Podcast
वेदना में नहीं संवेदना में कमी – podcast episode 12
एक बात रह-रह कर ज़ेहन में उठती है कि हमारे देश में वेदना में कमी आई है या संवेदना में। संवेदना तो कभी मरती नहीं है, ऐसा हम समझते हैं। कई बार ऐसा होता है कि संवेदना के स्रोतों के ऊपर यथार्थ के पत्थर रख दिए जाते हैं। ढंक दिया जाता है संवेदना को। संवेदना…
सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण और पाणिग्रहण – podcast episode 11
दोस्तो, प्रणाम स्वीकार करो और एक बात की ओर ध्यान धरो! ग्रहण अच्छा भी होता है और ग्रहण बुरा भी हो सकता है। जो बुरा होता है उसके अन्दर अच्छाई हो सकती है, जो अच्छा लगता है उसके अन्दर बुराई हो सकती है, लेकिन मैं उलझाने वाली बात करने की बजाय सीधी-सरल बात रखना पसन्द…
नदी है, लदी है, बदी है जाने क्या? – podcast episode 10
कवि जब कविता बनाता है तो अपनी निगाह तीन सौ साठ डिग्री घुमाता है। अपनी धुरी पर खड़े-खड़े घूमता है, देखता है। जो देखता है उसको अन्दर ले जाता है और अन्दर जो कुछ होता है उसमें घुला-मिला कर उसको फिर से बाहर लाने की कोशिश करता है। कई बार स्वयं भ्रम में पड़ जाता…

Posted on Sep 29, 2012 in 




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