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बीएफ जीएफ टीएफ सीएफ डीएफ ईएफ वीएफ पीएफ – podcast episode 9

बीएफ जीएफ टीएफ सीएफ डीएफ ईएफ वीएफ पीएफ – podcast episode 9

आजकल मोबाइल फोन पर प्रतिक्रियाएं देने के कई तरीक़े हैं। क्लास रूम में बैठे-बैठे भी आप दे सकते हैं अगर अपने दोनों अंगूठों और उंगलियों के सहारे मोबाइल को पकड़े हुए, खट-खट-खट एसएमएस करते रहें। एसएमएस की भाषा बच्चों ने निर्मित की है। बड़े-बड़े शब्द क्यों लिखें? शॉर्ट फॉर्म में लिखते हैं। बॉय फ्रेंड क्यों…


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शाम के डबडबाए हुई डार्क में – podcast episode 8

शाम के डबडबाए हुई डार्क में – podcast episode 8

हर उम्र की अपनी चिंताएं होती हैं। प्रौढ़ होते हुए दो व्यस्कों आजकल जब आपस में बतियाते हैं तो प्राय: उनकी चिंताएं अपने बच्चों को लेकर होती हैं। उनके दिमाग़ों में जो विचार आते हैं, वे आत्मसंघर्ष करके टकराते हैं और कई बार वे समझ ही नहीं पाते हैं कि वे किन समस्याओं से वे…


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दिल में है भारत का झंडा – podcast episode 7

दिल में है भारत का झंडा – podcast episode 7

बच्चे कितने कल्पनाशील होते हैं, आप अनुमान नहीं लगा सकते। उनकी कल्पना की भुरभुरी कोमल ज़मीन पर जो बीज पड़ते हैं, वे बड़े मौलिक होते हैं। उनसे निकलने वाले अंकुर अगर बड़े हो जाएं तो ऐसा वृक्ष बनें जिसकी निर्मिति की कल्पना कोई बड़ा आदमी कर ही नहीं सकता। ऐसे ही एक बच्चे की कल्पना-गाथा…


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चमत्कारी ज़ेवर हथकड़ी – podcast episode 6

चमत्कारी ज़ेवर हथकड़ी – podcast episode 6

समाचार पढ़ते ही कविताएं बनने लगती हैं। इसका एक और छोटा सा नमूना मैं आपको आज के इस पोडकास्ट में इस श्रृंखला की इस कविता के तौर पर प्रस्तुत कर रहा हूं…..।


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यमराज पलभर को हुए उतावले – podcast episode 5

यमराज पलभर को हुए उतावले – podcast episode 5

लवस्कार दोस्तो, कितनी ही कविताएं बन जाती हैं समाचार पत्र पढ़ने के बाद। भूख से इतने मरे। फिर अगले दिन पढ़ा भूख से इतने मरे। तो कुछ बेचैनी हुई और एक बिम्ब बना कविता का, जो बना वो मैं आपको बताता हूं। समाचार आया कि भई भूख से इतने मरे। अब कोई कैसे भरोसा करे…


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चार उंगली, एक अंगूठा बराबर पांच – podcast episode 4

चार उंगली, एक अंगूठा बराबर पांच – podcast episode 4

कुछ वर्ष पहले मैंने एक धारावाहिक बनाया था ‘बोल बसंतो’। महिलाओं की आय उपार्जक गतिविधियां। अब बड़ा भारी-भरकम सा शब्द मैंने बोल दिया है अर्थात कमाई के बढ़ाने के तरीक़े। उनको कैसे सुधारा जाए, इस पर आधारित था मेरा वह धारावाहिक। एक बुआ है उसमें और एक भतीजी। भतीजी पढ़ी लिखी है, समझदार है। लेकिन…


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धोबी का कुत्ता घर का न घाट का – podcast episode 3

धोबी का कुत्ता घर का न घाट का – podcast episode 3

मुहावरे न हों हमारी ज़िन्दगी में तो कहने वालों को आसानी न हो। जरा सी बात बड़ी हो जाती है और बड़ी सी बात को जरा सी बात में कह दिया जाता है। मेरी छोटी सी कविता में एक शब्द का भी इस्तेमाल किया है मैंने जिसके दो अर्थ हैं और जब ऐसा होता है…


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सुनो धरतीवासियो! – podcast episode 2

सुनो धरतीवासियो! – podcast episode 2

‘दैनिक भास्कर’ नामक समाचार-पत्र में ‘खिली बत्तीसी’ नामक स्थाई-स्तम्भ के अंतर्गत सप्ताह में तीन दिन मेरी कविताएँ प्रकाशित हो रही हैं| वे कविताएँ आप सुन भी सकेंगे मेरे पोडकास्ट में, ऐसा चाहता हूँ. उस सिलसिले की पहली कविता है– ‘सुनो धरतीवासियो’| सूर्यदेव धरतीवासियों कों संबोधित कर रहे हैं|


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अधन्ना सेठ – podcast episode 1

अधन्ना सेठ – podcast episode 1

लीजिए अशोक चक्रधर ने सोचा है की अपने मित्रों और चाहकों के लिए नियमित रूप से कुछ श्रव्य सामग्री परोसी जाए। सिलसिला आज से शुरू किया जा रहा है। यहाँ रहेगी कुछ बतकही, कुछ कविताई, कुछ जीवन-जगत की समीक्षाई! विधा कोई भी हो आपको मिलेगी सुनने की सुविधा!


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