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  • दिमाग़ में लगे ब्रेक

    —चौं रे चम्पू! कौन सौ अपराध ऐ जो पैलै नायं होतौ ओ?

    —अपराध तो वही हैं जो पहले भी होते आए हैं, लेकिन अब मीडिया की मेहरबानी से और पीड़ित की मुंहज़बानी से आसानी से सामने आने लगे हैं। बलात्कार पहले भी होते रहे हैं पर उन्हें संज्ञान में लेने में लापरवाही होती थी। अब हर दिन बलात्कार की शिकायतें दर्ज हो रही हैं। वह निरर्थक भय जाता रहा कि शिकायत करने पर अपना ही कोई सामाजिक नुकसान होगा। सीमा पर हमारे रणबांकुरों के सिर काट कर पहले भी ले जाए जाते रहे हैं, लेकिन लीपापोती की कार्रवाई होती रही हैं। अब आक्रोश दब-घुट कर समाप्त नहीं होता, मुखर होने लगा है। सहने की जो सीमा होती है, अब टूटने लगी है।

    —हां सो तौ है लल्ला। जे अच्छी बात ऐ!

    —देखिए न! तंत्र को अंदाज़ा नहीं था कि एक बलात्कार और हत्या के मामले में युवा इतने आक्रोश में आ जाएंगे कि सबको अपने मानवीय सरोकार दिखाने का धर्म याद आ जाएगा। कौन सोच सकता था कि एक सैनिक की विधवा का अनशन राजनेताओं तो राजनेताओं, सेना-प्रमुख तक को अपने गांव में बुला लेगा। आक्रोश का सामना करने की हिम्मत अब जवाब दे रही है। क्रोध और विरोध को साहस मिल रहा है। झुकना पड़ रहा है तंत्र के सर्व-तंत्र-स्वतंत्र को। शहीद हेमराज की विधवा की गुहार के बाद ब्रिगेडियर कमांडर स्तर की फ्लैग मीटिंग से पहले ही भारतीय सेना को घोषणा करनी पड़ी कि सैनिकों के सिर काटने जैसी कार्रवाई को वह बर्दाश्त नहीं करेगी। सेना प्रमुख को कहना पड़ा कि हमारे सैनिकों हेमराज और सुधाकर के साथ बेहद बुरा हुआ है। उन्होंने सैनिकों के परिवारों के साथ अपना आत्मीय सरोकार प्रकट किया। सैनिकों के शवों के साथ बर्बरता का मुद्दा फ्लैग मीटिंग में भी उठाया। कारगिल युद्ध के दौरान भी क्षत-विक्षत शरीर मिले थे सैनिकों के। कैसे-कैसे अंग-भंग करके जवानों के शरीर लौटाए थे। याद है?

    —हां याद ऐ लल्ला! तिरंगे झंडा में लिपटे भए जवान, खूब देखे टेलीबीजन पै!

    —और साथ में देखते थे सौम्य शांत शहीदों के परिवार। सोफ़े पर बैठे हों या खाने की मेज़ पर, ज़मीन पर बैठे हों या सेज पर, सच तो ये है कि टी.वी. ने उस साल बहुत रुलाया। जब भी तिरंगे में लिपटा कोई ताबूत आया, उस जवान महान शहीद की याद में मूक सी हूक उठी, दिल की भरी बंदूक भी अचूक उठी। जवानों के अंग-भंग क्षत-विक्षत कटे हुए, लो फिर कुछ ताबूत आ गए तिरंगे में लिपटे हुए। बर्फ़ीली खड़ी चट्टान पर बुलैटप्रूफ़ जैकिट नहीं, भोजन के पैकिट नहीं, हज़ारों सुइयां चुभाती हवा के थपेड़ों में, बर्फ़ ही बर्फ़ के बीच इक्का-दुक्का पेड़ों में, रास्ता बनाते हुए, जयहिन्द गाते हुए, बिना रसद-रोटी के चोटी तक जाते हुए, भारत की परिपाटी घाटी में गुंजाते हुए, मेरे देश के नौजवान सिपाही! अभी तो तू ब्याहा गया था फिर से मौत ब्याही! अद्भुत प्रचंड तेरा तेज शौर्य अचल प्रखर, पाप-छायाओं से मुक्त किए धवल शिखर! विजय पाई तूने, तूने हार नहीं मानी, और स्वयं बन गया कहानी! अब दृश्य बदल गया है चचा! अब विधवा बोलने लगी है। अब नेताओं को दौड़ना पड़ता है।

    —जे आक्रोस की लहर कित्ते दिन!

    —आक्रोश की लहर हमेशा ऊपर दिखे, ज़रूरी नहीं है। आक्रोश इन दिनों अन्दर-अन्दर धधक रहा है। माना कि मशाल की जगह मोमबत्तियों के ज़रिए आक्रोश से ज़्यादा निराशा सामने आ रही है, लेकिन इस श्रद्धांजलि में शांत रस नहीं है। एक दर्द है जो फूटने को अकुला रहा है। दिनकर जी ने कहा था— दर्द जब गुमसुम भीतर पलेगा, एक दिन इस्पात बनकर ढलेगा। फिलहाल तो अधिकार और कर्तव्य गड्मड हो गए हैं।

    —आज तू कछू उखड़ौ भयौ सौ ऐ, का चक्कर ऐ?

    —चचा, कुछ स्थाई और सकारात्मक दिखे तो निराशा समाप्त हो जाएगी। आज भयंकर ट्रैफिक जाम था। चार कि. मी. की दूरी तय करने में दो घंटे लग गए। मेरे विचार भी जाम हो गए हैं। दिमाग ब्रेक लग-लग कर चल रहा है। क्या करूं? बताओ!

    wonderful comments!

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