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  • अभी मैं कोई बयान नहीं दूंगा

     

    —चौं रे चम्पू! तबीयत तौ ठीक ऐ?

    —नहीं! एक महामारी की चपेट में आ गया हूं।

    —कौन सी महामारी लल्ला? स्वाइन फ्लू है गयौ ऐ का?

    —स्वाइन फ्लू है न स्वान फ्लू, यानी महामारी न सूअर वाली है न हंस वाली, महानता का महारोग लग गया है चचा!

    —वाके का लच्छन हौंय?

    —मैं जब स्वस्थ था तब हर बात का तत्काल उत्तर दिया करता था। सोचने से पहले बोलना शुरू! आजकल गुम्माटा लग गया है। चचा, मैंने बहुत से महान लोगों को देखा है कि वे अपनी बात का तत्काल उत्तर नहीं देते हैं। पलकें झपकाते हैं, मुंडी को ऊपर-नीचे घुमाते हैं, सिर खुजाते हैं, फिर चश्मा साफ करते हुए कहते हैं— ‘देखिए, इस पर अभी मैं कोई बयान नहीं दूंगा।’ उनसे पुन: पूछा जाता है तो वे ‘नो कॉमैंट्स’ कह कर आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे लोग मुझे सदा से महान लगते रहे हैं। तीन दिन पहले महान शाहरुख़ खान ने भी कहा था कि आप जब उम्रदराज हो जाते हैं तब आपको पता चलता है कि ‘नो कॉमैंट्स’ की ताक़त क्या है। पिछले कुछ दिनों से मैं भी ‘नो कॉमैंट्स’ कहकर प्रश्नों से किनारा कर रहा हूं। ज्यों की त्यों वही बोली मेरे कंठ से निकल रही है— ‘देखिए, इस पर अभी मैं कोई बयान नहीं दूंगा।’ बोलने के बाद लगता है कि अरे, मैं तो इस महानता की महामारी की चपेट में आ गया। जिस बीमारी से नफ़रत करता रहा हूं, मुझे लग गई। अब क्या हो?

    —खुल कै बता, तब कोई निदान सोचैं।

    —पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। मैं उन्हें यही उत्तर दे रहा हूं। वे फिर-फिर मेरी खोपड़ी को खोदते हैं। यह तो ठीक है कि आप अभी बयान नहीं देंगे, लेकिन यह तो बताइए कि ऐसा जो हुआ, वैसा क्यों हुआ? मैं कहता हूं कि वैसा होने के ऐसे कारण थे जिन्हें ऐसे बताने में कैसे-कैसे लोगों को वैसा-वैसा लग सकता है। वैसे, वैसा होने के पीछे, ऐसा है कि पद हो सकता है, पुरस्कार हो सकता है, पैसा हो सकता है और ‘कुछ नहीं भी’ जैसा हो सकता है, लेकिन वैसे लोगों के बारे में मैं ऐसा-वैसा कोई बयान क्यों दूं?

    —सब तौ बोल दियौ, और का बोलैगौ? पर मैंनै तेरे दिमाग की नब्ज़ टटोल लई। निस्चिंत रह! तोय जे बीमारी अबहिं नायं लगी। सुनी ऐ कै नायं? एक चुप्प सौ कूं हरावै।

    —मौन के बारे में तरह-तरह की धारणाएं हैं, चचा। कोई कहता है कि मौन मूर्खों का लक्षण है, कोई कहता है विद्वानों का। कालिदास ने मौन साधा। महात्मा गांधी जब घिर जाते थे तब मौन साध लेते थे। बाद में कहते थे कि मौन से अच्छा कोई भाषण नहीं। बौद्ध धर्म के पालि भाषा के ग्रंथों में मौन को सबसे बड़ा ज्ञान बताया गया है। कहते हैं कि मिर्ज़ा गालिब भी आफ़त आने पर ख़ामोश रहते थे, लेकिन शेर कहने से नहीं चूकते थे— ‘है कुछ ऐसी ही बात, जो चुप हैं, वरना क्या बात कर नहीं आती।’ फारसी में एक लोकोक्ति है— ‘जवाबे जाहिलां, बादिश ख़मोशी’, यानी मूर्खों की बात का उत्तर मौन है, लेकिन महान चिंतक बेकन ने मौन को मूर्खों का गुण बताया।

    —मूर्ख जब बोलैं तौ पोल खुल जायौ करै, उनैं छोड़, विद्वानन की बता।

    —अज्ञेय जी का जब मन आता था, मौन की बावरी अहेरी गुहाओं में चले जाते थे। बड़े-बड़े ऋषि कह गए हैं कि मौन एक निरंतर वाणी है, सर्वोत्तम भाषा है। मुझे याद आता है दोस्त नवाज़ देवबंदी का एक शेर— ‘ऐसी-वैसी बातों से तो अच्छा है खामोश रहें, या फिर ऐसी बात कहें जो ख़ामोशी से अच्छी हो’। वे बोल रहे हैं और मैं चुप हूं।

    —उनैं बोलन्दै और अपनी पोल खोलन्दै, पर ऐसी वैसी कैसी बात?

    —सब नाटक हैं चचा! राखी का स्वयंवर नाटक। सच का सामना नाटक। सास, बहू और साजिश नाटक। पद, पुरस्कार और पैसा नाटक। इन नाटकों पर हंसी आती है। इसलिए ऐसी-वैसी बातों से तो अच्छा है खामोश रहें। ठीक है न चचा?

    —नौ कमैंट, चम्पू!

     

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