मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • एक मोटा-काला पर्दा
  • एक मोटा-काला पर्दा

    —चौं रे चम्पू! जे बलात्कारी लोग अखबार नायं पढ़ैं का, टी.वी. नायं देखैं?

    —हो सकता है देखते हों, लेकिन कोई भी अपराधी यह सोच कर अपराध नहीं करता है कि वह पकड़ा भी जा सकता है। अपराध का निर्बंध आवेग उसकी मानसिकता पर एक काला पर्दा डालकर उसे हर तरह से निश्चिंत कर देता है कि भले ही सब पकड़े जाएं, पर तू कभी नहीं पकड़ा जा सकता। अगर उसको कुकृत्य से पहले एक प्रतिशत भी यह बोध हो कि उसे दण्ड मिल सकता है, तो निन्यानवै प्रतिशत संभावना है कि वह अपने क़दम रोक लेगा। मनोज का साथी प्रदीप लखीसराय के बड़हिया गांव में अपने मौसा के घर से पकड़ा गया, अब पछता रहा है, ‘मैंने बहुत बड़ी गलती की।’

    —जब मानि रह्यौ ऐ कै बड़ी गल्ती भई, तौ करी चौं?

    —आपकी ये ‘चौं’ बड़ी भोली है चचा! सब कुछ जानने के बावजूद आपसे सवाल कराती रहती है। बलात्कार क्यों होते हैं, इसके अनेक कारण हैं। आप भी जानते हैं, कुछ मैं भी जानता हूं। चलिए, पहले आप बताइए।

    —मैं तौ जे समझूं लल्ला, कै सभ्यता और संसकृती की नई हवा नैं युवा लोगन के दिमाग बिकरित कद्दए ऐं।

    —लेकिन इसी नई संस्कृति और सभ्यता की हवा ने हमारी युवा पीढ़ी को आगे भी बढ़ाया है। बलात्कार के विरुद्ध उसी युवा पीढ़ी का आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। समाज में अपराधी कम होते हैं, अपराध के शिकार लोग ज़्यादा होते हैं। किसी न किसी रूप में हम सब इन चन्द अपराधियों के कुकृत्यों के परिणाम भुगत रहे हैं। अकेली पीड़िता नहीं बल्कि उसका परिवार, उसका मौहल्ला, उसका समाज सब जैसे यंत्रणा भोग रहे हों। बलात्कारी की पत्नी का परिवार तक यंत्रणा भोग रहा है। पूरा गांव कहता है कि हमारे कुंवर साहब अगर दोषी पाए जाएं तो उनको फांसी पर लटका दो। अब जींस पहन कर कुंवर साहब पता नहीं कौन से जींस विकसित करके कामान्ध हो गए! बर्बर, नृशंस और हत्यारे हो गए। क़ानून मर्यादा सब कुछ भूल गए। अब भीगी बिल्ली बनकर मुंह पर कपड़ा ढके हुए हैं। लज्जा से मानो गड़े जा रहे हैं। प्रतीक्षा कर रहे हैं कि ज़मीन फट जाए और वे उसमें समा जाएं। लेकिन धरती के साथ उन्होंने क्या किया। उन्होंने तो धरती के गर्भ में बोतल और मोमबत्ती छोड़ दीं। क्रोध आता है चचा, बहुत क्रोध आता है।

    —हां, क्रोध चौं नायं आवैगौ? क्रोध तेई सरकार में चेत आवै।

    —सरकार और सरकार की पुलिस तरह-तरह के बयान देते हैं चचा! ये कहना कि बलात्कार पहले भी होते आए हैं। पहले ख़बर बाहर नहीं आती थी, परिवार और समाज द्वारा दबा दी जाती थी। अब नई चेतना और जागरूकता के रहते, अगर थानों में रपट लिखाई जाने लगी हैं तो उसको अनदेखा करने की चेष्टाएं होती हैं। हम एक बदलते हुए समाज में रह रहे हैं चचा। इसी समाज ने शराब पिलाकर और अश्लील फ़िल्में दिखाकर, विकृति के बीज को अपराधों का पेड़ बनाया है। अभी भी जितने बलात्कार होते हैं, प्रकाश में कहां आते हैं। दण्ड तो मिलता है उस कन्या को जिसके भविष्य की सुध लेने वाला फिर भविष्य में कोई नहीं होता। कितनी बलात्कार पीड़िताएं आत्महत्याएं कर लेती हैं और हमारा समाज चुपचाप ख़बर को देह के साथ दफ़न कर देता है। बलात्कार का प्रमुख कारण है एक मोटा-काला पर्दा जो अलग-अलग जगह पर अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है।

    —समझाय कै बता लल्ला!

    —ये काला पर्दा बलात्कारी के मस्तिष्क में कुछ इस तरह से अपना प्रसार करता है कि दिमाग़ की तार्किक फैकल्टीज़ का उजाला समाप्त हो जाता है। ये काला पर्दा समाज की बुद्धि पर भी पड़ जाता है, जो इन मामलों को दबाने का पक्षधर हो जाता है। ये काला पर्दा हमारी न्याय-प्रक्रिया पर भी पड़ा रहता है, जहां अभी तक इस अपराध के लिए उपयुक्त और मानवीय सोच के साथ दिए गए दण्ड-विधान का प्रावधान नहीं है। इस काले पर्दे में सुराख़ कर रही है हमारी जागरूक नई पीढ़ी। वे पीड़िता बालिकाएं और महिलाएं जो इस कुकृत्य पर पर्दा डाले रहना अब पसन्द नहीं करती। मैं समझता हूं चचा, इन सुराख़ों से आने वाली रौशनी ही बलात्कारों को रोकेगी।

    wonderful comments!

    Comments are closed.