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  • विवादों का संवाद

     

    —चौं रे चम्पू! सबते जादा ताकत कौन से वाद में ऐ?

    —चचा, विवाद में! और चूंकि विवाद में ताकत होती है इसलिए वे सर्वत्र हैं। वह जगह जन-शून्य होगी जहां विवाद नहीं हैं। आदमी होगा तो विवाद होगा। किसी भी वाद ने समाज को इतना प्रभावित नहीं किया जितना विवादों ने किया। विवादों के बाद मनुष्य वाद की शरण में जा सकता है और वाद की शरण में जाते ही फिर विवाद प्रारंभ। वाद नश्वर हैं, विवाद अनश्वर। वाद सीमाएं बनाते हैं, विवाद सीमाएं तोड़ देते हैं। वाद कहता है, मेरे चौखटे से बाहर मत निकलना। विवाद कहता है, चौखट क्या, चौखटा तोड़ दूंगा। विवाद के रूप हर जगह दिख जाएंगे चचा—

    कलह कलेस कहासुनी, बहस बखेड़ा रार,

    तर्क कुतर्क तनातनी, ‘तू’ ‘मैं’ की तकरार।

    ‘तू’ ‘मैं’ की तकरार, उपद्रव उलझन दावे,

    झिकझिक किचकिच किटकिट तैशातैशी लावे।

    खंडन मंडन विग्रह बेलगाम मुंहजोरी,

    वाग्वितण्डा झगड़ा टंटा सीनाजोरी।

    दोषारोपण झमेले, गरमागरमी द्वन्द्व,

    सिर्फ़ विवादों से रहें, कुछ प्राणी निर्द्वन्द्व।

    —बड़ी खुंदक में ऐ! का भयौ?

    —अरे, कैसे भी चैन नहीं है, चचा! तुम तो समीक्षक थे, तुम जनता के कवि कैसे बन गए? तुम चित्रकार थे कविता कैसे लिख दी? तुम अभिनेता थे नेता क्यों बन गए? तुम जनसंघी थे वामपंथी कैसे हो गए? तुम वामपंथी थे, कॉंग्रेसी कैसे हो गए? चौखटा तोड़ते ही, फ्रेम से बाहर निकलते ही, विवाद। हर बात में हील-हुज्जत, जिरह दलील अभियोग। लेकिन-किंतु-परंतु के बिना जी नहीं सकते। कुछ लांछन अभियोग न लगा लें, कुछ प्रश्न, पहेली-पेच न पैदा कर लें, अपनी चित्तपट्ट के लिए कुछ खट्टपट्ट न कर लें, आपत्तियों आक्षेपों की खेप तुम्हारे आंगन में न पटक दें तब तक ये पसीना नहीं पौंछते हैं। सन्न करके प्रसन्नता से रोमांचित होते हैं। बाल की खाल निकालते हुए इनकी खाल के बाल बड़े खुश होते हैं।

    —भौत है गई! लै, पानी पी लै!

    —पानी पी पी के कोसते हैं चचा। इंसान को इंसान नहीं समझते! जो जैसा है, अगर समाज के लिए ज़रा सा भी उपयोगी है तो उसकी क्षमताओं का लाभ उठाओ। ये नहीं कि उसके जीवन की सारी साधना का मलीदा बनाने पर आमादा हो जाओ। चचा, कल पढ़ रहा था कि जापान की एक कुंग़फू में निष्णात महिला जो अपने एक मीटर लंबे बालों से ग्यारह कारों को खींच लेती थी, उसने अपने बाल मुंडा दिए और बौद्ध भिक्षुणी हो गई। पूछो क्यों हुई होगी?

    —बता चौं भई?

    —सो तो मुझे भी नहीं मालूम, पर निश्चित रूप से कोई विवाद हुआ होगा। कुछ ताने-तिश्नों और अभियोगों से टूट गई होगी। अब बौद्ध भिक्षुणी हो गई तो भी चैन नहीं लेने देंगे। इश्क़ करती थी अमुक से! धोखा दिया इसने तमुक को! अखाड़े के पहलवानों से बना कर नहीं रख पाई! बड़ी तुनक मिजाज़ थी! कला पर बड़ा गुरूर था! आलोचनाओं के अनेक अंदाज़ होंगे। कोई कहेगा, अपनी कला नई पीढ़ी को न देकर इसने कुंगफू बिरादरी का निरादर किया? इसने कला का दुरुपयोग किया।

    —तू का चाहै, जे बता!

    —मेरी बात छोड़ो! मेरी कामना तो ये है कि वह बौद्ध मठ में जाकर अन्य भिक्षुणियों को बाल बढ़ाने की प्रेरणा दे और सबको कुंगफू सिखा दे। एक जीवन में हमने जो सीखा, उसका फायदा उठाया, अगर हम बिना दिए चले गए, छोटी-मोटी लड़ाइयों से, अहंकार से या अपने वाद के प्रमादियों से घबरा गए तो बात नहीं बनेगी। मुक्तिबोध ताना मारेंगे— ‘लिया बहुत ज़्यादा, दिया बहुत कम, मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम।’ मठ के हालात देख कर हो सकता है भिक्षुणी फिर से केश बढ़ाना चाहे। जो लिया है वो देना चाहे, अपने नए अनुभवों के साथ। पर वह ऐसा चाह कर भी नहीं कर पाएगी चचा।

    —चौं नायं कर पायगी?

    —मठाधीश सिर्फ़ बौद्ध धर्म में ही नहीं होते, हर कर्म-क्षेत्र में हैं। कुंगफू के मठाधीश नहीं आने देंगे उसे। उसकी क्षमताओं का आकलन नहीं करेंगे। अंदर से सांकलन कर देंगे यानी सांकल लगा लेंगे। बिना डकार लिए सारी दानपेटियां अपने उदर में उतारने के बाद कहेंगे— इसने हमारी कला को बाज़ारू बनाया। भीड़ के सामने केशों से कार क्यों खींचीं? धन क्यों कमाया?  यहां से तिरस्कृत होने के बाद वापस मठ में गई तो वहां भी प्रवेश वर्जित मिलेगा। नियम कायदे वहां भी फ्रेम-जड़े होंगे। भाजपा का घमासान देख रहे हैं! उसके मठाधीशों का मानना है कि जो भाजपा में ऊपर से अथवा बाद में आए हैं उन्हें शीर्षपद नहीं मिलेगा। उन्हें कहना चाहिए कि जिसने गर्भ में भी शाखाएं लगाई हों वही शीर्ष पर जा सकेगा।

    —चल छोड़, जे बता ‘हिन्द स्वराज’ तैनैं लिखी हती का?

    —हां मैंने लिखी है, अपने हृदय पर लिखी है, हर मठाधीश को लिखनी चाहिए।

     

     

     

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