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    —चौं रे चम्पू!  हालफिलाल ऐसौ का देखौ जो तेरी आंखिन में बस गयौ?

    —चचा आज लोहड़ी का त्यौहार है, हमारी कॉलोनी के लोग रात में अलाव जला कर मूंगफलियां, फुल्लियां, रेवड़ियां आधी खाएंगे, आधी आग में फेंकेंगे, पर अलाव जलाना बेघरबार लोगों का  इन दिनों दिन-रात का काम है। ऐसे ठंड के मारे हुए दृश्य फिलहाल आंखों में बसे हैं। फुटपाथवासी गरीब लोग त्यौहार नहीं मना रहे, त्यौहार उन्हें मना रहा है।

    —जै का उलटबांसी भई?

    —बांस भी नहीं मिलते, जिन्हें उल्टा करके आग में डाल दें। कचरा, कूड़ा जो मिलता है, जलाते हैं बेचारे। ऐसी ठंड कि आत्मा तक जम जाय।  त्यौहार इन गरीबों को मना रहा है कि मूंगफली, रेवड़ी की हसरत मत पालो। पाला जो इन दिनों पड़ रहा है, बिना कंबल किसी तरह इस वक्त को निकालो। मर गए तो कंधा देने वाले भी नसीब नहीं होंगे। अपने वजूद के लिए लड़ रहे हैं हज़ारों निरीह।  रैन बसेरों में समर्थ गरीब कंबल खींच रहे हैं। अपनी आग के पास कमजोर गरीब को आने नहीं देते। बच्चे बिलख रहे हैं। माएं अपनी देह की गर्मी में बच्चों को दुबकाए हुए गठरी बनी बैठी हैं। वो सुविधाएं हैं ही नहीं जो इन रैन बसेरों में होनी चाहिए। न जूट मैट, न दरी, न रूई का गद्दा! शौचालय, स्नानघर तो न होने के बराबर हैं। शौचालय में कोई जाए तो स्लमडॉग के बच्चे की तरह निकले। और नहा कौन सकता है इस सर्दी में? बहुतों के लिए तो तन का मैल ही कपड़े का काम कर रहा है। रैन बसेरों में वही जा सकते हैं जो हर शिफ्ट के छः रुपए दे सकते हों। फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे पुलिस और गरीबों के बीच लुका-छिपी चलती रहती है। मैं तो निकला था सजती-संवरती दिल्ली देखने के लिए, पर इन रैन बसेरों की हालत देखकर चचा दहल गया। गुजर रहा था आर.के.पुरम सैक्टर तीन की एक झुग्गी बस्ती रविदास कैंप के पास से। वहां तो और भी दर्दनाक नजारा था।

    —का देखौ?

    —रात का वक्त, भयंकर सर्दी, कोई छत न शामियाना, सैकड़ों रोते-बिलखते बच्चे, बदहवास माताएं, लाचार पुरुष, एम.सी.डी. ने बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए, झुग्गियां गिरा दी। ठंड की परवाह किए बिना बच्चे मिट्टी के ढेर में अपनी किताब-कॉपियां ढूंढ रहे थे। महिलाएं अपने टूटे- फूटे बर्तन। पुरुषों के गालों पर जमे हुए आंसू थे। हाईकोर्ट ने एम.सी.डी. को नोटिस दिया है कि बिना सही इंतजाम किए झुग्गियां न तोड़ी जाएं। पर कहां सुनते हैं अमानवीयता की सीमा को लांघने वाले अधिकारी। एम.सी.डी. के कमिश्नर खुद आदेश दे रहे हों तो पुलिस भी क्या कर सकती है। पूसा रोड पर जब झुग्गियां गिराई थीं, तब भी एम.सी.डी. को ऐसा न करने की हिदायत दी गई थी। पर कानून अधिकारियों के अभिमान से ज्यादा बड़े नहीं होते। कुछ एन.जी.ओ. के लोग मदद करते नजर आते हैं। पर इनका भी हाल चोखा नहीं है।

    —चौं ऐसौ चौं?

    —सब की नहीं कहता चचा, पर अधिकांश एन.जी.ओ. चलाने वाले लोग विदेशी ग्रांट हड़पने के लिए ग़रीबों के साथ नकली सहानुभूति दिखाते हैं। उनके संचालक या संचालिका अपने चैन बसेरों से निकल कर कारों के काफिलों में झुग्गियों तक आएंगे, ग़रीबों के साथ फोटो खिंचाएंगे, पद्मश्री और तरह-तरह के पुरस्कार पाएंगे, जिन झुग्गियों से जुड़े होंगे उन्हें तो अपने रसूख के कारण बचा लेंगे, लेकिन दूसरी झुग्गियां टूटेंगी तो उन्हें नहीं बचाएंगे। वाह रे सोशल वर्क! रविदास कैंप के उजाड़ में महतो ने एक दूसरे कैंप की दीवार दिखाई और बोला एम.सी.डी. ने ये नहीं गिराई क्योंकि इसे आशा वाली मैडम चलाती हैं। बहरहाल चचा, ये देश अमानवीयता के कंधों पर सहानुभूति की लाश ढो रहा है। यह अमानवीयता सुंदर होती दिल्ली का ऐसा कूबड़ है जिसे ठीक करने वाला डॉक्टर न शासन में है न प्रशासन में। मीडिया भी क्यों दिखाएगा ये नज़ारे, उसके संपन्न दर्शक को इन दृश्यों से वितृष्णा होती है। इनकी कवरेज से टी.आर.पी. नहीं बढ़ती। एनजीओज़ के प्रमुख कार्यकर्ता फैब इंडिया के कपड़े पहन कर गरीबों के प्रति अधर सहानुभूति बहाते हुए इक्का-दुक्का टॉक शो में जरूर दिख जाते हैं, पर चैनल वाले अपनी ओ.बी. वैन लेकर झुग्गी बस्ती में नहीं जाते। कुचले हुए दृश्यों के रंग नहीं दिखाते। दिल दुखता है चचा।

    —तौ रैन बसेरे तेरे नैन बसे रे!

     

     

    wonderful comments!