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  • कौन निकाले नुक़्स 

     

    —चौं रे चम्पू! तू कम्पूटर पै कित्ती देर बैठै?

     

    —कम्प्यूटर से आपकी मुराद क्या है चचा? डैस्कटॉप, लैपटॉप, आई-पैड, आई-फोन, एंड्राइड टैबलेट, हर तरह के स्मार्ट फोन, ये सबके सब कम्प्यूटर हैं। अगर आपने दस साल पहले पूछा होता तो शायद मैं कहता कि हिन्दी लेखकों में सर्वाधिक देर तक कम्प्यूटर पर बैठने वाला मैं हूं। अब ये दावा मैं हरगिज़ नहीं कर सकता, क्योंकि बहुत सारे फेसबुकिए, ट्वीटरिए, लिंकडइनिए, वीचैटिए,  वाट्सएपिए, वायबरिए और सैकड़ों तरह के ब्लॉगिए चौबीस घंटे बैठे रहते हैं। दो कम्प्यूटरों पर समानांतर कार्य करें तो अड़तालीस घंटे, तीन पर करें तो एक दिन में बहत्तर घंटे!

     

    —ऐसी कौन सी चुम्बक और गोंद लग रई ऐ कंपूटरन में?

     

    —चचा! पूरी दुनिया इस वक्त पूरी दुनिया से मिलना चाहती है। दुनिया में जितने लोग हैं, उतने लोग, उतने से अधिक लोगों से संवाद चाहते हैं। सोशल मीडिया का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उतना नहीं हो रहा जितना आदिम स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के लिए हो रहा है। किशोर झंकृति नई संस्कृति ला रही है। वयस्कों में जो जितना दबा, कुचला और सताया हुआ है, इन्टरनेट पर उसी का सबसे ज़्यादा बताया हुआ है। अपने गोपनीय को ओपनीय करने में कोई हील-हुज्जत नहीं रह गई। अब जैसे तथाकथित कोई इज़्ज़त ही नहीं रह गई!

     

    —तौ तू का करै है कम्पूटरन पै?

     

    —चचा! मेरा बहुत सारा समय कम्यूटर पर इस काम में जाता है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं में पठन-पाठन और तेज़ी से कैसे विकसित हो। हर भाषा में ई-बुक्स, यानी, इलैक्ट्रॉनिक बुक तैयार हों। संसारभर के साहित्य का अनूदित रूप हिन्दी में उपलब्ध हो। सोशल मीडिया पर दायित्वपूर्ण साहित्य की अभिवृद्धि हो। ई-बुक्स की संरचना अब सांस्थानिक प्रयत्नों से गतिमान है। हमारा कर्तव्य है कि हम नई पीढ़ी को श्रेष्ठ साहित्य की ज़्यादा से ज़्यादा बड़ी सौगात देकर जाएं।

     

    —ई-बुक कौ फायदा का ऐ?

     

    —हम किसी भी पुस्तक को कम्प्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, आईपैड और स्मार्ट फ़ोन या किसी भी तरह के इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों पर पढ़ते हैं। मुझे मालूम है कि आपने बगीची के वाचनालय की अधिकांश पुस्तकें पढ़ी हैं, लेकिन अब इंटरनेट पर इतनी किताबें और इतना ज्ञान उपलब्ध है कि कई जन्म तक आप लगे रहें तो भी वाचन समाप्त न होगा। आपका वाचनालय इस समंदर के सामने बूंद बराबर भी नहीं है। आप इस बात को ऐसे समझ सकते हैं कि समंदर पर बारिश हुई, समंदर लबालब भर गया, पानी भाप बन कर उड़ा, बादल बना और फिर बरसा। कभी भूकंपों या हवाओं के कारण समंदर क्रुद्ध हुआ तो सुनामी-कटरीना आ गईं। फिर भी वे सर्वनाश तो नहीं कर पाईं न! मैंने क्रुद्ध समंदर के लिए एक चौबोला लिखा था, ’उड़ाकर रंग सारे ले गया, मेरे ग़लीचे से। वो ख़ुश्बू भी चुरा कर ले गया, मेरे बग़ीचे से। खड़ा हूं मैं किनारे पर, निगाहें दूर तक मेरी, समंदर रेत ही तो ले गया, पैरों के नीचे से।’ बस कुछ जिंदगियां लील जाता है, इंसानियत फिर से खड़ी हो जाती है। समंदर रहता उतना का उतना ही है। लेकिन, इंटरनेट पर सूचनाओं का ये जो समंदर भरता जा रहा है, उसकी तादाद दिखने वाले समंदर से कम नहीं है। कुछ समय बाद ज्ञानातिरेक की ई-सामग्री से, महानगरों के किनारों को छोड़िए, पूरी धरती ढंक जाएगी। इतनी कि एक लाख जनम लो तो भी न पढ़ पाओ। भारत में ‘न्यूज़हंट’ वाले भी थोक में ई-बुक बनाने में लगे हुए हैं।

     

    —ई-बुक के और फायदा बता?

     

    —एक फ़ायदा ये कि इस महासागर से मनवांछित मोती तत्काल पा सकते हो। गहरे गोते की ज़रूरत नहीं रह गई। कुछ दोहों में आपको फ़ायदे गिनाता हूं, ‘ई-बुक इन्टरनेट से, पाना है आसान। दफ़्तर में बाबू पढ़े, छत पर पढ़े किसान।।’ ‘पंडित अपने ज्ञान का, चले न पोथा ढोय। फटने का झंझट नहीं, पल में शेयर होय।।’ ‘ईबुक लेनी है अगर, टाइप कर दो नाम। कुछ मिल जाएं मुफ़्त में, कुछ के आधे दाम।।’ ‘पर्यावरण सुधार में, योगदान प्रत्यक्ष। कागज़ के निर्माण को, कटें न लाखों वृक्ष।।’ ‘नहीं बनें अल्मारियां, नहीं चाहिए रैक। बुक कम्प्यूटर में रखो, सुलभ रहेगा ट्रैक।’ ‘जगह घेरती ही नहीं, रखो हज़ारों पास। पैकिंग, लोडिंग, पोस्ट सब, बन जाएं इतिहास।’

     

    —नुकसान ऊ तौ बता!

     

    —‘दिन दूनी गति बढ़ रहीं, दुनिया में ई-बुक्स। सहज प्राप्ति का फ़ायदा, कौन निकाले नुक़्स?’

     

     

    wonderful comments!