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  • चौं रे चम्पू
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  • धीरे-धीरे मरो, न मर जाना चुटकी में
  • धीरे-धीरे मरो, न मर जाना चुटकी में

     

     

     

     

    —चौं रे चम्‍पू! बगीची पै नौजवान आजकल्ल कम आय रए ऐं, उनैं कैसे आकर्सित कियौ जाय?

    —एक अच्छा तरीका बताता हूं चचा! बगीची पर हुक्के रखवा दो। सुंघनी नसवार का इंतज़ाम करा दो। नौजवान बढ़ जाएंगे। दिल्ली सरकार के बजट में सिगरेट पर गाज गिरी है, बीड़ी-हुक्के-नसवार पर नहीं। नफीस  हुक्कों में शानदार नक्काशीदार नलियां लगी हों, चारपाई डली हों, चारों ओर तम्बाकू महके और चिलम चहके।  हुक्के का एक शानदार चित्र बाहर लगा हो और जिस पर लिखा हो— सिगरेट के दुखियारो! महंगाई के मारो! नौजवान यारो! बगीची पे पधारो!

    —हट चम्पू! मेरी बगीची पै तासबाजी, बीड़ीबाजी, हुक्का, चिलमबाजी सब बैन ऐं। जे नायं है सकै।

    —चचा, जानता था तुम भड़क जाओगे। बहुत दिनों से तुम्हारा गुस्सा नहीं देखा था। लेकिन यह बहुत ही सही निर्णय है सरकार का। तम्बाकू उत्पादों पर महंगाई, जनहित की महंगाई है।  यह छ: जुलाई को आने वाले आम बजट के लिए भी एक संकेत है।  सिर्फ दिल्ली में नहीं देशभर में सिगरेट महंगी हो जाएगी। दिल्ली की स्वास्थ्य मंत्री डॉ. किरण वालिया का बस चले तो सिगरेट पर पूर्ण बैन लगा दें और सिगरेट कम्पनियों पर ताले, लेकिन कम्पनी लॉ उदारताएं प्राप्त हैं। तत्काल पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। असल तो है उपभोक्ता। वही स्वयं को नहीं रोकता। धौंकता जाता है, धौंकता जाता है। उसे वो आदमी बेकार लगता है जो सिगरेट के खिलाफ भौंकता जाता है। पिए  जाओ प्यारे, पिए जाओ! बर्बादियों का जश्न मनाना फिजूल नहीं बल्कि ज़रूरी है। हर फिक्र को धुंए में उड़ा रे! और बाद में जो फिक्र आएंगी उन्हें तबीयत से संभालना प्यारे! मनुष्य के पास जो पांच प्रमुख अंग हैं, दिमाग, हृदय, फेफड़े, लिवर और किडनी, उन पर सिगरेट का धुआं सीधे प्रभाव डालता है। दिमाग के अन्दर तो सिगरेट का धुआं दस सैकिण्ड में एक भन्नौटी भेजता है। झूम जाता है आदमी। वह भन्नौटी शुरुआत में होती है विलासिता, बाद में बन जाती है दासता। फिर दिन की एक सिगरेट का मज़ा बीस सिगरेट से भी नहीं आता।  दासता रह जाती है, विलासिता नहीं रहती। कहते हैं कि सिगरेट के  धुंए में चार हज़ार से भी ज़्यादा केमिकल होते हैं जो भयंकर हानिकारक हैं।  इन चार हज़ार में से साठ केमिकल ऐसे हैं जो सीधे कैंसर को दावत देते हैं। निकोटीन है, बैंज़ीन है, कार्बन मोनोऑक्साइड है,  ये ऐसे केमिकल हैं चचा, जो चूहों को मारने की दवाई में और फसल के कीड़े मारने के लिए काम में आते हैं। धीरे-धीरे मारते हैं। झटका नहीं हलाल का मामला है।

    —हां! जल्दी का ऐ मरिबे की? धीरे-धीरे मरौ!

    —चचा, तम्बाकू-सेवियों के लिए एक कुंडली सुन लो—

    चुटकी में सुंघनी, हुलस, नस्य, नास्य, नसवार,

    धूम्र-दंडिका, गुड़गुड़ी, बीड़ी, चुरुट, सिगार।

    बीड़ी, चुरट, सिगार, चिलम, हुक्का, सिगरटिया,

    ताम्बूल, तम्बाकू, झन्नौटी, झटपटिया।

    कश सुट्टा संग, गुटका गटको बेखुटकी में,

    धीरे-धीरे मरो, न मर जाना चुटकी में।

    —वाह रे चम्पू!

    —लेकिन चचा, एक बात समझ में नहीं आई। दिल्ली सरकार ने सिगरेट पर तो वैट बड़ा दिया, साढ़े बारह परसैंट का बीस परसैंट कर दिया लेकिन  बीड़ी और  हुक्के के तम्बाकू पर टैक्स नहीं बढ़ाया। बीड़ी में चार हज़ार से ज़्यादा केमिकल हो सकते हैं। ग़रीबों के लिए ये नकली सहानुभूति छोड़ देनी चाहिए।  बीड़ी पर और तगड़ा वैट लगे। समाजशास्त्री भले ही कहें कि ये गरीब आदमी की छोटी सी विलासिता है जिस पर आप पाबंदी लगा रहे हैं।

    —भाड़ में जाएं ऐसे समाजसास्त्री।

    —संभ्रांत लोक के लिए होटल की विलासिता और गिलासिता पर जो कर कम किया है, उसे भले ही न करते, पर बीड़ी और हुक्के पर भी लगाते। संभ्रांत  परिवारों के लोग ज़रा अपने अधेड़ों से गरीब युवाओं के चेहरों की तुलना करें। तीस साल का बीड़ी-खींचक जवान साठ साल का लगता है, बाल खिचड़ी हो चुके होते हैं उसके। दूसरी तरफ मंदी के बावजूद, पैसे की रसमलाई खाने वाला ये नया-नया सम्पन्न मध्य-वर्ग साठ वर्ष की उम्र में बालों में डाई लगाकर,  उम्र में उस मज़दूर का भतीजा लगता है। बीड़ी के कारखाने ही बन्द करा देने चाहिए। लेकिन चचा, बन्द हो नहीं सकते। कहां जाएंगे बीड़ी मज़दूर। विकल्प का रोज़गार चाहिए ज़रूर। और इसके लिए चाहिए पूरी राजनीतिक ताकत। अफसोस की बात है कि तम्बाकू उत्पादक कम्पनियों के मालिक और निर्माता, बने रहते हैं सरकारों के नाजायज़ भ्राता।

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