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    —चौं रे चम्पू! चुनावी हवा कित मांऊ बह रई ऐ रे?

    —चचा, बताना मुश्किल है। हवा किधर भी बहे पर प्रत्याशियों की हवा ख़राब है। पहले चुनाव सभाएं पैमाना हुआ करती थीं, पर महानगरों में इस गर्मी में कोई घर से निकलने को राज़ी नहीं है। जुलूस झुलस गए हैं। मालाएं मुरझा रही हैं। हेलिकॉप्टर का पंखा हवा कैसे करता है, ये देखने के लिए ग्रामीण अंचलों में भीड़ इकट्ठा हो जाती है। चुनाव आयोग के पास जाने वाली सी. डी. इन दिनों हवा बन्द करने के लिए बड़ा अच्छा ढक्कन बनी हुई हैं। प्रत्याशियों को हवा अन्दर से, बाहर से, ऊपर से और नीचे से हर तरफ से परेशान कर रही है।

    —जे अन्दर बाहर ऊपर नीचे की हवा कौन-कौन सी ऐं रे?

    —सिलसिले से बताता हूं। पार्टी के अन्दर अपने ही लोग क्या काट-मार कर रहे हैं, ये अन्दर की हवा से पता चलता है। बाहर की हवा, प्रत्याशी लोग साइकिल, रिक्शा, स्कूटर ख़ुद चला कर खा रहे हैं। नीतीश ने बिहार में रिक्शे पर बैठ कर अभियान शुरू किया था तो कल कपिल सिब्बल सोलर रिक्शा चला रहे थे। बसपा के एक प्रत्याशी के पक्ष में पार्टी के ज़िला महासचिव ने नोटों की गड्डियां हवा में खुलेआम उछालीं। काले धन ने बाहर की हवा खाई।

    —जे तौ ऊपर की हवा भई!

    —नहीं चचा, ऊपर की हवा अलग है। वो है जादू-टोना, तंत्र-मंत्र। प्रत्याशी पी गए लाज-हया घोट के। डॉलरों के खर्चे हैं, चर्चे नहीं नोट के। नाटक हैं, त्राटक हैं, फाटक हैं वोट के। वोटों को खींचने के नए-नए टोटके। गांवों-क़स्बों में ऐसे-ऐसे नज़ारे हैं कि शरीर सुन्नत्व को प्राप्त होने लगा है। अन्धविश्वासों की हवा में जो नुक्कड़-भुक्कड़ नाटक चल रहे हैं उन्हें देख कर रूह रॉक-एन-रोल करने लगी है। श्मशानों में ग़ज़ब की रौनक है। चौराहों पर सिन्दूर, दिए और तरह-तरह के पुए-पकवान अचानक प्रकट हो जाते हैं। पंडितों, ज्योतिषियों, कापालिकों और तांत्रिकों के लिए टोटकोत्सव चल रहा है।

    —प्रत्यासी ते कछू कराय लेउ, करैगौ भैया करैगौ।

    —हां, एक पण्डित ने उम्मीदवार को मतदाताओं के पैरों के नाखून तीन बार छू कर आंखों पर लगाने का टोटका बताया। उम्मीदवार लगा हुआ है। रीढ़ की हड्डी शाम को सीधी नहीं हो पाती। अगले दिन फिर मतदाताओं से निवेदन करना पड़ता है कि कृपया नंगे पैर आएं और उम्मीदवार को उनसे आशीर्वाद पाने का मौका प्रदान करें। एक प्रत्याशी के चमचे प्रचार कार्य छोड़ कर पिछले चार दिन से काला कुत्ता ढूंढने में लगे हुए हैं क्योंकि किसी राजनैतिक तांत्रिक ने बताया है कि रात के एक बज कर एक मिनिट एक सैकिण्ड पर काले कुत्ते को इमरती खिलाने पर ही उसकी जीत मुमकिन है। मतगणना तक अगर काला कुत्ता नहीं मिला तब तो बेचारा मारा ही जाएगा। टोटकों की आंधी में विरोधी भी सतर्क हो गए हैं। एक उम्मीदवार को कापालिक ने बताया कि विरोधी के पैर की मिट्टी और नए शव की राख में सिन्दूर मिलाकर अपने ललाट पर मलोगे तो जीत सुनिश्चित है। यह बात किसी दल-बदलू ने विरोधी तक पहुंचा दी। तब से वह विरोधी न तो अपने जूते उतार रहा है और न अपने समर्थकों की गोदी से उतर रहा है। ऐसे टोटकायुगीन चुनावी माहौल में प्रत्याशियों ने अपने कपड़े तक बाहर सुखाना बन्द कर दिया है। कहीं कोई विरोधी कपड़ों पर तंत्र-सिद्धि करके उसे हरा न दे। नव-शव की राख के लिए मुर्दघाटों पर लाइन लगी हैं। देखते हैं कि अगले चरण में मतदान की लाइन में कितने लोग आते हैं। टोटका देवो भव। टोटका शरणम् गच्छामि।

    —गोधरा-गुजरात कौ भूत ऊ तौ निकरि आयौ! मोदी की जांच होयगी?

    —मामला साढ़े सात साल से चल रहा है। शायद शनि की  साढ़े-साती टूटी हो, पर जांच का सिलसिला आगे कब तक और चलेगा, कौन जाने? ऊपरी हवाएं ही बता सकती हैं। विशेष जांच दल को निर्देश है कि तीन महीने में रिपोर्ट पेश करेगा। तब तक तो चुनाव हो चुके हौंगे। सरकार बन चुकी होगी।

    —छोड़, अब तू नीचे की हवा की बात कर?

    —नीचे की हवा दृष्टि और अनुभूतियों से परे है। वही वोटिंग मशीन की हार्ड ड्राइव को घुमा रही है। इस हवा की हाय भारी पड़ती है चचा—  वोटर को न सताइए, ताकी मोटी हाय, एक बटन की छुअन से, सीट भसम हो जाए।

     

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