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    —चौं रे चम्पू! अमरीका के संग न्यूकिलियर डील कौ का भयौ?

     

    —न्यूक्लीयर डील के बारे में हैदराबाद हाउस में ओबामा के साथ मोदी की क्या बातें हुईं, मैं कैसे बता सकता हूं। टेलीविजन पर दृश्य दिख रहे थे, बातचीत कहां सुनाई दे रही थी। हिलते होठों और हाथ की भंगिमाओं से अन्दाज़ा लगाते रहिए। मोदी ने बांए हाथ से चाय उठाई, उनका सीधा हाथ बात कर रहा था। ओबामा ने दांए हाथ से चाय उठाई, उनका बांया हाथ बात कर रहा था। सब जानते हैं कि ओबामा लैफ्टी हैं, बाएं हाथ से डील पर हस्ताक्षर करेंगे। सन दो हजार छः से अटका-लटका मामला क्या करवट लेगा वे ही जानें, पर उनकी शरीर-भाषा मुखर थी। लग रहा था कि मोदी का ओबामा से याराना न्यूक्लियर डील पर अमरीका से कुछ न कुछ सकारात्मक करवाएगा। न्यूक्लियर के अलावा कुछ न्यू और कुछ क्लियर बातें भी हुई ही होंगी।

     

    —का न्यू और का किलियर खोलि कै बता।

     

    —न्यू बात तो ये है कि भारत अमरीका सम्बन्धों की एक नई शुरुआत होगी और क्लीयर ये है कि विश्व के शक्ति-संतुलन में भारत की अहम भूमिका रहेगी। लेकिन आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं, मैं कोई विदेश नीति विशेषज्ञ तो हूं नहीं। बस इतना चाहता हूं कि जो हो वह विश्व-जन कल्याण के लिए हो।

     

    —अच्छा छोड़ कोई और खास बात बता।

     

    —एक खास बात ये कि मेरी बिटिया स्नेहा ने गणतंत्र की पूर्वसन्ध्या पर राष्ट्रपति भवन की एक ऐसी नृत्य-संरचना में भाग लिया जिसमें पांच शास्त्रीय नृत्य-शैलियों का समन्वय था। भरतनाट्यम, ओडिसी, कत्थक, मणिपुरी और कथकलि। स्नेहा ने भरतनाट्यम किया। बड़ी खुश थी, यह बताते हुए कि ओबामा और मिशेल दोनों बेहद प्रसन्न थे। नृत्य-संरचना के आयोजक संजीव भार्गव भी प्रसन्न थे, क्योंकि अतिथि प्रसन्न थे। दूसरी ख़ास बात यह कि छब्बीस जनवरी की शाम की चाय के लिए तुम्हारे चम्पू को भी राष्ट्रपति भवन से न्यौता मिला। वहां अपने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ सारा मंत्रिमण्डल था। पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व मंत्री थे। ज़ाहिर है, गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि ओबामा मिशेल थे। पद्म-अलंकृत महानुभावों, शासन-प्रशासन के उच्चाधिकारियों, सेना के प्रमुख व्यक्तित्वों, कला-कर्मियों और बड़े-बड़े उद्योगपतियों का अच्छा-ख़ासा समूह था। अधिकांश लोग ओबामा की एक झलक के लिए लालायित थे। हर कोई मिल तो नहीं पाया, लेकिन निकट दर्शन तो हुए। मस्तमौला सा इंसान लगता है, जिसकी मस्ती और हस्ती को मौला ही जानते हैं। उसकी सुरक्षा एजेंसियां सिर्फ़ इतना जानती हैं कि वह एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक देश है। फूंक-फूंक कर दुनिया के संतरे की एक-एक फांक चखने देते हैं।

     

    —तौ का भयौ व्हां पै?

     

    —अरे, सुरक्षाकर्मियों ने दूसरी तरफ की राह दिखा दी उन्हें और वे हाथ हिलाते हुए वापस मुड़ गए, लेकिन हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अधिकांश लोगों से मिले। तुम्हारे चम्पू से भी मोदी जी ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। चम्पू को अहसास हो गया कि वे कविसम्मेलनों के पुराने श्रोता हैं। चचा, अपन तो ऐसे संत हैं जो सीकरी जाने में नखरा भी करें तो प्रेमी नहीं करने देते।

     

    —मोय तौ बरसात की वजैह ते डबका लगौ भयौ ओ कै परेड में भंगा तौ नायं परैगौ!

     

    —हां, चचा। ठिठुरते-भीगते हुए गणतंत्र में सब कुछ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। गार्ड ऑफ़ ऑनर में पहली बार, विंग कमांडर पूजा ठाकुर के रूप में, एक महिला को नेतृत्व का अवसर मिला। नारी शक्ति की झांकियां निकलीं। स्कूली बच्चों के नृत्यों में ओबामा मिशेल ने काफ़ी रुचि दिखाई। बी.एस.एफ. के जवानों का मोटर साइकिल पर संतुलन ग़ज़ब का था। इस बात में भी संशय था कि अमरीकी राष्ट्रपति की सुरक्षा टीमें हमारी वायुसेना के करतब होने देगी या नहीं, लेकिन सब कुछ हुआ। हमारी पुलिस ने भी अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखी। दूरदर्शन ने अच्छा प्रसारण किया। पर एक बात का मलाल रहा।

     

    —मलाल बता!

     

    —मुस्लिम संस्कृति के लिए वाजिद अली शाह की जगह मिर्ज़ा ग़ालिब या बहादुर शाह ज़फ़र को दिखाते तो अठारह सौ सत्तावन का मुक्ति-संग्राम साकार होता। बुद्ध और गांधी की झांकियां दिखाते तो दुनिया को शांति का संदेश जाता। पर मैंने एक बात देखी।

     

    —का देखी?

     

    —ओबामा का मन यहां खूब लग रहा था। भारत की सांस्कृतिक विविधता उन्हें अच्छी लगती है। वे अमरीका के अकेले राष्ट्रपति हैं जो अपने दोनों कार्यकालों में यहां आए। भारतवासियों को उनका यहां आना अच्छा ही लगा। ये बात दूसरी है सुरक्षाकर्मियों की हिदायत पर चलना अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में उनकी मजबूरी है। न्यू और क्लीयर डील यह होनी चाहिए कि वे अपने विश्वशांति के प्रस्तावों के साथ भारत आते रहें।

     

    —खर्चा तू अपनी गांठ ते देगौ का? कछू पतौ ऐ कित्तौ खर्चा है गयौ?

     

     

    wonderful comments!