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  • चम्पू कहां है तू

     

     

    —चौं रे चंपू!

    —चौं रे चम्पू! हैलो, हैलो!! आवाज आ रई ऐ मेरी?

    —हां चचा, चकाचक आ रही है। संचार व्यवस्था देश में बहुत फैंटम हो गई है। दिल का तार कनैक्टियाए या न कनैक्टियाए, संचार का तार जुड़ा हुआ है। कोई टेलिफोन ही न पिकबे करे तो बात दूसरा है।

    —तू है कहां?

    —चचा, पांच दिन से बिहार में। कविसम्मेलनों की भागम-भाग लगी है। अभी पूर्णिया में हूं और यहां से सिलीगुड़ी जाना है। तेईस को पटना में थे, चौबीस को मुज़्ज़फरपुर, परसों भागलपुर में थे, कल पूर्णिया में खेल जमाया और आज सिलीगुड़ी जाएंगे। यात्राएं बाई रोडवा हो रही हैं। नाइट में कविसम्मेलन करो, फिनिश होते ही चल दो। तीन-चार घण्टा कार में स्लीपवा करो। नौ कवि हैं,  तीन गाड़ियां हैं, कोई प्राबलम नहीं न है। अच्छा, हम तो गाड़ी में सो भी जाते हैं, लेकिन ड्राइवर लोग, उनका लाइफ डिफीकल्ट है। उनको तो कोई रूम देता ही नहीं है। कार में स्लीपते हैं, वहीं रैडी होना पड़ता है। रात भर कविसम्मेलन सुनते हैं, डिनर के बाद चल दो। कमर स्टेट नहीं कर पाते हैं। चचा, भाषा का बड़ा आनंद आ रहा है।

    —हां, समझ में आय रई ऐ, चम्पू!

    —जिस बात का हल्ला पिछले पाँच-छः साल से हो रहा है कि हिंग्लिश आ गई, हिंग्लिश आ गई है, हिन्दी को बर्बाद कर रही है। उस हिंग्लिश का प्रादुर्भाव बिहार में सातवें दशक में यहां के आमजन ने किया था। कुछ श्रेय हरियाणा को भी दिया जा सकता है। आत्मविश्वासपूर्ण अभिनव शैली में अंग्रेज़ी शब्दों का बेधड़क और निजी प्रयोग दिव्य मज़ा दे रहा है। भागलपुर में कविसम्मेलन में जाने से पहले मुझे एक थैला लेना था। तो एक ड्राइवर साहब को लेकर में बाज़ार को निकल पड़ा। उनका नाम है वसंत कुमार मधु। कलाकार प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। पूछा तो बताया कि बेटी म्यूजिक में इंटरेस्टिया गई। उनके फादर भी म्यूजिक का टाम्परामेंट रखते थे। मैंने कहा— ‘वाह और आप?’  वे बोले ड्राइवरी में अपनी इमोशन का हाबी नहीं न कर सकते हैं। बाकी सब फ्रंटलाइन चल रहा है।’ उन्होंने आगे बताया कि दूसरे ड्राइवर श्याम नारायण का बॉडी डैमेज हो गया है। मैंने सोचा, कार की बॉडी कहीं टकराई होगी, पर उनका आशय था कि नींद पूरी न होने से उनका शरीर चकनाचूर है।  उन्होंने श्यामनारायन को मैसेज दिया कि रैस्टियाएंगे नही तो ड्राप कर जाएंगे। बहरहाल, एक मालिश वाले ने, जो कि यहां बहुतायत से मिलते हैं, श्याम जी का बॉडी रिपेयर कर दिया। चचा, एक बार शरद जोशी ने लिख दिया था कि नेता नरभसिया गए हैं, तो बिहार के भाषा-शास्त्री नाराज़ हो गए कि बिहार को बदनाम किया जा रहा है, जबकि शरद जी रेखांकित करना चाहते थे कि शब्दों का निर्माण कैसे होता है। नरभसिया जाना नर्वस होने से बना था। भागलपुर के बाज़ार में जिससे बात हुई उसने अंग्रेज़ी शब्दों के नवीन प्रयोगों से मुग्ध कर दिया। दुकान नियरे ही है। परचेजिए परचेजिए।

    —कछू परचेजौ कै नायं? छोड़, हरियाने की बता।

    —बहत्तर में, तुम्हारे इस चम्पू को एक चेला अपने गांव ले गया था। प्रात:काल एक-एक लोटा हम दोनों ने थामा और खेतों की ओर निकल गए। वह तो किसी झुरमुट में खो गया। मैं अभी जगह ढूंढ ही रहा था कि सामने देखा आधा घूँघट मारे एक महिला तसले में ऊपर तक मिट्टी भर कर किसी आते-जाते की प्रतीक्षा कर रही थी कि कोई उठाने में सहायता करे। उस महिला ने एक ध्वन्यात्मक इशारे से मुझे बुलाया।  मैं अपने यौवनपूर्ण आत्मविश्वास के साथ उसके क्लोज़ गया। तसला उठाने की कोशिश की। उस बलिष्ट महिला ने जल्दी से उठाया, मैं अपना किनारा उठा न पाया। तसला टेढ़ा हो गया और मिट्टी ड्रॉपित हो गई, उसने मीठे आवेश में कहा— ‘घणाई डिफैट आदमी सै’।  ‘डिफैट’ किसी भाषा का कोई शब्द नहीं है। उस महिला ने मुझे शहरी समझ कर डिफैक्टिव कहना चाहा होगा। घूंघट से बिना संकोच निकला ये बोल पोल खोल गया कि शहरी लोगों में दम-खम नहीं होता है। आज भी ‘डिफैट’ याद आता है तो बड़ी आत्मग्लानि होती है।

    —चम्पू! चल, अब फोन काट रए ऐं। हम ऐसे डिफैट लोगन ते बात नायं करैं।

     

     

     

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