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  • किसान भी एक पौधा है
  • किसान भी एक पौधा है

     

     

    —चौं रे चम्पू! अब तौ कवायद तेज है गई होयगी आम बजट बनाइबे की, तेरे ख्याल ते सबते जादा ध्यान कौन से छेत्र पै दैनौ चइऐ?

     

    —चचा! जन्म के बाद, जब से मेरी चेतना ने आंखें खोलीं, मुझे बताया गया कि भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहां की सत्तर प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। मैं अपनी किशोरावस्था में किसान जीवन की मस्ती और सादगी से प्रभावित रहता था। निर्धन जी का गीत सुनकर ख़ुश होता था और उनकी धुन में गाता भी था, ’हम हैं रहबैया भैया गांव के, फूस की मढ़ैया भैया बरगद की छांव के। कागा की कांव के।’ जवान होते-होते समझ में आने लगा कि उनकी मस्ती, धन के कारण न होकर संतोष-धन के कारण है। मैंने अपने गांव के खचेरा को कर्ज़ के कारण भूमिहीन होते देखा था। एक कविता भी लिखी थी ’खचेरा की फैंटैसी।’ उस दौर में किसान परिवारों के युवाओं का महानगरों की ओर पलायन बहुत तेज़ रफ़्तार से हो रहा था। पंचवर्षीय योजनाओं की पोल खुलने लगी थी।

    —याद ऐ खचेरा वारी कबता?

     

    —लम्बी कविता है। कुछ हिस्से सुनाता हूं, ‘अब खचेरा कुल मिलाकर एक बेगार है, वह बौहरे की जूती का तेल है, वह पंडित की लड़ावनी की सानी है, वह साह जी की बैठक की झाडू है, वह रमजिया के हुक्के का पानी है, वह बैज्जी के बैल का खरैरा है, वह कुमर साब के घोड़े की लीद है। हमारा छप्पर छा देना खचेरा! हमारा सन बट देना खचेरा! हमारी खाट बुन देना खचेरा! खचेरा छा रहा है, बट रहा है, बुन रहा है, खचेरा अपना ही सिर धुन रहा है।’ कहां गया खचेरा का घर-परिवार कुछ पता नहीं। मैं अड़सठ में मथुरा और बहत्तर में दिल्ली आ गया। न जाने कितने खचेराओं के परिवारों से महानगरों की झुग्गियां फल-फूल-फैल रही थीं उन दिनों। खचेरा ने गांव नहीं छोड़ा। शहर तक खचेरा मेरी कविता में बैठकर आया। ‘ग़रीबी है! सो तो है! भुखमरी है! सो तो है! होतीलाल की हालत ख़स्ता है। सो तो खस्ता है! उसके पास कोई रस्ता नहीं है। सो तो है! पांय लागूं, पांय लागूं बौहरे आप धन्न हैं! आपका ही खाता हूं, आपका ही अन्न है। सो तो है खचेरा! वह जानता है उसका कोई नहीं है, उसकी मेहनत भी उसकी नहीं है।’

     

    –सो तो है लल्ला! भौत पैलै मैंनै तेरी जे कबता आकासबानी पै सुनी हती। अब नई ‘किसान चैनल’ पै सुनाय दै!

     

    —’किसान चैनल’ पर किसानों के लिए खेती-बाड़ी की शिक्षा होनी चाहिए, पर वहां प्राय: मनोरंजनधर्मी कार्यक्रम ही आते रहते हैं। इससे तो ‘दूरदर्शन’ का पुराना ‘कृषि-दर्शन’ ही अच्छा था जो कम समय में इकलौती चैनल पर ज़्यादा जानकारियां दे जाता था। टीवी के पैसे वसूलने के लिए पूरा देश देखता था। किसानों से जुड़ाव बना रहता था। आप ये बताइए चचा! जिस देश की सत्तर प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर हो, क्या उस अनुपात में कृषि विश्वविद्यालय हैं? क्या सबको एमबीए, डॉक्टर और इंजीनियर बनाकर कॉर्पोरेट सैक्टर को चमकाते जाओगे? किसान बनाने के लिए कितने संस्थान हैं? चचा मेरे ख़्याल से इस बजट में पूरा ध्यान कृषि पर केंद्रित करना चाहिए।

     

    –कल्ल ई अखबार में पढ़ी हती कै रोजीना ढाई हज्जार किसान खेती छांड़ि रए ऐं।

     

    —आंकड़े ये भी बताते हैं कि आज एक किसान की औसत आमदनी एक चपरासी की आमदनी से कहीं कम है। परिवार भूख से मर रहे हैं। कमेरे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। देखिए औद्यौगिकरण एक समस्या। कॉरपोरेट लालच दूसरी समस्या। किसान के प्रति आपके मन में आदर भाव की कमी का आना और उसके प्रति असंवेदंशील हो जाना। साहूकार द्वारा ब्याज का बढ़ा दिया जाना। जो साहूकार ये सोचता था कि इस किसान की बेटी का ब्याह भी होगा और उसकी सहायता भी करता था, वह अब कर्ज भी देता है तो आठ रुपया सैंकड़ा की दर से ब्याज पर पैसा देता है। आज भी चचा हमारे किसान का रोम-रोम लोन में फंसा हुआ है। नीति-निर्धारक कोई भी लोग रहे हों, ऐसे लोग हैं जिनका कृषि से कोई सरोकार नहीं रहा और मैं समझता हूं कि बहुत सारी चीजें जो किसान को मिलनी चाहिए, मिल नहीं रही हैं। अच्छी भंडारण की सुविधा नहीं है, अच्छी वितरण की सुविधा नहीं है। फसल कब जल जाती है, सड़ जाती है, ओले पड़ जाते हैं, पाला मार जाता है। भूमि अधिग्रहण की नीतियां ऐसी कठोर हैं कि औद्योगिक विकास और शहरीकरण के चक्कर में जो ऊपजाऊ जमीन है, वह किसान से छीन ली जाती है। अच्छी प्रजाति के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं है। एक लहर आती है, बताया कि इस तरह के पेड़ लगाओ तो उस तरह के पेड़ लगाए, दूसरी तरह की फसलें खराब हो गईं, जैसे आज कहते हैं कि बाजरा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, लेकिन जब कभी लहर चली धान की और चावल की तो बाजरा बोना बंद कर दिया और आज बाजरे का आटा कॉरपोरेट सैक्टर डिब्बों में बंद करके देता है पांच सौ रुपयों में एक डिब्बा, जिस पांच सौ रुपए में पूरे घर के लिए अन्न उगाता है आज किसान वह डिब्बे में लाता है बाजरा। ये चचा ऐसी विडम्बनाएं हैं कि क्या किया जाए! न इनका बीमा। छः माह में फसल तैयार हुई, न किसान का बीमा, नंगे पांव गर्मी, जाड़े, बरसात में खुले आकाश के नीचे वह क्या करेगा, बच्चे उसके सड़क पर हैं, भूखे सोने को मजबूर हैं। चचा ये जो बजट है ये किसानों की छोटी-मोटी ऋण मुक्ति की लोकप्रिय घोषणाओं के बजाए उनकी दुर्दशा दूर करने के लिए कुछ करे तो बात बने। सहकारी समितियां स्वतंत्र अस्तित्व में आएं और किसान को सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ाएं। ऋण देना प्रगति की गारंटी नहीं है। लेकिन उसको नीचे से सहयोग देना जरूरी है। बीज के साथ सरकार अपना खाद-पानी भी मुहैया कराए और किसान को समझे कि वह उसका एक पौधा है, उसको भी फलना-फूलना है।

     

    wonderful comments!