अशोक चक्रधर > Blog > खिली बत्तीसी (Page 25)

खिली बत्तीसी

दैनिक भास्कर के सम्पादकीय पृष्ठ पर सोमवार से बुधवार

डूबते को सहारे के तिनके

डूबते को सहारे के तिनके

बत्तीस पंक्तियों में कभी तुम्हारे दिमाग की बत्ती-सी जलाऊंगा, कभी तुम्हारी बत्तीसी खिलाऊंगा।   मैंने कल कहा था न कल भी आऊंगा!   लो मैं आ गया हूं सुनो! मेरे शब्दों से मनचाहे अर्थों को चुनो!   पर याद रखना तुम चाहो तब भी मेरे शब्दों का अनर्थ कर नहीं सकते क्योंकि व्यर्थ नहीं हैं…


Read More

डूबते को सहारे के तिनके

डूबते को सहारे के तिनके

                डूबते को सहारे के तिनके (श्ब्द चाहे जिनके हो लेकिन ये किसी डूबते के लिए तिनके के सहारे की तरह भी हो सकते है)   बत्तीस पंक्तियों में कभी तुम्हारे दिमाग की बत्ती-सी जलाऊंगा, कभी तुम्हारी बत्तीसी खिलाऊंगा, मैंने कल कहा था न कल भी आऊंगा! लो…


Read More

सुनो ओ मेरे धरतीवासियो……

सुनो ओ मेरे धरतीवासियो……

आकाश में सुबह-सुबह दैनिक निकलने वाले भास्कर ने कहा—   धरतीवासियो! वाग्विलासियो!! निकलो अंधेरे बंद कमरों से घुटन भरे दड़बों से अपने-अपने चैम्बरों से|   मैं कहता हूँ वसुधैव कुटुम्बकम सोसाइटी के सारे मेंबरों से—   आओ मैं तुम्हें धूप की गुनगुनी कविताएं सुनाऊंगा, अच्छी लगीं तो कल भी आऊंगा।   धरती तुम्हारी मां पूरे…


Read More

सुनो ओ मेरे धरतीवासियो

सुनो ओ मेरे धरतीवासियो

                  सुनो ओ मेरे धरतीवासियो (अगर धरती हमारी मां है तो क्या सूर्य धरती का पिता होने के नाते हमारा नाना नही हुआ?)   आकाश में सुबह-सुबह दैनिक निकलने वाले भास्कर ने कहा— धरतीवासियो! वाग्विलासियो!! निकलो अंधेरे बंद कमरों से घुटन भरे दड़बों से अपने-अपने चैम्बरों से,…


Read More