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    —चौं रे चम्पू! तेरे पांय में चक्कर ऐ का, घर में चौं नायं टिकै?

    —जहाज का पंछी हूं चचा! कहीं रहूं, कहीं जाऊं, लौट कर सीधे घर आता हूं। ये सच है कि पिछले पूरे एक सप्ताह से रेल, बस, टैक्सी, हवाई जहाज में ज़्यादा वक़्त जा रहा है। मौक़ा मिलते ही अपना लैपटॉप, आईपैड, आईफोन खोल कर बैठ जाता हूं। हवाई जहाज में इंतेज़ार करता रहता हूं कि कब सीट-बैल्ट का साइन बंद होगा ताकि अपने उपकरणों से भाषा-भाषा खेल सकूं। अरे हां, कल सुबह लखनऊ से जोधपुर जाते वक़्त एअरपोर्ट पर नरेश जी मिल गए।

    —कौन से नरेस जी?

    —बड़े अच्छे कवि हैं। अपने पुत्र को उपचार के लिए पुणे लेकर जा रहे थे। शुरू हो गईं व्यथाओं की कथाएं। व्यक्तिगत मसलों को जाने दीजिए पर कविता के बारे में उन्होंने बड़ी खरी-खरी बातें कीं। उन्होंने कहा कि कविता क्या है, भाषा का एक खेल ही तो है। बातें वही होतीं हैं जिन्हें सब जानते हैं। कलाएं आनंद के लिए ही तो होती हैं। कवि इंवैंटिव होता है। वैज्ञानिक और एक कवि में कोई अंतर नहीं होता। अब बड़े-बड़े नामधारी कवि डिक्लाइन पर हैं।

    —कौन से कबी? कोई नाम लियौ का उन्नैं?

    —हां नाम लिए, पर फिर से वे नाम दोहराने का क्या लाभ? कटुता बढ़ाने से क्या होगा चचा! कविता की दुनिया के सब लोग सब जानते हैं। वे बोले कि पहले महनीयों को भ्रम था कि वे किसी को भी उठा सकते हैं, किसी को भी गिरा सकते हैं। दरसल अब वे कुछ भी नहीं कर सकते। उनके हाथ में कुछ भी नहीं है। कविता में उठाना-गिराना तो पाठक और श्रोता के हाथ में होता है। हां, यहां-वहां के पुरस्कार दिलवा देना, उनके हाथ में होता है। ज़्यादातर पुरस्कार ऐसे-वैसों को ही मिलते रहते हैं। साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में ज़रूर कुछ ठीकठाक लोगों को नवाज़ा गया है। मुझे फिर उनके चेहरे पर एक जैनुइन पीड़ा दिखी चचा!

    —कैसी पीड़ा?

    —समझ तो मैं भी नहीं पाया, क्योंकि मुझे पता नहीं कि उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला या नहीं। मैंने उन्हें बताया कि केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पुरस्कार पिछली बार अच्छे लोगों को मिले हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए श्याम बेनेगल और गिरीश कर्नाड को चुना गया। विज्ञान के ज्ञान को हिन्दी में संचार माध्यमों के ज़रिए बढ़ाने का काम प्रो. यशपाल कब से करते आ रहे हैं। उन्होंने हैरानी जताई, क्या! अब तक उन्हें नहीं मिला था! कमाल है! जब तक हम विज्ञान को अपनी भाषाओं में पढ़ाना शुरू नहीं करेंगे तब तक नई पीढ़ी में अपनी भाषाओं के प्रति प्रेम पैदा नहीं कर सकते। अंग्रेज़ी की ग़ुलामी करते आ रहे हैं, आगे भी करते रहेंगे। वे फिर से आ गए, पुरस्कारों के झमेले पर। खरी खरी सुनाने लगे।

    —का बोले?

    —बोले कि सब पुरस्कार झूठे हैं। चाटुकारितामेव जयते.. मैंने कहा। वे कहने लगे, प्रगतिशील, सृजनात्मक और संवेदनशील लेखन में स्वयं को निराला और मुक्तिबोध का वंशज बताने वाले बड़े गर्व से कहते हैं कि हमने कविता में छंद को छोड़ दिया। अरे छोड़ोगे तो तब जब तुम्हारे हाथ में हो! छोड़ कहां से दिया, तुम्हारे पास छंद था ही नहीं। तुम छंदोबद्ध चार लाइन नहीं लिख सकते। विश्वनाथ त्रिपाठी से जब कोई मिलता है और कहता हि कि वह एक कवि है तो उससे कहते हैं कि एक दोहा लिख कर दिखाओ। गद्य में कविता लिखी जा रही है। छंद को छोड़ कर क्या रिप्लेसमेंट दिया तुमने? अरे भैया तुम्हारे पास पत्थर है, उसे तुम छोड़ोगे तो हीरा उठाने के लिए ही छोड़ोगे न! मैं ऐसी बातें करता हूं तो मुझे भी बड़े डाउट से देखते हैं। मैंने कहा कि नरेश जी यदि आप कविसम्मेलनों में अच्छा श्रोता वर्ग पैदा करने के लिए जाने लगे और लोकप्रिय हो गए तो वे तो आपका दामन भी छोड़ देंगे।

    —सही कही रे तैंनैं बी!

    —उन्होंने स्वीकार किया कि ये महनीय साहित्यकार लोकप्रियता से बड़े परेशान हो जाते हैं। श्रोता और पाठक का सामना नहीं करना चाहते। एक स्तर पर उससे घृणा भी करते हैं। लोकप्रियता से उनकी चेतना अखरी-अखरी रहती है।

    —भली चलाई!

    wonderful comments!

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