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  • लतीफ़े के दुख का फीता
  • लतीफ़े के दुख का फीता

    —चौं रे चम्पू! सुख के सब साथी, दुख कौ साथी कौन ऐ?

    —दुख का साथी अपना दुख ही होता है चचा! अपना होता है इसलिए अपने आसपास ही बना रहता है। कहीं जाता नहीं। वफ़ादारी सिद्ध करने में लग जाता है। पूरा साथ निभाने की कोशिश करता है। हम अपने दुख को भगाना चाहते हैं। वह ढीठ परछाईं की तरह चिपक लेता है। भगा कर तो देखो! हम अपने दुख से दुखी रहते हैं। हमारा दुख हमसे सुखी रहता हो शायद, क्योंकि विलग नहीं होना चाहता। वह तरह-तरह से आपकी परीक्षा लेता है।

    —कैसी उखड़ी-उखड़ी बात करि रह्यौ ऐ रे?

    —प्रवचन के मूड में हूं चचा। मेरी उखड़ी बातों को दिमाग में जमाओगे तो सुख मिलेगा। देखो, दुख के आने की कोई तय दिशा नहीं होती। कहीं से, कहीं पर, किसी भी समय आ सकता है। अब यह आपके ऊपर है कि उसका धैर्यपूर्वक स्वागत करते हैं या उसे क्रोध से दुत्कारते हैं।

    —अरे लल्ला! प्रबचन ते पैलै निर्धन जी की कबता सुना, दुख वारी।

    —’एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो? उत्तर दिया, चले मत आना, मैंने वो घर बदल दिया है।’ अच्छा गीत है। हर किसी में वह कौशल होना चाहिए कि दुख आने की संभावना लगे तो घर बदल ले। लेकिन, दुख को तुम्हारे अस्तित्व तक पहुंचने का हर रास्ता पता होता है। उसे धोखा देना आसान नहीं। आमना-सामना होने पर स्वागत में धैर्य आता है और दुत्कार में क्रोध। जैसा कि मैंने आपको अभी बताया था। ये दोनों भी अकेले ही आते हैं, लेकिन इनकी तासीर में फर्क होता है। क्रोध अकेला आकर आपसे आपके सारे अच्छे गुण छीन लेता है। धैर्य भी अकेला आता है लेकिन आपके लिए सारे अच्छे गुणों की सौगात लाता है। दुख को अगर उतावली, उत्तेजना या तेवर दिखाए तो फिर ख़ैर नहीं। ज्ञानी-गुणी लोग दुख से भयभीत नहीं होते और न किसी सुख के नखरे सहते हैं। पिताजी कहा करते थे, ’फिर उठें तूफान हर रुख से, मैं नहीं डरता किसी दुख से, और सुख की बात ही क्या, वह चला जाए बड़े सुख से’।

    —सुख-दुख पै तौ उन्नै भौत कबता लिक्खी हतीं।

    —कौन कवि होगा चचा, जिसने सुख या दुख पर कविताएं न लिखी हों। हास्य कवि कहलाए जाने वाले कवियों ने दुख की अच्छी मरम्मत की है। स्वयं को मजाक का पात्र बनाकर दुख का मखौल उड़ाया है। हुल्लड़ मुरादाबादी ने सुख और दुख पर सैंकड़ों दोहे लिखे और ग़ज़लें कही हैं, ‘दुनिया में दुख ही दुख हैं, रोना है सिर्फ रोना, गम में मुस्कुराना सबसे बड़ी कला है। मैयत पे मेरी आकर कुछ लोग ये कहेंगे, सचमुच मरा है हुल्लड़ या ये भी चुटकुला है।’ लोग ऐसा मानते हैं कि हंसने-हंसाने वाले को तो कोई पीड़ा होती ही नहीं होगी। लतीफे तो कभी दुखी होते ही नहीं होंगे।

    —लतीफा कैसे दुखी है सकै लल्ला?

    —लतीफ़े के दुखों को नापने का कोई फीता नहीं बना है चचा। साहित्य में सबसे कम उम्र लतीफ़े को मिली है। एक बार सुन लिया तो दूसरी बार हंसी नहीं आती। तीसरी-चौथी बार में तो उस लतीफ़े से अरुचि होने लगती है। हंसी को दीर्घजीवी बनाए रखने के लिए चुटकुलों की व्यापक खेती होनी चाहिए और यह तभी मुमकिन है जब निर्मल चित्त से समाज की व्यापक विसंगतियों पर चोट करने का साहस हो। सोना सस्ता होने से उनकी नींद उड़ गई, जिनके पास घनेरा था, जिसके पास है ही नहीं उसे भरपूर सोने को मिला। संजय दत्त ने अपराध किया या नहीं किया, इससे उन निर्माताओं को क्या जिनका पैसा फिल्मों में लगा हुआ है, उनकी नींद हराम है आजकल। पैट्रोल एक रुपया सस्ता हो गया, इससे नींद में भारी इजाफा हुआ हो ऐसा भी नहीं है। बोस्टन की मैराथन दौड़ में आतंकवादी धमाका कर गए, कितने ही मरे, सैंकड़ों घायल हो गए, पूरे अमरीका की नींद उड़ी हुई है। बैसाखी इसी हफ्ते गई है चचा, जाते-जाते मेरी टूटी टांग को सौंप गई है, बैसाखी। मन करता है कि अपनी बैसाखी के सहारे दुखों के इस नन्दनवन में बैसाखी का भांगड़ा करूं।

    —जे भई न बात!

    wonderful comments!

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