, मैंने कई बार छेद वाले सिक्के को रेल की पटरी पर रखकर चौड़ा और पतला किया था।

     

    —इन सिक्कन की हालत पतरी कब ते भई?

     

    —रुपए के अवमूल्यन के साथ चचा! मेरी एक छोटी सी कविता सुन लो- ‘रुपया देकर चीज़ ख़रीदी, बाकी बची अठन्नी। आठ आना दे चीज़ ख़रीदी, बाकी बची चवन्नी। चार आना दे चीज़ ख़रीदी, बाकी बची दुअन्नी। दो आना दे चीज़ ख़रीदी, बाकी बची इकन्नी। एक आना दे चीज़ ख़रीदी, बाकी बचा अधन्ना। उसमें भी कुछ चीज़ आ गई, ताक-धिना-धिन-धिन्ना। लेकिन मेरे मुन्ना! ग़ायब हुआ अधन्ना! ग़ायब हुई इकन्नी! ग़ायब हुई दुअन्नी! ग़ायब हुई चवन्नी। ग़ायब हुई अठन्नी। बाकी बचा रुपैया। उसकी मेरे भैया! मरी हुई है नानी। साफ़ हवा भी नहीं मिलेगी और न ताज़ा पानी। खाना-पीना करना हो तो लेना होगा लोन। एक रुपए में कर सकते हो केवल टेलीफोन।’

     

    —अब तो सिक्का वारे टैलीफून बूथ ऊ खतम है गए।

     

    —मोबाइल नेट बैंकिंग और एटीएम ने सिक्कों का चलन ही ख़त्म कर दिया चचा। जैसे आपको छेद वाले सिक्के मिले, ऐसे ही मुझे एक दिन दस का सिक्का मिला। मैंने फिर एक कविता लिख मारी।

     

    —सुना!

     

    —‘कल अचानक दस का सिक्का दिखा था, ऊपर अशोक की लाट, नीचे टैन लिखा था। कहां थे इतने साल, मिले नहीं प्यारे! मेरे ऊपर बड़े अहसान हैं तुम्हारे। तुम दिल्ली की बसों में सफ़र करवाते थे। कड़क प्यास में दो गिलास पानी, और भिखारी से दुआएं दिलवाते थे। सुकून पाता था जब जेब टटोलता था, मूंगफली वाले से रौब से बोलता था। मैं तुम्हारे सहारे अधर लगे लिफ़ाफ़े में प्रेमपत्र भेजता था, अगले पत्र के लिए भी तुम्हें सहेजता था। अचानक मिले तो दिल-कमल खिल गया, जैसे बिछड़ा हुआ कोई साथी मिल गया। फिर कहां खो गए? अच्छा ही हुआ कि अंतर्धान हो गए! सुन्दर मनमोहक ढलाई, किनारों पर बारह गुम्बदों की गोलाई! इतने गोल भी नहीं कि लुढ़कते जाओ, न ऐसे चित्त-पट्ट वाले कि हवा में उछलते जाओ। हथेलियों पर ही दमकते थे, एक के नोट की तरह न भिनकते थे न थकते थे। न दूसरे सिक्कों की तरह ठनकते थे, एक रुपए के दस आ सकते थे। तुम्हारा स्वाभिमान कभी हारा नहीं, तुमने अवमूल्यन स्वीकारा नहीं। भले ही गिलट की दुकानों में गल गए, किसी और ही शक्ल में ढल गए। सोचता हूं कि अब अगर सरकार, अरबों-खरब के मालों-घोटालों को, तुम्हारे रूप में तब्दील करती, तो तुम इतने सारे होते कि वज़न से दब जाती धरती।’

     

    —पांच के सिक्का पै नायं लिखी?

     

    —सुनिए, ‘एक बार, बरख़ुरदार! एक रुपए के सिक्के और पांच पैसे के सिक्के में लड़ाई हो गई, पर्स के अन्दर हाथापाई हो गई। जब पांच का सिक्का दनदना गया, तो रुपया झनझना गया, पिद्दी न पिद्दी की दुम, अपने आपको क्या समझते हो तुम? मुझसे लड़ते हो, औक़ात देखी है जो अकड़ते हो? इतना कहकर मार दिया धक्का, सुबकते हुए बोला पांच का सिक्का– हमें छोटा समझकर दबाते हैं, कुछ भी कह लें दान-पुन्न के काम तो हम ही आते हैं।’

     

    —अब तौ तुम भिखारी कूं भिखारी नजर आऔगे, अगर पांच कौ सिक्का दियौ। एक, दो और पांच के नोट खतम है गए, तू पांच के सिक्का की बात करै!

     

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