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  • ओबामा के असहज की सहजता
  • ओबामा के असहज की सहजता

     

    —चौं रे चम्पू! ओबामा इंडिया आयौ और इंडोनेसिया गयौ, पिछले चार दिना में का खास बात देखी तैनैं?

    —चचा, मैंने ओबामा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक उसके असहज की सहजता देखी। आप जानते हैं कि विश्व में जब-जब महाशक्तियों ने कठोरता और कट्टरता का रास्ता अख़्तियार किया तब-तब उस समय की जनता और सच की शक्तियों ने बड़ी सहजता से उन्हें शिकस्त दी है। अपने देश का ही धार्मिक इतिहास देख लो, वर्ण-व्यवस्था और कर्म-कांड को उस समय के सहजयान, सहजयोग और सहज संप्रदायों ने सहजता से परास्त कर दिया। शक्तिशाली वैष्णवों से भी एक सहजिया वैष्णव संप्रदाय निकल आया था।

    —तू कहनौ का चाहै चंपू?

    —ओबामा को सहजता की ताकत मालूम है चचा। यात्रा में सब कुछ कितना प्रायोजित रूप से सहज दिखाई दिया। उसका आगमन जिस असहजता के कारण हुआ, वह पिछले कुछ सालों में अपने देश के युवाओं और अपनी अर्थ-व्यवस्था को देखकर उसके अन्दर पैदा हुई । पूरी दुनिया पर दादागिरी चलाने वाला अमेरिका बदला नहीं है चचा। वैसा का वैसा है। हमसे दसियों गुनी आर्थिक ताकत, हमसे बहुत कम आबादी, प्रति व्यक्ति वहां की आय हमारी प्रति व्यक्ति आय से कई गुना ज़्यादा, फिर भी ओबामा असहज हो गए। उन्होंने हमारे देश को नौजवानों के देश की तरह देखा। हमारे बच्चों की तेजस्विता देखी। कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहां हमारे युवाओं ने कुछ करके न दिखाया हो। पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलीं, घनघोर गरीबी है, उसके बावजूद अच्छे से अच्छा करके दिखाया है, क्योंकि चुनौतियां अब राष्ट्रीय नहीं रहीं, अंतरराष्ट्रीय हो गई हैं। ज्ञान का ख़ज़ाना केवल अमरीकियों के लिए खुला हो, अब ऐसा नहीं है।

    —तौ अब कैसौ ऐ रे?

    —ज्ञान हमारे बच्चों के लिए भी अब सहज उपलब्ध है। इस समय अमरीकी युवा में अपने ज्ञान के खज़ाने के प्रति उतना आकर्षण नहीं है जितना हमारे बच्चों में उस ज्ञान के प्रति है। दूसरी बात ये कि आतंक के घनघोर साए में जी रही दुनिया के लिए आज रास्ता दिखाने वाला कौन सा अंतर्तत्व है… तुम्ही बताओ चचा!

    —अब प्रवचन तू दै रह्यौ ऐ, तौ तू ई बता। हम जे समझैं कै रस्ता गांधी ऐ।

    —बिल्कुल ठीक कहा चचा। देश में कितने ही महात्मा गांधी मार्ग हैं, एक महात्मा गांधी मार्ग पर उन्होंने उतार दिया अपना एअरफोर्स वन विमान। ओबामा को अहिंसा और मानवता के गांधीवादी विचार आकृष्ट करते हैं। यह भाव ओबामा के अन्दर का असहज नहीं, एक सहज भाव है। वह संघर्षों से उठकर ऊपर आया है इसलिए भी पुराने राष्ट्रपतियों की तुलना में ओबामा में गांधी के प्रति एक भावात्मक अनुराग है।

    —फिर असहज के सहज वारी बात कहाँ गई?

    —चचा, इस बात को समझते हैं अर्थशास्त्री और कूटनीतिज्ञ। अपनी वाणी में ओबामा ने न तो बड़बोलापन दिखाया, तोतलापन। न वह कहीं भटका, न अटका। पाकिस्तान के बारे में भी संयम के साथ बोल गया सो बोल गया। मुस्कान बांटी। अफ्रीकी लय-ज्ञान ओबामा दंपत्ति को है। वे बुश की ठसक नहीं, अन्दर की थिरक रखते हैं। सबसे ज़्यादा सुरक्षा-परवाह के साए में बेपरवाह और लापरवाह से दिखे। उसकी ये ओढ़ी हुई सहजता अगर समझ में आ जाए तो हम अमरीका के आज के मनोविज्ञान को समझ सकते हैं। दो बड़ी इमारतें धंस गई थीं। उतने ही गहरे धंस गई दहशत अमरीकियों के मन में। समुद्र तटों पर स्वछन्द किलोल करने वाली प्रजाति आतंकवाद की गुलेल से घबरा गई और उसने देखा कि हम पड़ोसियों के दुर्भाव के बावजूद अपनी सद्भावना नहीं छोड़ते। ये बात ओबामा की समझ में आ गई।

    —तेरी समझ में और का बात आई?

    —ओबामा बचपन से ही उल्टे हाथ से ज्यादा काम करते रहे हैं। उन्होंने ज़्यादातर उल्टा हाथ हिलाया। उल्टे हाथ से मनमोहन सिंह का कंधा थपथपाया। उल्टे हाथ से ही ताज होटल में शहीदों के लिए श्रद्धांजलि लिखी। उल्टे हाथ से लिखने का एक लाभ है चचा। लिखते वक़्त मुट्ठी ऊपर होती है, पंक्ति दर पंक्ति जब वो लिखता जाता है तो ऊपर उसने क्या लिखा, कोई देख नहीं सकता। लिखाई मुट्ठी के नीचे छिप जाती है। वैसे उसकी थिरकती हुई कामनाओं, शांति की प्रस्तावनाओं और मिलन की भावनाओं से कौन खुश नहीं होगा, बस हमें छिपी हुई इबारतों को समझना होगा।

    —लल्ला, तू भी सहज है जा, असहजता में का धरौ ऐ?

     

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