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  • मनुष्य और कुत्ता

    —चौं रे चम्पू! सिडनी में सिरफ रंगल-मंगल और दंगल ई कर रह्यौ ऐ कै कोई कबता-फबता ऊ लिखी ऐ?

    —चचा, यहां सपने में ग़ज़ल हो रही हैं। जब एक-दो शेर हो जाते हैं तब याद आता है कि अरे ये तो सपना है, कहीं सुबह तक भूल न जाऊं, मुझे उठकर काग़ज़-कलम लेने चाहिए। कागज-कलम तलाश करता हूं और लिखने लगता हूं। ग़ज़ल पूरी हो जाती है। खुश होता हूं। अपने अशार पर मुग्ध होता हूं। किसे सुनाऊं? किसे जगाऊं? बिस्तर से उठकर डैक्स्टर के पास जाता हूं….

    —जे कौन ऐ?

    —डैक्स्टर! सबरीना का एक बड़ा प्यारा सा टॉय पूडुल कुत्ता है चचा। उसे दो दिन के लिए कहीं जाना था सो हमारे यहां छोड़ गई। तो मैं डैक्स्टर महाशय के सामने अपना हासिले-गज़ल शेर गुनगुनाता हूं। फुसफुसाते हुए सुनाता हूं, ताकि कोई जग न जाय। डैक्स्टर एक समझदार कुत्ता है, पर मेरी ग़ज़ल वह बेचारा क्या समझता, कूं-कूं करके अपने बिस्तर में सो जाता है। फिर मैं भी काग़ज़-कलम तकिए के नीचे रखकर सो जाता हूं। सुबह जब उठता हूं तो देखता हूं कि डैक्स्टर मियां अपने झबरीले बालों में छिपी आंखों से मुझे इस आशा में निहार रहे हैं कि मैं उन्हें प्रात:कर्म के लिए बाहर घुमाने ले जाऊंगा। ले जाऊंगा भैया, ले जाऊंगा! तसल्ली रख! ज़रा अपनी ग़ज़ल तो देख लूं। तकिया हटाता हूं, पर वहां से कुछ भी हासिल नहीं कर पाता। वहां कुछ नहीं है। यानी सब कुछ सपना था, ग़ज़ल सपना थी। कागज-कलम सपना थे। सचाई के रूप में रह गए तकिया, बिस्तर, मैं और डैक्स्टर!

    —एक ऊ सेर याद नायं रह्यौ का?

    –याद था चचा, थोड़ी देर तक याद था एक शेर, लेकिन दिन की चकाचौंध से घबरा कर दिमाग के गलियारों में कहीं छिप गया। दिल-दिमाग में रहेगा तो किसी न किसी रूप में, कभी न कभी निकलेगा ज़रूर। उसके लिए फिर सेसपना देखनापड़ेगा, लेकिन दिन में।

    ढूंढता हूं जो सपने में ही कहीं खो गया होता है। ये तो एक सच्चाई है लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि रचने की प्रक्रिया कुछ-कुछ ऐसी होती है कि जो सपने हम दिन में देखते हैं सपनीले होते हैं। हम कुछ रच रहे होते हैं। सपने सपनीले होते हैं। और अपने सपने जो दिन में हम देखते हैं उनके के लिए शब्दों के पीछे भागते हैं। लेकिन रचना तब होती है जब शब्द आपके पीछे भागें और शब्द आपसे कहें कि हम तुम्हारे हैं, हम आपके इर्द-गिर्द मंढरा रहे हैं। हमें रख लो, अपने दिल में रख लो, अपने दिमाग में रख लो और कहीं जगह नहीं है तो कुर्ते की जेब में रख लो। बटुए में रखे लो। घर जाकर निकालना अलग-अलग जेबों से और सहेज लेना एक कागज पर।

     

     

    —यहां पच्चीस दिन हो गए तरह-तरह की कविताएं उमड़ती हैं। क्योंकि सिडनी में इतना बड़ा आकाश दिखाई देता है, जितना दिल्ली में नहीं दिखाई देता। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में आकाश नहीं है। शायद इससे बड़ा है, लेकिन वहां घुटन का प्रदूषण है, प्रदूषण की घुटन है,  दूर तक लोग देख नहीं पाते। दूर तक आकाश साफ नहीं होता। अब चूंकि यहां दूर तक देख पाते हैं तो एक प्रकार की पारदर्शिता यहां के जीवन में दिखाई देती है। घर लोग अपने रहने के लिए बनाते हैं, चोरों से सुरक्षा के लिए नहीं बनाते। अपराध तो सब जगह होते हैं लेकिन यहां मानकर चलते हैं कि कम होने चाहिए। व्यवहार का खुलापन देखकर अच्छा लगता है। फिर जो अजनबियों से भी मुस्कान का आदान-प्रदान और हालचाल का पूछना है, ये एक ऐसी संस्कृति है जो होनी चाहिए। हर जीवधारी में होती है। अपना कोई स्वजातीय मिल जाए तो सब कितने प्रसन्न होते हैं। मुझे तो कल सिडनी पार्क में बड़ा मजा आया। अनुराग के साथ ———– को लेकर जिसका नाम ————–है, घूमने गए। वहां देखा कि कितने ही तरह के कुत्ते अपने मालिकों के साथ उस पार्क में आए थे अपने प्रातःकर्म के लिए और उनके मालिक हाथ में पॉलिथिन लिए हुए पीछे-पीछे चल रहे थे, कहीं कुत्ता आगे, कहीं मालिक आगे और बेकरारी से प्रतीक्षा कर रहे थे मालिक लोग कि ये अपना प्रातःकर्म करेंगे और तैयार रहते थे, जैसे ही विसर्जन हुआ ये अपने पॉलिथिन में जैसे रबड़ी-मलाई रख रहे हों, रख करके मालिक लोग बड़ी निश्चिंत मुस्कान तृप्ति की जैसे वही निश्चिंत होकर फायरक होकर के आए हों। फिर ये देखा कि वे कुत्ते अलग-अलग प्रजाति के एक-दूसरे को भौंक नहीं रहे हैं। हमारी गली में तो दूसरी गली का आ जाए तो फाड़ने को दौड़ते हैं। कुत्तों पर भी मनुष्यों का प्रभाव पड़ गया है और यहां आदमी ने भी अपने स्वभाव को कुत्तों में रूपांतरित किया है। क्यों भौंकते हो बिना बात के। कहा बैठ जाओ तो बैठ जाते हैं। तो मनुष्यता की और साथ रहने की एक ट्रेनिंग होती है। हमारी संस्कृति तो पाँच हजार साल पुरानी है। यहां की तो दौ सौ-ढाई सौ साल पुरानी है। मैं इंग्लैंड की संस्कृति को भी इसमें जोड़ सकता हूं। लेकिन इस देश की इस लिहाज से तो ज्यादा नहीं है जो आधुनिक ऑस्ट्रेलिया है। तो कुत्तों के लिए, बच्चों के लिए, मनुष्यों के लिए पूरे इंतजामात हैं। तो वे बाध्य करते हैं लिखने के लिए कि लिखो। फिर जब आपका सान्निध्य होता है पालतू जानवरों से तो आप बहुत सारी चीजें जान पाते हैं जो ऐसे न जान पाएं निकटता के अभाव में। —————– को हड्डी की शेप का बिस्कुट दिया गया आज सुबह। पेट भरा हुआ था उनका, लेकिन वो शिकारी जाति का कुत्ता। यहां छुटपन से ही पाल लिया गया और ट्रेनिंग के बाद सुसभ्य और सामाजिक हो गया। जो उसके जींस हैं, जो उसकी आनुवंशिकी है उसमें उसके शिकार की चेतना है। उसने पहले तो हड्डीनुमा बिस्कुट को इधर-उधर फेंका और ऐसा दिखाया कि जैसे वो कोई शिकार कर रहा है। बिस्कुट को अपने सामने फेंका और ऐसे देखने लगा कि जैसे ये हिलेगा तो इसको फिर से दबोच लेगा और फिर वो अपने मुंह में दबाकर बिस्कुट अपने बिस्तर में ले गया। आनुवंशिकी उससे कहती है कि अगर तुम्हारे पास कोई ऐसा भोजन है तो उसको खोलकर मिट्टी में दबा दो ताकि वो मुलायम हो जाए, हफ्तेभर बाद निकालो, ऐसा इसके पूर्वज करते रहे होंगे। इसने अपने विस्तरे में मिट्टी खोदने का बहाना लिया और ऐसा लगा नया गढढा, नई मिट्टी। उसकी खाने के मामले में जो सृजनात्मकता है वो हमें देखने को मिली। हमें देखता जा रहा है कि हम उसे देख तो नहीं रहे हैं। अनुराग ने हमें कहा कि इसकी तरफ देखना मत वरना ये रोने लगेगा कि अब मेरे खामे का क्या होगा। तो हर प्राणी को अपने भोजन की चिंता है, अपने समाज की चिंता है। यहां के कुत्ते बताया गया मुझे कि इनकी शोसलाइजिंग पहले की जाती है ताकि वे दूसरे कुत्तों को देखकर आक्राम
    क न हों। यहां के कुत्ते आपस में चूमते-चूमते मिलते हैं, वही यहां के समाज में देखने को मिलता है। यहां की प्रधानमंत्री भी अगर किसी से मिल रही हैं तो चूम कर, गले लगा कर। कल टीवी पर मैंने देखा। हमारे यहां तो कोई मिलने आ जाए तो जैड  सुरक्षा वाले उसे पन्द्रह फिट दूर रखेंगे, चूमना तो बहुत बड़ी बात है। क्यों सुरक्षा चक्र बने, क्यों न ऐसा हो जाए कि  मनुष्य मनुष्य के करीब आए, एक सहज स्पर्श से एक-दूसरे का अभिवादन करे। खुशी की बात है, यहां नजर न लगे, यहां कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई। लश्कर, तालिबानी आतंकवादी यहां नहीं आ पाए। बहुत शांति और सुकून है, वैसा भय नहीं है जैसा कि इस दौर में आज भूमंडल पर आतंकवाद के कारण है। तो अगर मैं दिल्ली रहूं तो मेरे इर्द-गिर्द जो भाव-विचार मंढराएंगे वो आतंकवाद के भय के होंगे, असुरक्षा के वातावरण के होंगे, मनुष्य और् मनुष्य के बीच की दूरी के होंगे। अब एक महीने में किसी स्थान के प्रति बहुत सारी राय नहीं बनाई जा सकती। लेकिन फिर भी यहां ये देखकर अच्छा लगता है कि हम एक-दूसरे की आवश्यकताओं की, अपेक्षाओं की कद्र करते हैं।

    —मनुष्यता का पहला धर्म है कि आपका बहुत कुछ जा नहीं रहा और किसी का भला हो सकता है तो उतना भला करने में क्या नुकसान है।

    —हमारी छोटी-छोटी बातें बहुत कुछ मायने रखती हैं हमारे सामाजिक संबंधो में और इन सबका जो प्रभाव है वो मैं यहां के जीव-जंतुओं में देख रहा हूं, बड़ा सामाजिक समानांतर अध्ययन कर रहा हूं इन दिनों मैं कि कुत्ते जब सिडनी पार्क में मजे करने आते हैं सुबह-सुबह तो वहां जो कैंटिन चल रही हैं, उन कैंटिन वालों को बड़ा आभारी होना चाहिए उन कुत्तों का कि वे कुत्ते घुमाने लाते हैं अपने मालिकों को। वहां कैंटिन में कुत्तों का ब्रेकफास्ट भी रखा है और आदमियों का भी। पहले कुत्ते ब्रेकफास्ट करते हैं फिर आदमी करते हैं। फिर खेलते-कूदते हैं। आदमी कुत्ते के पीछे भागता है, कुत्ता आदमी के पीछे भागता है। बहुतों के पास बॉल होती है, कुछ टॉय होते हैं खेलने के लिए। बॉल दूर फेंकी जाती है, कुत्ता उसके पीछे भागता है, उठाके मालिक को लाकर देता है। मालिक कुछ हिदायत देते हैं। यहां के कुत्ते भी अच्छी अंग्रेजी जानते हैं। इतनी सारी बॉल होती हैं, लेकिन कोई कुता किसी और की बॉल नहीं उठाता, अपनी ही बॉल उठाकर लाता है। यहां के कुत्तों में एक सामाजिक समरसता है। यहां का खुला समाज नया कुछ करने की प्रेरणा देता है। हर नई परिस्थिति, हर नया दृश्य आपको नए कल्पनालोक में पहुंचाता है। आप मानव जगत का अध्ययन करते हैं, प्रकृति से अपनी तुलना करते हैं कि क्यों भेड़िया धर्म आतंकवादियों में आ गया। एक कुत्ता समझता है कि एक बच्चे को काटना नहीं है, नुकसान नहीं पहुंचाना है। बच्चे भी कुत्तों के साथ हिल-मिलकर खेल रहे हैं, उनमें कोई भय नहीं है। हम क्यों भय भर देते हैं समाज में। हमें भय मुक्त करना चाहिए समाज को।

    —हर लेखक, हर कवि की यह तमन्ना होती है कि भय मुक्त, शोषण विहीन, सुखी और सुन्दर समाज की संरचना हो जिसमें हर कोई सुखी हो।

    —वेस्ट का जो बेस्ट है उसे हम अपना लें और जो वैस्ट है उसे छोड़ दें।

    —हम अपने लिए दुखों की फसल बो रहे हैं। हम क्यों एक-दूसरे से नफरत करते हैं, क्यों एक-दूसरे की प्रगति पर कुढ़ते-चिढ़्ते हैं।

    —मन लगना चाहिए जहां आपके बच्चे हैं, लेकिन बच्चों की अपनी दुनिया है, उनके अपने सरोकार हैं, उनके अपने कामकाज हैं। सवाल वही है हम अपनी डाल से बिछुड़ने के बाद फिर उस डाल पर नहीं लग सकते, डाल का पत्ता कहां-कहां नया बीज बनकर अपनी नई फुलवारी बनाता है। यहां जो भारतीय आए हुए हैं, सबकी अपनी फुलवारी महक रही है। अब अपने वहां के बरगद को उखाड़कर लाओगे और यहां उगाओगे तो वो यहां उगेगा क्या? जितनी भी जिन्दगी हमारे पास है, उसे बेहतर तरीके से बिताया जाए और जिसमें आनन्द की खोज में मनुष्य अब तक विकास यात्रा कर रहा है, वह सतत यात्रा जारी रहे। हम सुखी, सुन्दर, मस्त, व्यस्त रहें और हमारा साहित्य इसी की संरचना करता रहे।

     

     

     

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