मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • इतिहास के पन्ने फड़फड़ायमान
  • इतिहास के पन्ने फड़फड़ायमान

     

    —चौं रे चम्‍पू! सबते आसान काम का ऐ?

    —चचा सबसे आसान काम है ज्ञान बघारना। थोथा चना बाजै घना।

    —अज्ञानी की कलई नैंक देर में खुल जायौ करै लल्ला। ज्ञान की दाल ई न होयगी तौ बघार काए में लगाऔगे?

    —ज्ञान के पानी के बिना भी लोग अपनी दाल गला लेते हैं आजकल। जिस ज्ञान के लिए पहले लोगों को मेहनत करनी पड़ती थी, अब बिना श्रम के इंटरनेट पर उपलब्ध है। संसार के किसी भी क्षेत्र का कोई भी ज्ञान चाहिए आपको, पलक झपकते मिल जाएगा। जितना मिलेगा, पर्याप्त से अधिक होगा। उस पर संतोष करिए, फिर आपके पास कौशल होना चाहिए उसे बघारने का। उसे सज़ा कर नया रूप देने का। अखबारों को देखिए हर दिन अपार ज्ञान दान देने वाले लेख छप रहे हैं। फोटो जर्नलिस्ट नेट से किसी का भी फोटो उठा लेते हैं। कौन मेहनत करके खींचने जाय। विश्वविद्यालयों में देखिए, दनादन पी-एच.डी. अवार्ड हो रही हैं। नव्वै प्रतिशत माल नेट से उपलब्ध हो जाता है। दस प्रतिशत में परिवार और गाइड का आभार और अंत में उपसंहार। ये भी न करना चाहो तो नेट से नकली डिग्री भी मिल सकती हैं।

    —तेरी बात हमारे पल्ले नायं परी।

    —पल्ले कैसे पड़ेगी चचा! तुम इंटरनेट के बारे में कुछ जानते ही नहीं हो। मेरे लैपटॉप पर इस समय वायरलैस नेट-कनैक्ट लगा हुआ है। किसी भी विषय पर तुम मेरी परीक्षा अभी ले सकते हो। शानदार भाषण दूंगा।

    —आज आठ जुलाई ऐ। आठ जुलाई पै भासन दै कै दिखा।

    —दो मिनट का समय तो दोगे। ये भरा गूगल सर्च में आठ जुलाई… और ये विकिपीडिया पर भी भर दिया लो। अब सुनो! आठ जुलाई हमारे इतिहास का एक ऐसा दिन है जब खुशियां भी मनाई गईं और गम भी हुए। कहीं सुख बढ़े तो कहीं कुछ कम भी हुए। पिछले एक हज़ार साल में जब जब आठ जुलाई आई, कुछ ताप कुछ तेवर लाई। पं. नेहरू और श्याम बेनेगल ने भारत को खोजने की बहुत कोशिश की पर पहली कोशिश अब से छ सौ ग्यारह साल पहले वास्कोडिगामा ने की थी। आज के ही दिन उसका जहाज़ भारत को खोजने निकला था। ग्यारह महीने की समुद्री यात्रा के बाद वो केरल के कालीकट के तट पर पहुंच गया। उसने भारत खोज लिया।

    —वानै का खोजौ? भारत तौ पहले ते ई खोजौ-खुजायौ ओ।

    —मित्रो! चलो अगली खोज बताता हूं। आज के ही दिन नौ सौ नव्वै साल पहले पन्द्रह हज़ार भूखे ईसाई सिपाहियों ने जेरूसलम में जुलूस निकाला था। और आपने सुनी होगी लिबर्टी-बैल! जो आज के ही दिन फिलेडेल्फिया में स्वतंत्रता की घोषणा करने के लिए बजाई गई थी। इस घंटी में समता, स्वतंत्रता और भाईचारे की गूंज थी। इस गूंज ने विश्व भर को जनतंत्र का रास्ता सुझाया। पर अफसोस बहुत ठोस कि अठारह सौ बानवै में इसी दिन न्यूफाउण्डलैंड में भयंकर आग लगी। इतनी तबाही मची कि इसे ग्रेट-फायर का नाम दिया गया। सद्दाम हुसैन तो बेचारा बाद में मारा गया, लेकिन उन्नीस सौ बयासी में आठ जुलाई के ही दिन दुजैल में उसे बम से उड़ाने की कोशिश हुई थी। उन्नीस सौ निन्यानवे में इसी दिन ऐलेन डेविस को फ़्लोरिडा में मृत्युदण्ड दिया गया। लेकिन मित्रो,  यह आखिरी मृत्युदण्ड था जो बिजली की कुर्सी पर दिया गया। एक और अफसोसनाक वाक़या हुआ इसी दिन, सन दो हज़ार तीन में , सूडान ऐयरवेज़ की फ्लाइट थर्टी नाइन में एक सौ सोलह लोग मारे गए। विधाता का करिश्मा देखिए कि दो साल का एक बच्चा बच गया। उन्नीस सौ चौरानवे में आज के ही दिन कोरिया के कम्युनिस्ट शासक किम इल सुंग का देहांत हुआ। आपने किम इल सुंग की मोटे गत्ते के जिल्द वाली किताबें जामा मस्जिद के फुटपाथों पर बीस साल पहले बिकती देखी होंगी। नॉर्थ कोरिया पर पूरे छियालीस साल शासन किया। मरते-मरते भी वह अपने बेटे किम जोंग को राष्ट्रपति बना गया।  इतिहास के पन्ने फड़फड़ायमान हैं। मित्रो, मैं आपको आठ जुलाई के बारे में कम से कम सौ तथ्य अभी और बता सकता हूं।

    —बस बस रहन्दै! इतिहास के बड़े-बड़े प्रौफेसर गस खायकै ढेर है जांगे। पर चम्पू, सारे उदाहरन बिदेसी! ऐं, भारत के ताईं आठ जुलाई कौ कोई महत्व नाऐं का?

    —चचा! नेट पर अभी सिर्फ एक ही नीट-सी एंट्री मिली है। उन्नीस सौ अठावन में आज के  ही दिन अभिनेत्री नीतू सिंह का जन्म हुआ था। चाहो तो बधाई दे दो।

     

    wonderful comments!