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  • धन फॉर रन एंड रन फॉर फ़न

     

     

    —चौं रे चम्पू! आस्ट्रेलिया पहौंच कै ना तौ तैनैं फोन मिलायौ और ना ई मेरौ फोन उठायौ, का भयौ?

    —माफ करना चचा, आपका फोन मैं शोर-शराबे में सुन नहीं पाया।

    चौंरे चम्पू

    फुटबाल या सौकर

    —अशोक चक्रधर

    —चौंरे चम्पू, आजकल जल्दी सो जावै का?

    —नहीं चचा मेरा तो वही समय है रात को साढ़े बारह बजे के बाद।

    —पर मैंने तौ फोन मिलायौ ग्यारह बजे उठायौ चौं नाय?

    —चचा उस वक्त मैं फुटबाल का मैच देखने के लिए…अरे चचा इस समय मैं हूं सिडनी में। सम्य का चक्र थोड़ा अगे खिसक गया है। तुम्हारे यहां होगा इतवार, पर यहां सोमवार हो चुका है और सुबह के तीन बज चुके हैं। उस समय सुबह के तीन बजे थे।

    —तौ सुबह के तीन बजे का कर रयौ ऐ तू सिडनी में?

    —चचा खेल का प्रेम तो पूरी दुनिया में है। लेकिन आपको मालूम है कि वर्ल्ड कप फुटबाल का चल रहा है साउथ अफ्रीका में और  दुर्भाग्य की बात है कि हम तो इसमें पहुंच नहीं पाए क्योंकि हमने इसको तरजीह नहीं दी क्रिकेट के आगे। पर पूरी दुनिया का खेल है यह फुटबाल ’सौकर’। अब ’सौकर’ इसका नाम क्यों पड़ा। मेरे दिमाग में ये बात आती है कि इंसान की सारी क्षमताओं का केन्द हाथ होते हैं। एम्बस ने भी कहा कि बन्दर से आदमी बनने की प्रक्रिया में हाथों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। हाथों के कारण ही दिमाग विकसित हुआ और उसकी सारी प्रगति हाथों के जरिए ही हुई। तो ये खेल उस केन्द्रीय शक्ति को बाधित कर देता है उसकी गतिविधियों को यानी हाथ की गतिविधियों को न्यूनतम का देता है और पैर जिनसे सिर्फ चलने का काम लिया जाता है उसमें सौकर फिट हो जाते हैं, सौ हाथ। जो करना है पैरों से करके दिखाओ। परों में आँख लग जाते हैं। पैर बाल को इस तरह से मारते हैं कि सीधा अपने खिलाड़ी के पास जाए या फिर गोल में।

    —हां बात तौ बढ़िया कही। तौ सुबह के तीन बजे टीवी देख रह्यौ ऐ का?

    —टीवी तो देखा जा सकता था, उसमें वो आनन्द कहां, दर्शक दीर्घा में बैठकर शोर मचा रहे हों, सीटी बजा रहे हों। यहां पर एक सिनेमा हॉल थियेटर है ’एन्मॉर’ उसका मालिक सौकर प्रेमी है। सिनेमा के बड़े परदे पर प्रोजेक्शन से खेल दिखाता है और पूरा वातावरण मैदान जैसा बनाया जाता है। बड़ा हॉल है कम से कम पाँच-सात सौ का तो होगा। अधिकांश युवा जोड़े, दोस्तियों के झुण्ड हॉल में थे। खेल शुरू होने से पहले मैं तो हॉल में चलते खेल देख रहा था।

    —हॉल में कैसे खेल चल रहे थे लल्ला?

    —सुबह के तीन बजे बीयर के गिलास, मग और टिन हाथ में लेकर, ऑस्ट्रेलिया की टीम के कपड़े पहनकर हॉल में बजते सगीत पर थिरकते हुए लड़्के और लड़्किया अपने-अपने आनन्द में मगन थे। कोई किसी के आनन्द की परिधि में घुसने की चेष्टा नहीं करता था। धीरे-धीरे हॉल भरने लगा और उल्लास का शोर था चचा। खेल शुरू होने से पहले एक उदघोषक ऑस्ट्रेलिया का झण्डा लिए हुए निकला तो दूसरा जोड़ा जर्मनी के झण्डे को दिखाता हुआ निकल गया। मैच ऑस्ट्रेलिया औ जर्मनी के बीच होना था।  हमारे यहां क्या कोई ऐसा कर सकता है कि पाकिस्तान का झण्डा लेकर क्रिकेट के मैदान में निकल जाए। इतनी आजादी दिखी कि हम दूसरे देश का समर्थन भी कर सकते हैं। लेकिन तीन-चार लोग ही थे हॉल में जो जर्मन समर्थक थे, उनको जर्मन जीत पर प्रसन्न होने का पूरा अधिकार था।

    —आगे बता।

    —चचा खेल शुरू हुआ और पहले ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियो को थ्री डी एनीमेशन के जरिए मैदान में प्रस्तुत किया गया। हॉल की धरती कांपने लगी, मैं चमत्कृत। दरसल सारे दर्शक अपने पैरों से हॉल के फ्रश को हिला रहे थे, एक भूकंप सा आ गया था, ये उल्लास का भूंकप था। धरती खुशी से नाच रही थी। फिर आए जर्मन के खिलाड़ियों के एनिमेशन। पूरे हॉल में ऐसी आवाज आई यानी हम किसी कवि को हूट करने के लिए सियार के जैसी आवाज निकालते हैं। फिर जी राष्ट्रगान हुए। पहले जर्मन का, जर्मनी का राष्ट्र्गान हुआ, कोई नहीं उठा, सब शांत रहे, ये दूसरे देश को सम्मान देने का भाव था। जब पना यानी ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रगान बजा, सारे लोग खड़े हो गए, लेकिन हमारे देश की तरह सावधान की मुद्रा में नहीं। कोई बीयर हवा में उछालता हुआ गा रहा था, कोई संगीत निर्देशक की तरह हाथ लहराता हुआ, कोई पीछे मुड़कर किसी को खोजते हुए गा रहा था, कोई किसी के कंधे पर हाथ रखकर ही गा रहा था। लेकिन राष्ट्रगान की एक भावना थी जो उस हॉल में दिखाई दे रही थी। फिर जी हुआ खेल। क्या गजब का उत्साह और उल्लास था। लेकिना आगे आने वाले दस मिनट में ठण्डा पड़ गया क्योंकि दस मिनट के अन्दर जर्मन खिलाड़ियों ने गोल कर दिया ऑस्ट्रेलिया के ऊपर। बहुत आसानी से। आजकल तो इतने कैमरे लग जाते हैं चचा कि हर एंगल से देख लो कि हो क्या रहा है। यानी दर्शक रैफरी से ज्यादा जागरूक हो कर खेल देख सकता है अगर खेल की कमियों को जानता हो। टॉप एंगल शॉट से सीधा दिखाई दे रहा था कि जर्मन खिलाड़ियों का आपस में कितना तगड़ा तालमेल था। बड़ी आसानी से एक रेखकीय ढ़ंग से बाल उनके खिलाड़ी के पास पहुंच जाती और बहुत देर तक अपने ही खिलाड़ियों के बीच सरल रेखा में सरलता से पहुंच जाती। लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी एक-दो पास तो ठीक दे देते पर तीसरे में बाल फिर जर्मनी के खिलाड़ी के पास पहुंच जाती। ये सरलता बड़ी कठिनता से प्राप्त होती है चचा।

    —का मतलब?

    —मतलब ये कि हिटलर अपनी कब में रोता होगा कि जिस जाति के लिए उसने द्वितीय विश्वयुद्ध कर दिया आज वही देश विश्व के तमाम श्रेष्ठ खिलाड़ियों को अपनी टीम का हिस्सा बना रहा है क्योंकि उनकी टीम में मैक्सिको के, ब्राजील के, इटली के श्रेष्ठतम खिलाड़ी थे। जर्मनी ने अपने यहां उनको नागरिकता दी और इसप्रकार उनके पास विश्व की श्रेष्ठतम टीम है। पहले गोल से ही पता लग गया कि ऑस्ट्रेलिया जीत नहीं सकता। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों में तालमेल नहीं था। हां एक बात और बताऊं चचा, खेल शुरू होने से पहले जुए के, सट्टे के रेट स्क्रीन पर आ रहे थे कि जर्मन पर अगर दाव लगाओगे तो एक का डेढ़ मिलेगा और ऑस्ट्रेलिया पर लगाओगे तो एक के साढ़े पांच मिलेंगे। ऑस्त्रेलिया टीम की संभावना पहले ही स्टोरियों ने समाप्त कर दी थी और हुआ भी यही। इंटरवैल तक दो गोल हो गए और चार गोल से जर्मनी जीत गया। लेकिन हार-जीत का उतार-चढ़ाव नहीं था, उतार ही उतार था। चेहरा उतरा हुआ था ऑस्ट्रेलिया के अधेड़ पुरुष का और चढ़ा हुआ था जर्मनी के नौजवान कोच का। एसबीएस टेलिविजन ने ये मैच लाइव दिखाया और दो कोचों के बीच में बिना संकोच शिफ्टकस होता रहा कभी इसका चेहरा, कभी उसका चेहरा और हम देखते रहे खिलाड़ियों का जमीन पर गिरना, घिसटना, पिट जाओ तो यलो कार्ड से बाहर होना लिपटना, सटना। तो मैं बता रहा था जुआ यहां लीगल है चचा सट्टा सरेआम होता है, पबों पर, अलग-अलग बूथों पर, खिड़कियों पर आप कहीं भी जुआ खेल सकते हैं। अमेरिका में जुआ बेन है, लेकिन इंटरनेट के जरिए वे ऑस्ट्रेलिया में दाव लगाते हैं और ऑस्ट्रेलिया सरकार ये जानती है कि जो जुआ हमारे महाभारत काल में लीगल था वह आज भी लीगल है। दबे-ढके अपराधों से तो अच्छा है कि होने दो और सरकारी खजाना बढ़ाओ। भारत में क्रिकेट पर अरबों रूपए का सट्टा लगता है लेकिन सब काले धन में तबदील हो जाता है। जुआ लीगल करने से जुआ बढ़ेगा नहीं, घटेगा। क्योंकि व्यक्ति अपनी सामाजिकता, अपने सामाजिक सरोकारों को अपनी निगाह से देखेगा।

    —लेकिन फिर कानून बनाने वारों का ह्यौगौ?

    —कानून बनाने वाले ही तो कानून तोड़ने की आधारशिला रखते हैं चचा।

     

     

     

     

     

     

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