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  • प्रकांड शॉल कांड

     

     

     

    –चौं रे चम्पू! सर्दी गई, पर तैनैं जो सौल दई, बड़ीई हलकी और खूबई गरम। हमाए बड़े काम में आई, कहां ते पाई?

     

    –चचा, ये पहले एक मंत्रीजी ने ओढ़ी, फिर तुम्हारे चम्पू को मिली।

     

    —तौ, उढ़ी-उढ़ाई सौल चौं लई तैंनै?

     

    —अब मुझे आपको पूरी कहानी सुनानी पड़ेगी। इंडियन ऑयल का कविसम्मेलन था। आठ कवि दो कवयित्री। संचालक था मैं। आप जानते हैं कि मंत्री लोग सारी सदाशयता के बावजूद उन कार्यक्रमों में समय पर नहीं पहुंच पाते, जो अत्यधिक प्राथमिकता के नहीं होते। मंत्रालय और मीडिया द्रुत को विलंबित कर देते हैं। निर्धारित समय छह बजे तक सभागार ठसाठस भर चुका था। जब उतावली की तालियावलियां नेपथ्य तक पहुंचीं तो मैंने त्रिपाठी जी से अनुरोध किया कि दीप-प्रज्ज्वलन और कवियों को पुष्प-गुच्छ बड़े अधिकारियों से करा दीजिए। जब मंत्री जी आ जाएं तो स्वयं शॉल ओढ़ें और कवियों को उढ़ा दें। तीन प्रकार के शॉल थे। पहला मंत्री जी के लिए सुपर पश्मीना, जो आपके पास है। आठ मर्दाने शॉल कवियों के लिए, दो रंगीन कढ़ाई वाले कवयित्रियों के लिए। मंत्री जी जब आए, कवि रमेश शर्मा सुना रहे थे।

     

    —रमेस अच्छौ गीतकार ऐ, कौन सौ गीत सुनायौ?

     

    —गीत में कवि की पत्नी कवि को ताना मार रही है,‘क्या लिखते रहते हो यूं ही! चांद की बातें करते हो, धरती पर अपना घर ही नहीं। रोज बनाते ताजमहल, संगमरमर क्या कंकड भी नहीं। सूखी नदिया नाव लिए तुम बहते हो यूं ही। क्या लिखते रहते हो यूं ही।’ लंबा गीत था, लेकिन  मंत्री जी गीत के समापन पर ही प्रकट हुए। कार्यक्रम रोका गया। त्रिपाठी जी ने माइक संभाला। मुख्य अतिथि, पैट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को ये वाली शॉल उढ़ाई गई। तदुपरांत उन्होंने कवियों को शॉल देना प्रारम्भ किया।

     

    —फिर का भयौ?

     

    —इन्डियन ऑयल की एक महिला अधिकारी ट्रे में शॉल रखकर ला रहीं थीं। इससे पहले कि त्रिपाठी जी कवियों का नाम लेते मंत्री जी ने एक किनारे से शॉल देना प्रारम्भ कर दिया। कोने पर बैठी थीं कविता तिवारी और सीता सागर, उन्हें गलती से मर्दाने शॉल मिल गए। फिर उदय प्रताप सिंह जी, विष्णु सक्सेना, सुरेन्द्र शर्मा, सुनील जोगी, हरिओम पवार ने पाए। प्रदीप चौबे और रमेश शर्मा को महिलाओं वाले शॉल मिले। मेरी बारी आई तो मेरे लिए शॉल ही नहीं बचा था। वह युवा महिला अधिकारी जो शॉल लेकर आ रही थीं, उलझन में थी। मंत्री जी खड़े हैं, मैं खड़ा हूं, शॉल नहीं है। सभागार पूरा आनंद ले रहा है। कार्यक्रम में कोई विघ्न न पड़े, यह सोचकर मैंने अपनी पीली शॉल, जो मैं घर से ओढ़ कर गया था, उन्हें देने की कोशिश की, आप इसी को उढ़ा दीजिए। उन्होंने मना कर दिया। बात सांस्कृतिक मर्यादा की सी हो गई। त्रिपाठी जी ने चतुराई से मंत्री जी को माइक पर बुला लिया। धर्मेंद्र जी ने उद्बोधन प्रारम्भ किया, मैंने बहुत पहले भी कवियों को मंच पर सुना था और आज बरसात के बावजूद, आप लोग इतनी संख्या में कविसम्मेलन में उपस्थित हुए हैं। लगता है महफ़िल अच्छी ज़मने वाली है। कुछ दिन पहले मैं एक हिन्दी दिवस के अवसर पर गया था, मुझको निराशा हुई थी, लोग कम थे। लेकिन मैं आज इन्डियन ऑयल को बधाई देता हूं कि इसने भारत की इस परम्परा को आगे रखा है। आप सभी को नववर्ष की पुनः बधाई, लेकिन मैं आपको बता दूं कि शॉल तो मैं देकर ही जाऊंगा।’ इस बीच मंत्री जी ने अपना शॉल मंगवा लिया था। वह शॉल मुझे उढ़ाकर मंत्री जी चले गए।

     

    —कबता नायं सुनीं बिन्नै?

     

    —आ गए, यही क्या कम था। बाद में मैंने बड़े मज़े लिए। माइक संभालते हुए कहा, देखिए अभी एक प्रकांड शॉल कांड हुआ। मैंने इसका सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक एवं रहस्यवादी अध्ययन किया। पुरुषवादी सोच से कविसम्मेलन भी अछूते नहीं हैं, यहां पुरुषों को पहले शॉल दी जाती है, महिलाओं को बाद में। इस कारण शॉलक्रम बिगड़ गया। मनौवैज्ञानिक अधययन बताता है कि इस समय कविता तिवारी और सीता सागर अपने शॉल प्रदीप चौबे और रमेश शर्मा से बदलना चाहती हैं, जिसके लिए ये दोनों कवि तैयार नहीं हैं। प्रदीप चौबे की पत्नी साथ में आई हैं, चौबे जी के पास उन्हें फोकट में प्रसन्न करने का अवसर है। रमेश शर्मा की पत्नी ताना मारती हैं, ‘क्या लिखते रहते हो यूं ही’ तुम्हारी कविता से कोई लाभ तो होता नहीं। वे भी शानदार शॉल देकर कविता की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। इस प्रकार दोनों शॉल दो भाभियों को जाएंगे। इसलिए आप तालियां बजा दीजिए। सांस्कृतिक विश्लेषण यह कि हमारे देश में अधीनस्थ कर्मचारी अपने आश्रदाता के प्रति त्वरित वफादारी निभाते हैं। मंत्री जी को जो शॉल आदि सामान मिला, वह उनके कर्मचारियों ने तत्काल कार तक पहुंचा दिया। इसी कारण शॉल आने में विलम्ब हुआ। रहस्यवादी अध्ययन यह कि ग्यारह शॉल आए थे, एक गायब कहां हो गया? तत्काल विश्लेषण से तालियां बजीं और कविसम्मेलन फिर से शुरू।

     

    —रहस्य ते परदा उठौ कै नायं?

     

    —सारा रहस्य तो परदे का ही था। त्रिपाठी जी ने बाद में बताया कि आठवां मर्दाना शॉल सिरीफोर्ट सभागार के विराट परदे की तलहटी में पाया गया। ट्रे में रखने की हड़बड़ी में एक गिर गया, लेकिन आदरणीया महिला अधिकारी की आंखों से आंसू भी गिरा गया।

     

    —कबहुं कबहुं गल्ती है जाय, कोई बात नायं! पर गल्ती नायं होती तौ मोय ऐसौ फट्टकिलास सौल कैसै मिल्तौ! 

     

    wonderful comments!