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हज़ार साल की गारंटी      

      —चौं रे चंपू! तोय संगीत की सबते कमाल की रचना कौन सी लगै?   —बीसवीं सदी जा रही थी और इक्कीसवीं आ रही थी, तब संगीतमयी एक पंक्ति बारम्बार दोहराई जा रही थी, ’मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा।’ जितनी बार सुनो, अच्छा लगता था। शब्द-शब्द बंधे हुए थे, सारे…


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खड़ी हो सकें आसरे बिना 

  —चौं रे चंपू! मजदूर औरतन्नै पतौ ऐ, आज महिला दिबस ऐ?   —मजदूर नारियां, मजदूर पुरुषों से ज़्यादा काम करती हैं चचा! उन्हें कुछ नहीं मालूम कौन सा दिवस कब आता, कब जाता है। पति कभी कमाता, कभी सताता है। कितने तरह के काम करती हैं मज़दूर औरत, मैंने ‘बुआ भतीजी’ फिल्म में एक…


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चीं-चपड़ और चीं-पौं    

  —चौं रे चंपू! गरदभ-चरचा बंद भई कै नायं?   —गर्दभ-चर्चा घर लेटी, बंद हो गईं मतपेटी। चचा, इंसान होकर बोलना न आए तो जानवर की तरह चुप रहना ज़्यादा अच्छा है। आत्मचिंतक, शांतिप्रिय, मितभाषी, अहिंसा-प्रेमी और धैर्यधन गधा सदा चीं-चपड़ नहीं करता, यदाकदा चीं-पौं करता है। ‘चपड़’ और ‘पौं’ में अंतर है। आदमी की…


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चरखे, घंटियां और पोटलियां    

    —चौं रे चम्पू! बता पिछले दिनन की कौन सी चीज याद ऐं?   —चीज़ें बहुत हैं, पर चरखे, घंटियां और पोटलियां पक्की याद हैं। इंडियन ऑयल के कविसम्मलेन में दीप-प्रज्वलन के समय घंटे-घंटियों, दमामों और नगाड़ों की ध्वनियां गूंजीं। क्या समां बंधा! फिर हर कवि को एक-एक चरखा भेंट किया गया। बताया गया…


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व्यंग्यश्री    

    —चौं रे चम्पू! आनंद में तौ है?   —परमानंद में। पूर्ण आनंद में। सर्वानंद में। सतचित्त आनंद में। आप सोचेंगे कि इतने सारे आनंद कैसे कहां से मिल गए। तो मैं आपके बिना पूछे ही बता रहा हूं कि कल मेरे प्रिय व्यंग्यकार आलोक पुराणिक को एक लाख ग्यारह हज़ार एक सौ ग्यारह…


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कोरा ज्ञान कोरा संवेदन   

  —चौं रे चम्पू! आज बगीची पै बालकन्नै कहां-कहां ते तेरे फोटू निकारि कै दीवार सजाय दईं ऐं! बता अपने जनमदिन पै का भेंट चइऐ तोय?   —आपका और बगीची का प्रेम काफ़ी है, चचा! ठीक छियालीस साल पहले, आठ फरवरी उन्नीस सौ इकत्तर को मैं बीस वर्ष का हुआ था और एम.ए. कर रहा…


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कुछ तो लॉलीपॉप दो   

  —चौं रे चम्पू! आज संसद में ग्यारै बजे बित्त-मंत्री हमाऔ चित्त तौ खराब नायं करिंगे?     —मैं उस समय टी.वी. नहीं देख पाऊंगा। एक स्कूल में बच्चों के बीच बसंत-पंचमी मनाऊंगा और देखूंगा कि उनके चित्त में क्या चल रहा है? वसंत उनके अन्दर क्या हिलोर और उमंग लाता है? चचा, जब भी…


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टिकली जिए बापू   

  —चौं रे चम्पू! टिकली जिए बापू कौन ऐं?   —चचा, ‘प’ पर बड़े ऊ की मात्रा नहीं, छोटे उ की है। बापू नहीं बापु। इसके अलावा एक ग़लती और की आपने। तीन शब्द नहीं हैं, एक ही शब्द है, ‘टिकलीजिएबापु’। ये दूसरी बात है कि ‘टिकलीजिएबापु’ की सतरंगी आभाएं हैं। इस शब्द का निर्माण…


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पूछो फलानों-ढिकानों से 

      —चौं रे चंपू! मोबाइल में का देखि रह्यौ ऐ?   —वाट्सऐप पर एक वीडियो दसवीं बार आया है, पहली बार देख रहा हूं। इसमें दिखाया है कि हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा के अध्यापकों और प्रधानाचार्यों की ज्ञान-दशा क्या है! रिपोर्टर पूछता है अमुक प्रांत की राजधानी कहां है? अब मान लीजिए…


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भुरभुरी मिट्टी कठोर चट्टान 

  —चौं रे चंपू! नयौ साल कैसै मनायौ? —एक जनवरी को दोपहर बाद अचानक आपकी बहूरानी में नई-सी लहर आई, ‘आज कोई फ़िल्म देखेंगे’। ‘बुकमाईशो’ ऐप ने बताया कि दिल्ली और एनसीआर के लगभग सारे सिनेमा हॉलों में सिर्फ़ एक फ़िल्म चल रही है, ‘दंगल’। आमिर ख़ान के बारे में मैं जानता हूं कि वे…


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