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  • चौं रे चम्पू
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  • पण्डा! अण्डा, डण्डा-हिन्दीधारी फण्डा।
  • पण्डा! अण्डा, डण्डा-हिन्दीधारी फण्डा।

     

    —चौंरे चम्पू, तू भोत हल्ला मचाऐ यूनिकोड-यूनिकोड। जे यूनिकोड है का बला?

    —चचा, इसको बला मत बताना। ये कर रहा है, हमारा, हमारी हिन्दी का और हमारे भविष्य का भला। यूनिकोड भाषाओं के लिए एक महागोद है जिसमें संसार भर की तमाम महत्वपूर्ण भाषाएं आमोद कर रही हैं।

    —तो जे बनायौ किन नै? है का चीज़?

    —चचा, कम्प्यूटर में, कम्प्यूटर को एक सुविधा मिली है। हमारी भाषाओं के लिए।

    —तो कम्प्यूटर तो अंग्रेजी में काम करेएं।

    —बहुत ख़राब सोच है चचा आपका। जानकारियों के अभाव में जैसा आप सोचते हो, ऐसा बहुत सारे सोचते हैं। दरअसल कम्प्यूटर कोई एक भाषा नहीं जानता, सिर्फ अंग्रेजी जानता हो, ऐसा नहीं है, वो केवल दो चीजें जानता है–एक अण्डा और एक डण्डा।

    —अच्छा भैया, अण्डा और डण्डा! अब कछु खोल कऐ बता पण्डा।

    —चचा! अण्डा मायने शून्य, जिसका आविष्कार हमारे देश ने किया है, ऐसा बताया जाता है और डण्डा मायने एक की संख्या। कम्प्यूटर केवल इन दो चीजों को जानता है। ज़ीरो और एक, इन्हीं के गणित लगा-लगा के सारी चीज़ें बन जाती हैं। भाषाएं भी बनती हैं, चित्र भी बनते हैं, ध्वनियां भी बनती हैं, चलचित्र भी बनते हैं और सारे काम हर क्षेत्र के करते हैं ये अण्डा और डण्डा यही है कम्प्यूटर का बेसिक फण्डा। जहां तक यूनिकोड का सवाल है, ये सन 1987 में एक संस्था बनी, उसने सोचा कि संसार भर की जितनी अच्छी-अच्छी भाषाएं हैं उनके लिए एनकोडिंग प्रणाली विकसित की जाए। इससे पहले मैं आपको ये बता दूं कि कितने अण्डे और कितने डण्डे इन्हीं के गणित से बनती हैं सारी चीज़ें और इसको कहते हैं एनकोडिंग प्रणाली। अण्डे कितने भी हो सकते हैं और डण्डे भी कितने हो सकते हैं, आगे-पीछे हो सकते हैं कि चार अण्डे आए फिर एक डण्डा आया कि दस डण्डे आए फिर एक अण्डा आया। लेकिन उनके प्रम्यूटेशन और कॉम्बिनेशन से बनती हैं सारी चीज़ें।  जब हम भाषाओं की बात करते हैं तो कितने अण्डे और कितने डण्डे से अंग्रेजी का ‘ए’ बनेगा ये निश्चित है और यह निश्चित नहीं था पहले कि कितने अण्डे और कितने डण्डे से हिन्दी का ‘अ’ बनेगा। हमें आधारित रहना पड़ता था अंग्रेजी पर। हम क्या करते थे कि अंग्रेजी के जो लिपि चिन्ह थे उनके ऊपर अपनी भाषा के वर्णों के चित्रों की तस्वीर चिपका देते थे। जैसे हम अंग्रेजी में ‘टी’ टाइप करंगे तो ‘टी’ छपेगा लेकिन हमने ‘डी’ के ऊपर ‘क’ चिपक दिया तो ‘डी’ दबाओगे तो ‘क’ छपेगा, ये थी ‘इसकी’ प्रणाली।

    —किसकी प्रणाली?

    —किसकी नहीं, चचा उड़ाओ मत मेरी खिसकी। न इसकी न उसकी। ‘इसकी’ का मतलब है इंडियन कोड स्टैंडर्ड। ये विकसित हुआ था ‘एसकी’ से अमेरिकन कोड स्टैंडर्ड और तब कम्प्यूटर फ़ॉण्ट जानता था, भाषा नहीं जानता था।

    —जे बात समझ मयं नायं आई।

    —थोड़ी सी तकनीकी बात है चचा। लेकिन चूंकि हम अंग्रेजी की एनकोडिंग प्रणाली पर आधारित थे इसलिए हमने हिन्दी के बहुत सारे फ़ॉण्ट बना दिए।  तेतीस करोड़ देवी-देवता हैं भारतवर्ष में सबके नाम का एक-एक फ़ॉण्ट बना दिया। नारद, विष्णु, महेश, शिवा, चाणक्य, देवी-देवता तो देवी-देवता इतिहास पुरुषों को भी नहीं छोड़ा। इतने फ़ॉण्ट बना दिए और उन सबमें तालमेल नहीं था। ‘डी’ दबाने से ‘क’ तो सबमें आ जाएगा लेकिन कॉमा कहां आएगा? पूर्ण विराम कहां आएगा? ब्रैकिट कहां लगेगा? इसमें हेर-फेर थी। हिन्दी में तो संयुक्ताक्षर बहुत हैं। उसका काम दौ सौ पैंसठ से नहीं चलता, क्योंकि अंग्रेजी का काम दो सौ पैंसठ लिपि चिन्हों में चल जाता है। हमें चाहिएं थे ज़्यादा तो इससे आ गई बाधा और हम समझौता करने लगे। संयुक्ताक्षरों के मामले में, लिपि चिन्हों के मामले में, मात्राएं कहां लगेंगी, इसमें गड़बड़ होती थी। ‘न’ पर मात्रा लगाओ तो ठीक लग जाएगी, ‘क’ पर लगाओ तो उधर सरक जाएगी। अरे ‘क’ की मात्रा ‘क’ के डण्डे के नीचे आनी चाहिए लेकिन इतने कोड प्वाइंट थे नहीं इसलिए हम समझौता करके चलते थे।

    —तौ फिर का भयौ! यूनिकोड नै का कियौ?

    —यूनिकोड ने सबसे बड़ा काम ये किया कि हर भाषा के लिए मानक निर्धारित कर दिए। हर महत्वपूर्ण भाषा के लिए निश्चित एनकोडिंग प्रणाली विकसित की और यह निश्चित एनकोडिंग प्रणाली कोई नई बात नहीं है। दस साल से चली आ रही है। पर लोगों में अभी तक इसका ज्ञान नहीं है कि यूनिकोड क्या है? और उसने क्या कर डाला है?  यूनिकोड की इस मानक एनकोडिंग प्रणाली से  अगर मैं इंटरनेट पर हिन्दी में कुछ लिखता हूं तो संसार के सारे कम्प्यूटरों में हिन्दी ही खुलेगी, पहले ऐसा नहीं होता था। पहले अगर हमने फ़ॉण्ट प्रणाली से कोई लेख लिखा और हमने भेजा तो हमें साथ-साथ उस फ़ॉण्ट को भी भेजना पड़ता था, बिना उस फ़ॉण्ट के आपका लेख खुलेगा ही नहीं। बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था या फिर उनके फ़ोटो खींच कर उनका इमेज फाइल बनाना पड़ता था।

    —जै इमेज फाइल का होती ऐ?

    —चचा, कम्प्यूटर में होती हैं फाइलें, जो पाठ की होती हैं उनको टैक्स्ट फाइल कहते हैं, जो चित्रों की होती हैं उन्हें इमेज फाइल कहते हैं, जो धवनियों की फाइल होती हैं उन्हें ऑडियो फाइल कहते हैं और ये सब डण्डे और अण्डे का ही खेल है चचा। सब कुछ बनता उनसे ही है।

    —कमाल है भैया, कमाल है, डण्डा और अण्डा तैई तस्वीर दिखै और डण्डा और अण्डा तैई पाठ आ जाय!

    —यही तो ठाठ है चचा और बात कर रहे थे हम यूनिकोड की। यूनिकोड वन प्वाइंट ज़ीरो आया था नब्बे में और खुशी की बात  ये है कि पहली बार में ही  हिन्दी उसमें सम्मिलिति की गई थी धीरे-धीरे भाषाएं बढ़ी। अब यूनिकोड फाइव प्वाइंट थ्री तक आ गया। भाषाओं में विस्तार हो रहा है और ये कम्प्यूटर की मेहरबानी है और उसमें स्थान की कोई कमी नहीं है। अपार स्थान है। इसलिए हर भाषा के लिए एनकोडिंग पर लगातार काम जारी है और अब तो ये नई पीढ़ी के बच्चे-बच्चियां जो हिन्दी से भागते थे, ऐसे-ऐसे कीबोर्ड आ गए हैं कि रोमन में लिखो और हिन्दी को प्राप्त करो। हम अपनी जरूरतों को नहीं समझ पाए चचा। लेकिन विदेशी कम्पनियों ने भारत के बाजार में हिन्दी को एक उपभोक्ता सामग्री के तौर पर देखा और उसी तरह उसका उत्पादन किया। अब गूगल, याहू जैसे पोर्टल पर इंटरनेट ब्राउजर्स कहते हैं जिन्हें उन पर हिन्दी आराम से लिखी जा सकती है। अब हिन्दी में जो झमेला है वह बहुत ही अजूबे किस्म का है उससे पार कैसे पाई जाए इसे सब लोग मिलकर सोचें तो आनन्द आए।

    —वो झमेला का ऐ भैया?

    —झमेला ये है चचा कि अंग्रेजी का कीबोर्ड अब से दो सौ साल पहले बना था जब टाइपराइटर आया था वो आज तक पूरे संसार में, पूरी दुनिया में ज्यों का त्यों है। ‘ए’ की जगह नहीं हिली, ‘डी’ की जगहा नहीं हिली, ‘कॉमा’, ‘फुल स्टॉप’  नहीं हिले। लेकिन हिन्दी में और अन्य भारतीय भाषाओं में कोई मानक कीबोर्ड नहीं है कि हम कहें कि ’क’ के लिए यही मानक स्थान निर्धारित है और दूसरा होगा नहीं। रैमिंगटन टाइपराइटर में ‘क’ कहीं और है। इंस्क्रिप्ट जो भारत सरकार द्वारा बनाया हुआ है उसमें कहीं और है और अगर हम फोनेटिक कीबोर्ड या ट्रांसलिटरेशन कीबोर्ड यानी ध्वन्यात्मक कीबोर्ड रखें तो रोमन अंग्रेजी के शब्दों से ही हिन्दी को प्राप्त कर सकते हैं तो ये तीन तरह के कीबोर्ड हैं। चलो तीन तरह के होते तो भी गनीमत थी। यहां उससे भी आगे निकल गए लोग कि कहीं कोई हमारी शैली का अनुकरण न कर ले इसलिए अपने कीबोर्ड का ढ़ग ही बदल लेते हैं। रैमिंगटन के आधार पर गेल ने अलग बना दिया, सेल ने अलग बना दिया। अपनी-अपनी दुकान अलग-अलग खोलकर चला रहे हैं। इससे मतलब नहीं कि भाषा तो संप्रेषण का माध्यम है उसमें एकरूपता और मानकीकरण की सबसे ज़्यादा आवश्यकता है। तो चचा सरकार को, बुद्धिजीवियों को, साहित्यकारों को मिलकर एक अभियान छेड़ना चाहिए कि एक कीबोर्ड हो,  वह बच्चों को बचपन में सिखाया जाए और उनकी उंगलियां हिरण के समान कीबोर्ड पर चौकड़ी भरें। वही लिखें जैसा कीबोर्ड उनको दिया गया हो। लेकिन चलो हम तो समझौतावादी हैं, हर स्थिति में अपने आपको ढाल लेते हैं। तीन कीबोर्ड तो होने ही चाहिएं, एक जो परंपरागत टाइपराइटर हमारा चला आ रहा था वो, दूसरा भारत सरकार ने इंस्क्रिप्ट बनाया वो और तीसरा ऐसा जिसमें हर कोई टाइप कर सकता है जिसके पास अंग्रेजी कीबोर्ड है यानी रोमन। मन अब रोए नहीं। हे मन तू मत रो। हिन्दी लिखने के पूरे साधन कम्प्यूटर ने दे दिए हैं और तुझे मालूम नहीं है, ऐ मेरे मन!  कि अण्डे और डण्डे ने न तो शाकाहारियों का नुकसान किया और न अहिंसावादियों का क्योंकि ये डण्डा न तो सिर फोड़ता है और न यह डण्डा आपको मांसाहारी बनाता है यह आपको हिन्दीधारी बनाता है।

     

     

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