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  • राजनीति या नीतिराज
  • राजनीति या नीतिराज

     

     

     

    —चौं रे चम्पू! अनीति समाज ते कब खतम होयगी, जे बता?

     

     

    —चचा! जब राजनीति के स्थान पर नीतिराज आएगा, तब ख़त्म होगी। नीतिराज अन्दर से आता है, राजनीति बाहर से आती है। अनीति तभी कम होगी जब अन्दर से मनुष्यता के प्रति एक  हूक-सी उठेगी कि दूसरा भी मनुष्य है। इसके साथ ऐसा-वैसा सुलूक नहीं करना चाहिए।

     

    —बात तौ जंचउअल कही ऐ, पर खुलासा करकै बताऔ।

     

    —चचा अनीति बढ़ाने में राजनीति का बहुत बड़ा हाथ है। चुनाव आने वाले हैं। हर पार्टी में आंतरिक संकट है। बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई। टिकट की मारा-मारी। अन्दर की फूट। लूट की हिस्सेदारी में गैर-बराबरी। लूट की छूट में गैर-बराबरी। आज किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को देख लो। ऐसा हो नहीं सकता कि उसने छोटा-मोटा अपराध न किया हो। छोटा नहीं, मोटा ही किया होगा। कार्यकर्ता क़ानून हाथ में ले लेता है, खोटा काम करता है, तो बचाना किसका फर्ज़ है? उसके राजनीतिक आक़ाओं का है न? आक़ाओं ने ऐसा बंदोबस्त कर दिया कि धड़ल्ले से क़ानून हाथ में लेकर घूमो प्यारे।

     

    —का मतलब?

     

    —महिला विधेयक वर्षों से अटका हुआ है, लेकिन प्रत्येक पार्टी के महाप्रभुओं  ने संसद भवन के अन्दर अठारह मिनट में एक क़ानून में संशोधन कर दिया। सी.आर.पी.सी. की धारा तीन सौ नौ और इकतालीस में। भइया अपराध करो, कोई बात नहीं! तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। और लो, तत्काल जमानत ले लो। सज़ा होगी तब होगी। अब अपराध करते ही सींखचों के अन्दर जाने की बाध्यता समाप्त।

     

    —कैसे अपराध?

     

    —जैसे, धार्मिक उन्माद फैलाओ, धार्मिक भावनाओं पर चोट करो, गाली-गलौज करो, लड़की का सरेआम दुपट्टा खींचो, सरेआम छेड़खानी करो, चोरी-डकैती की कोशिश करो, नकली सिक्के बनाओ, नकली स्टाम्प बनाओ और बेचो। किसी का सिर फोड़ दो। इन मामूली अपराधों के लिए किसी को क्यों बन्द किया जाए? अपराधी जो खुला घूम रहा था और खुल-फैल कर घूमे। चलें तो चलते रहें मुक़द्दमे। चचा, विदेशों की तर्ज पर क़ानून में संशोधन तो कर दिया पर ये नहीं देखा कि वहां राजनीति के साथ नीति का राज भी चलता है। जिस आदमी को जमानत मिलती है उसे ये पता होता है कि अगर उसने दुबारा ऐसी कोई हरकत की तो उसका अपराध बहुत तगड़ा हो जाएगा…. और वहां आबादी भी तो कम होती है, मुक़द्दमे जल्दी निपटते हैं। यहां सात साल तक यह भी तय नहीं हो पाएगा कि अपराध इसने किया भी था कि नहीं। इस दौरान वो इतना बड़ा अपराधी बन चुका होगा कि हथकड़ी भी बेकार।

     

    —हथकड़ी चौं बेकार?

     

    —चचा, सबसे चमत्कारी ज़ेवर है हथकड़ी! जो छोटे आदमी के लिए साइज़ में छोटी होती है और बड़े आदमी के लिए बड़ी। छोटे आदमी के पड़ी, तो उसकी तो ज़िंदगी भर के लिए खटिया खड़ी! बड़े आदमी को पड़ने की संभावना भी हुई तो. . . उसकी अस्पताल में खटिया पड़ी! और दुःखी रहेगी पुलिस।

     

    —पुलिस चौं दुःखी रहैगी रे?

     

    —अरे चचा, जब डंडा मचलेगा तो किसकी पिटाई करेंगे? सड़क से पकड़ कर चौकी पर तो ले आएंगे, वो अंदर आते ही बाहर निकाल लेगा मोबाइल। पहले तो पूछते थे, साहब जरा एक फोन मिला लूं? थानेदार कड़क कर कहता था— ‘तेरी ये हिम्मत, फोन मिलाएगा’! अब अपराधी मोबाइल से वकील बुलाएगा, आकाओं की गुहार लगाएगा। चुनाव जीतना है तो आ जाओ और जमानत देकर मुझे इस किल्लत और जिल्लत से बचाओ। हर अपराधी इस कानून को अपने हाथ में ले कर चलेगा और कहेगा कि संशोधन हो चुका है, अबे पुलिसिए, तू मुझे हाथ नहीं लगा सकता। चचा, कानून में संशोधन की मार ग़रीब आदमी को पड़ेगी, बेचारा अपने लिए जमानती कहां से लाएगा?

     

    —तब तौ और अनीति बढ़ैगी?

     

    —सौ परसैण्ट बढ़ेगी। अपराधी कहेगा— ‘ओ वर्दीधारी! कानून मेरे हाथ में और धारा मेरे साथ में। देख जा रहा हूं, पर जाने से पहले ये तो बता दे कि टॉयलेट कहां है’? पुलिस वाला खिसियाएगा— ‘अच्छा टॉयलेट भी अब यहीं जाएगा’? वो बोलेगा— ‘हां धारा पर धारा बहाऊंग़ा’।

     

    —और नीतिराज में?

     

    —नीतिराज तो अंतरात्मा की आवाज़ है। हो सकता है कि बहुत सारे लोगों के अन्दर की आवाज़ एक साथ उठे। घटनास्थल पर ही दे दनादन हो जाए। राजनीति के बनाए नियम ताक पर रखकर, हो सकता है कि भीड़ ही कुछ अपराधों का तत्काल निपटारा कर दे। अनीति बढ़ती है तो कुछ भी हो सकता है चचा।

     

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