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    —चौं रे चम्पू! तोय का चीज हैरान कर रई ऐ इन दिनन?

    —यों तो बहुत हैं, पर एक चीज़ से लगभग हैरान हूं।

    —बता, देर चौं लगावै?

    —चचा! मैं समझता था कि कोई सचमुच का कवि, चाहे-अनचाहे राजनेता हो सकता है, पर कोई राजनेता सचमुच के कवि के रूप में प्राय: नहीं पाया जाता। मैं हैरान रह गया यह देख कर कि एक राजनेता सचमुच के कवि हैं।

    —कौन ऐ लल्ला?

    —नाम बाद में बताऊंगा, पहले उनकी दो कविताओं के बारे में जान लो। एक तो मैंने सुनी इंडिया हैबीटैट सेंटर की ‘जयजयवंती साहित्य संगोष्ठी’ में और दूसरी पढ़ी उनकी ‘आई विटनैस’ नाम की किताब में। पहली कविता में मां अपने बेटे के लिए कुछ कह रही है और दूसरी में बेटा अपनी मां से कुछ कह रहा है।

    —सुना।

    —कविताएं अंग्रेज़ी में थीं। मैंने उनका भावानुवाद किया, कुछ अंश सुन लो। पहली में मां की ममता का आख्यान है। मां कहती है—  मैंने पाला तुझे दीर्घकाल, अपनी कोख में मेरे लाल! और जब तू आया, तो मैंने पाया— अपना प्यार, साँचे में ढली मज्जा की सज्जा का रूपाकार। सौंदर्य-मग्न, अनगढ़ और नग्न! तूने किया होगा अनवरत संघर्ष कोख की कोमल सतह से। छुअनों से राह टटोलते हुए, अपनी फ़तह से, तू जल्दी ही सीख गया, आहार पोषण फिर विश्राम, सुख से, पीने लगा संसार का सुधा-सार, मुख से। मेरी तरह तू भी तो समझ गया वह बंधन, जिसका हमने किया संवर्धन। तेरे क्रंदन से समझती थी ज़रूरतें तेरी ग़ज़ब था तेरा विरोध-प्रदर्शन। शब्द-रहित भाषा जो पहलेपहल सीखी, ममत्व की गूंज सरीखी। प्रेम की कोमलता जो पहलेपहल जानी, कोमलता का स्पर्श अद्भुत लासानी। वह स्पर्श बहरहाल, हमारे साथ सदा रहेगा मेरे लाल। बहुत जल्दी तूने निज रास्ता निकाला, अपनी क्षमताओं का ज़ोर जमा डाला। जो भी चीज़ दिखे उसे उठाने की ठानी, जो तेरी नज़रों से बचा कर रखी गई, वह भी उठानी। जिस चीज़ पर भी अपना दावा दिखाया, मालिकाना हक़ ही जताया, बांटना तो मेरे लाल तुझे नहीं आया। अपार चिरंतन आनंद के क्षण तूने बिताए, चिंता नहीं और कुछ पाए न पाए। फिर समय आया कि तू उस दुनिया को भी जाने, दूर हैं तुझसे जिसकी पहुंच के मुहाने। समय आ गया तूफ़ानों का सामना करने की कला सीखने का, और उसके लिए दंडित किए जाने पर चीखने का। जो युद्ध तूने प्रारंभ में जीते उन्हें हारना अब तेरी नियति था, लेकिन मुद्दा तो प्रगति था। समय आ गया था कि तुझे उड़ने दिया जाय तू अपने मन की सुने, रास्ता खुद तय करे, ख़ुद चुने। तुझको बड़ा करने के लिए मैं खड़ी रही, खड़ी रही, बिछोह की पीड़ा में  दिल को कड़ा करके बिलखती पड़ी रही। मैं जान रही थी कि मन तो था तेरा भी भारी, मेरी ममताभरी छांव के अभाव के भाव में भी कर रहा था आगत की तैयारी। मेरुदंड तान कर अकेले झेलने होंगे दुनिया के झमेले, भीतर बाहर लड़ते रहने के लिए, चाहिए होगा कुछ कहने के लिए। और अब जब भी होती है कोई संदेह भरी दुविधा, तो मुश्किल से ही लेता है मां की सलाह की सुविधा। अब वह समय आ गया है कि तू तराशे एक ऐसी कोख, जो बने तेरा घौंसला ले पूरा हौसला, किसी ऐसे साथी के साथ, तेरी परवाह करे. थामा हुआ हाथ। तू उदार, ज़िम्मेदार, दमदार है, बढ़िया से बढ़िया का हक़दार है। और मुश्किल तूफानी घड़ी में जब तुझे लगेगा कि सब कुछ समाप्त और विपरीत हर कृपानाथ, तब तू पाएगा मुझे अपने साथ। चाहे दुनिया तेरे बारे मेंम्कुछ भी सोचे कुछ भी बोले वाचाल, पर मुझे तुझ पर हमेशा गर्व रहेगा मेरे लाल।

     

     

     

     

     

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