मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • इम्प्लिमैंट सून बिकॉज़ बिन पानी सब सून
  • इम्प्लिमैंट सून बिकॉज़ बिन पानी सब सून

     

    —चौं रे चम्पू! पुड़िया खोलै चौं नाऐं, रंगन नै घोलै चौं नाऐं रे?

    —चचा, पुड़िया खोलूंगा पर घोलूंगा नहीं। पुड़िया में घुलने वाले रंग नहीं हैं, सूखा गुलाल है। गुलाल का तिलक लगाऊंगा, क्या आपको कोई मलाल है?

    —बिना भीजे होली कौ का मजा? सूखी होरी खेलैगौ का?

    —सुपर सूखी चचा! दिल भीगने चाहिए। मैंने तो मोहल्ले के सारे बच्चे-बच्चियों और उनके चच्चे-चच्चियों को बताया कि इस बार सिर्फ तिलक वाली होली खेलो। तिलक वाली होली तीन तरह से लकी होती है।

    —कैसे-कैसे?

    —मैंने बताया, नम्बर एक, आपकी कोमल कमनीय काया कुटिल कल्मषी कैमिकली कलरों से क्लांत नहीं होगी। इस प्रकार आप अपनी काया की किलकार को बचाएंगे। नम्बर दो, आप इस सड़ित सामान जैसे कीचड़ और कैमिकली कुटिल रंगों से अपने घर बाहर के सामान, सोफा, कालीन, साइकिल, स्कूटर, कार को बचाएंगे और नम्बर तीन,  उस सब कुछ को धोने के लिए जितने पानी की ज़रूरत होती उस अमूल्य पानी के भण्डार को बचाएंगे। तिलक से त्रिलकी हो जाएंगे।

    —जैसे आज तेरी बात सब मान लिंगे! बता मान गए का?

    —हमारा काम था बताना। मानना न मानना उनके ऊपर। एक बौड़म कवि जी हैं मौहल्ले में। मेरी बात काटने के लिए लगे तुक मिलाने और बच्चे लगे खिलखिलाने। मैंने पानी बचाने की बात कही तो नाचने-गाने लगे और पूछने लगे—  कौन सा पानी, बता तू कौन सा पानी, अजी हां कौन सा पानी? गागर का पानी या सागर का पानी, अंदर का पानी या बाहर का पानी, आंख का पानी या नाक का पानी, रुतबे का पानी या धाक का पानी, कौन सा पानी ? बता दे कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? शरम का पानी या धरम का पानी, करम का पानी या मरम का पानी, गहरे का पानी या चेहरे का पानी, पोखर का पानी या नहरे का पानी, कौन सा पानी? बता दे कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? निर्मल पानी या झिलमिल पानी, हलका पानी या बोझिल पानी, दरिया का पानी, गगरिया का पानी, मौत का पानी, उमरिया का पानी, कौन सा पानी? बता दे कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? मोती का पानी मनौती का पानी, काठ का पानी, कठौती का पानी, धार का पानी या लार का पानी, वार का या तलवार का पानी, कौन सा पानी? बता दे कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? रूप का पानी, सरूप का पानी, पक्के या कच्चे कूप का पानी, छन्ने का पानी या गन्ने का पानी, फोकट का पानी, अधन्ने का पानी, कौन सा पानी? बता दे कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? छाले का पानी या भाले का पानी, काला पानी या नाले का पानी, जीने का पानी या पीने का पानी, मेहनत का पानी, पसीने का पानी, कौन सा पानी? बता तू कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी? अजी हां, कौन सा पानी? बचाएंगे कौन सा पानी?

    —दूर की कौड़ी लायौ बौड़म। तू तौ चक्करघिन्नी खाय गयौ होयगौ?

    —चचा, लफ्फाज़ी के आगे हार नहीं मानता हूं, मैंने बौड़म जी को बताया कि भारत में पानी का संकट इस समय सबसे गहरा है। क्योंकि गहराई में भी पानी खत्म हो रहा है। जीने योग्य और पीने योग्य पानी की सप्लाई भारत के अनेक शहरों में दूसरे या तीसरे दिन हो पाती है। ऐसे में होली पे अरबों लीटर पानी चेहरा बिगाड़ने और खूबसूरती को वापस लाने में खर्च हो जाएगा। पहले फूलों के प्राकृतिक रंगों से पिचकारी भरी जाती थी। टेसू के फूल के रंग देह की दीप्ति बढ़ाते थे। दो चार लोटे जल में सब कुछ धुल जाता था, शरीर खिलखिलाते हुए खुल जाता था। अब ये जो कैमिकली कलर आए हैं, पानी तो पानी पैट्रोल से भी नहीं जाते। एक बार देह से पैट्रोल-कैरोसिन लगी तो उसकी गंध भगाने के लिए फिर लग जाएंगी दस-बीस बाल्टी।  मैं इस पानी की बात कर रहा हूं, इसलिए बौड़म जी! पानी से उत्पन्न कल्पना की लहरों को अपनी विकट खोपड़ी के मंच पर मत नचाइए, जो विशुद्ध पानी है न, उसे बचाइए। माना कि आपका अंदाज़े-बयां लासानी है, याद रखिए होली पर बचाए गए इस एक पानी में आपके हर तरह का पानी है। इसलिए तिलक वाली होली को इम्प्लिमैंट करें सून, बिकॉज़ पानी बिन सब सून।

     

    wonderful comments!