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  • आप हुए सम्भ्रांत     

     

     

     

    –चौं रे चम्पू! दिल्ली के चुनावन में तैनैं कोई भविस्यबानी करी हती का?

     

    —की थी, जो एकदम सही निकली। मैंने अपने परिवार में भविष्यवाणी की थी कि परिणाम एबीसीडी के क्रम में रहेगा। ए से आप, बी से बीजेपी, सी से कॉंग्रेस और डी से दूसरे। सी और डी शून्य रहे। शून्य में क्या छोट-बड़ाई। हालात तो ऐसे बन रहे थे कि बी भी शून्य होने-होने को था। मेरा एक दोहा सुन लीजिए।

     

    —सुना!

     

    —चिंतन हार व जीत का करते रहिए आप। ‘आप’ दिलों तक घुस गई दिल्ली में चुपचाप। कांग्रेसी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समभावी हो ही चुके हैं। फिलहाल चिंतन न कर पाएंगे।  चिंतन करना है बीजेपी को, वहां कुछ दिन तक चैनविहीनता में अन्दरूनी विलाप चलेगा। उनके लिए नदीम का एक शेर काफ़ी है, ‘सबब तलाश करो अपने हार जाने का, किसी की जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा।’

     

    —हमैं हार कौ नायं, जीत कौ सबब बता।

     

    —जीत का प्रमुख कारण था, ‘आप’ के नेता का अपने आप पर नियंत्रण। सन चौदह के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद केजरीवाल को समझ में आ गया कि ‘आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी मिलै न पूरी पावै’, देश लपकने की फ़िराक में दिल्ली को छोड़ जाना उनकी सबसे बड़ी ग़लती थी। इस ग़लती के लिए पिछले आठ महीने में उन्होंने जनता से सैंकड़ों-हज़ारों बार माफ़ी मांगी। और चचा! जनता ने भी दरियादिली से माफ़ कर दिया।

     

    —सो तौ है! दिल्ली दरियादिल ऐ!

     

    —कहते हैं कि मुख्यमंत्री पद त्यागने के बाद केजरीवाल के दोनों बच्चों के सहपाठी उन्हें ताना मारते थे कि तुम्हारे पापा भगौड़े हैं। बच्चों ने यह ताना अपने पापा तक पहुंचाया होगा। हिल गए होंगे पापा केजरीवाल। चचा, अवसरवादी साथी तो आते-जाते रहते हैं, पर परिवार ही साथ न दे, यह मामला गम्भीर हो जाएगा, यह उन्होंने सोचा होगा। इस आत्मसंघर्ष के साथ पिछले आठ महीने उन्होंने संयम के साथ श्रम किया।

     

    —तौ जीत कौ प्रमुख कारन परिवार ऐ! दूसरौ?

     

    —केजरीवाल का साहस और साफगोई! पूरा देश इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है कि कालेधन के बिना चुनाव नहीं लड़े जा सकते। किसी ने करोड़ों में कालाधन खर्च किया, किसी ने लाखों-हजारों में। मतदाता ने सोचा, लाख वाले को माफ़ करो और केजरीवाल ने भी कह दिया कि मैंने अपराध किया है तो बन्द कर दो। उन्हें अपनी ताकत का एहसास हो चुका था कि अब फिर से दिल्ली उनके पीछे है।

     

    —तीसरी बात बता।

     

    —’आप’ को सभी समुदायों के लोगों का समर्थन मिला। ग़रीब-अमीर, अनपढ़-बुद्धिजीवी, हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी ने एक परीक्षक की तरह तीनों पार्टियों की कॉपियां जांचीं और सत्तर में से सड़सठ नम्बर दे दिए केजरीवाल को। कुछ नंबर तो बिन मांगे मिल गए। ऐसा  पहली बात हुआ कि किसी धार्मिक समुदाय का नेता कह रहा है कि भई समर्थन ले लो और लेने वाले ने सरेआम मना कर दिया। केजरीवाल ने बुखारी की सद्भावना पर अपनी बुहारी फेर दी। बीजेपी के आत्मविश्वासहीनता में लिए गए निर्णय भी आप के पक्ष में गए। जीता केजरी का आत्मविश्वास और निस्वार्थ नौजवानों का टीमवर्क।

     

    —बस एक कारन और बता।

     

    —चचा, मतदाता कॉंग्रेस को वोट देकर उन पर तरस नहीं खाना चाहता था, बीजेपी की बढ़ती हेकडी को एक सबक सिखाना चाहता था। आपके चम्पू ने पन्द्रह-सोलह साल पहले नागरिक की ओर से वोटर की मोटर निकाली थी और कहा था कि जीत पार्टियों की नहीं नागरिकों की होनी चाहिए। इस बार की सबसे बड़ी बात यही है कि दिल्ली में बिना किसी दबाव के नागरिकों की इच्छाओं की जीत हुई है। इसके लिए केजरीवाल को बधाई! हां, दिल में एक मलाल है चचा।

     

    —का मलाल ऐ रे?

     

    —झाडू उपेक्षित सी रही। पिछली बार जीत के जश्न में आकाश असंख्य झाड़ुओं से भरा था, वे झाड़ू स्वच्छता अभियान में भी सम्मान पाती रहीं। झाड़ू ग़रीब की जोरू की तरह गांव की भौजाई हो गई, अब स्वयं गरीब भी झाडू को उतना भाव नहीं दे रहा, ’आप’ की सरकार भी पूर्ववर्तियों की तरह सम्भ्रांत होने जो जा रही है। अहंकार न करना, अहंकार के परिणामस्वरुप बीजेपी, कॉंग्रेस हारे। मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता, बहुत छोटा आदमी हूं। ऐसी सरकार बनाऊंगा जिस पर अमीर और गरीब दोनों गर्व करैं। कितने संभ्रांत वक्तव्य हैं।

     

    —किरन बेदी का करैगी।

     

    —एकांत में मोदी और केजरीवाल के बीच दुभाषिये का काम।

     

    wonderful comments!