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खिली बत्तीसी

दैनिक भास्कर के सम्पादकीय पृष्ठ पर सोमवार से बुधवार

रात और दिन की आंख-मिचोली

रात और दिन की आंख-मिचोली

रात और दिन की आंख-मिचोली (सारे खेल जीते-जी ही देखे जा सकते हैं)   मुस्कानों की मीठी यादें, बहते आंसू की फ़रियादें। प्यार मुहब्बत, हंसना रोना, सज़ा मज़ा, पा जाना खोना। महल दुमहले, बंगले कोठी, चना-चबैना, सूखी रोटी। क्या रोटी पर देसी घी है? जो कुछ भी है जीते जी है!!   झूले चर्खी, मेला…


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घूमते-घूमते लुढ़क गया पेपरवेट

घूमते-घूमते लुढ़क गया पेपरवेट

घूमते-घूमते लुढ़क गया पेपरवेट (प्रेमविहीन कामनाएं मुंह के बल गिरती हैं)     स्टैनो की नौकरी के लिए अनेक कन्याएं बैठी थीं ऑफ़िस की गैलरी में।   अंदर आई एक कन्या से बॉस ने पूछा— पर मंथ कितना रुपया लोगी सैलरी में?   एड़ियों पर उचक कर कन्या बोली हिचक कर— सर बीस हज़ार रुपया लेगी हम।   बॉस बोला— नो प्रॉब्लम! बीस हज़ार रुपया हम देगा, हां, बीस हज़ार रुपया तुमकू मज़े के साथ मिलेगा।   बॉस ने पेपरवेट…


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चूहे ने क्या कहा

चूहे ने क्या कहा

चूहे ने क्या कहा (छोटों की ताक़त का अंदाज़ा कुछ अनुभवी लोग ही लोग कर पाते हैं)   बुवाई के बाद खेत में भुरभुरी सी रेत में, बीज के ख़ाली कट्टों को समेटे, बैठे हुए थे किसान बाप-बेटे।   चेहरों पर थी संतोष की शानदार रेखा, तभी बेटे ने देखा— एक मोटा सा चूहा बिल बना रहा था, सूराख़ घुसने के क़ाबिल बना रहा था।   पंजों…


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क्या यहीं इस्तेमाल करेंगे

क्या यहीं इस्तेमाल करेंगे

क्या यहीं इस्तेमाल करेंगे (कुछ लोगों का उपचार सिर्फ़ कुतर्क होता है)   तलब होती है बावली, क्योंकि रहती है उतावली।   श्रीमानजी ने सिगरेट ख़रीदी एक जनरल स्टोर से, और फ़ौरन लगा ली मुंह के छोर से।   ख़ुशी में गुनगुनाने लगे, और वहीं सुलगाने लगे।   दुकानदार ने टोका, सिगरेट जलाने से रोका— श्रीमानजी! मेहरबानी कीजिए, पीनी है तो बाहर पीजिए।   श्रीमानजी…


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लाइसैंस और साइलैंस

लाइसैंस और साइलैंस

लाइसैंस और साइलैंस (नेताजी विकास चाहते हैं पर उनके आत्मीय कार्यकर्ता चाहते हैं कुछ और)   उन्होंने कहा चुनाव जीतने के बाद— धन्यवाद! धन्यवाद! धन्यवाद! अब देखना इलाके में मेरे प्रयास, हर तरफ़ होगा विकास ही विकास। राजा जानी! क्या चाहिए, पानी? आवाज़ आई— नहीं, नहीं, नहीं।   —रातें भी कर दूंगा उजली। बोलो क्या चाहिए, बिजली? आवाज़ आई— नहीं, नहीं, नहीं।   —बोलो बोलो बेधड़क…. सड़क?’ आवाज़ आई— नहीं, नहीं, नहीं।…


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पियक्कड़ जी और डॉक्टर

पियक्कड़ जी और डॉक्टर

पियक्कड़ जी और डॉक्टर (समझाने के लिए कभी-कभी समानांतर कुतर्क सहारा देता है)   पियक्कड़ जी मरने पर थे उतारू, इसलिए डॉक्टर ने बन्द कर दी दारू। और जब तलब के कारण मरने लगे, तो डॉक्टर से तर्क करने लगे।   —अगर मैं अंगूर का रस निकालूं उसे अपने प्याले में डालूं और पीने का लूं डिसीजन, तो डॉक्टर साब ऐनी ऑब्जैक्शन?…


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हाथी पकड़ने का तरीक़ा

हाथी पकड़ने का तरीक़ा

हाथी पकड़ने का तरीक़ा (अध्यापकों को प्रणाम जो अद्भुत गुर सिखाकर शिष्यों को कल्पनाशील बनाते हैं)     तोदी जी ने पकड़े जंगल में सौ हाथी, लगे पूछने उनसे, उनके संगी-साथी— हमें बताएं, इतने हाथी कैसे पकड़े, खाई खोदी या फिर ज़ंजीरों में जकड़े? हाथ फिरा मूंछों पर बोले तोदी भाई—                                 ना जकड़े, ना घेरे, ना ही खोदी खाई। लोग समझते, बहुत कठिन है हाथी लाना, उन्हें…


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लड़ाई का पहला क़दम

लड़ाई का पहला क़दम

लड़ाई का पहला क़दम (हम यदि सभ्य और प्रबुद्ध हैं तो युद्ध क्यों करते हैं)     अब जब विश्वभर में सबके सब, सभ्य हैं, प्रबुद्ध हैं तो क्यों करते युद्ध हैं?   कैसी विडंबना कि आधुनिक कहाते हैं, फिर भी देश लड़ते हैं लहू बहाते हैं।   एक सैनिक दूसरे को बिना बात मारता है, इससे तो अच्छी…


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अपराधी-सिपाही आत्मीय संवाद

अपराधी-सिपाही आत्मीय संवाद

अपराधी-सिपाही आत्मीय संवाद (सिपाहियों में बड़ी दूरदृष्टि होती है वे अपराधियों के झांसे में नहीं आते)     जानकर सिपाही को भोला, अपराधी बोला— हवलदार जी! मूंछें आपकी लच्छेदार जी! अब तो आपने पकड़ ही लिया है, क़ानूनी शिकंजे में जकड़ ही लिया है। ये ज़िंदगी अब आपकी ज़िंदगी है, लेकिन इस व़क्त ज़रा बीड़ी की तलब लगी है। हे डंडानाथ! दो मिनिट में बीड़ी ले आऊं फिर चलता…


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बात बात में बात बढ़ गई

बात बात में बात बढ़ गई

बात बात में बात बढ़ गई (ग़ुस्सा तत्काल शांत नहीं होता परिणाम भुगतने के बाद शांत होता है)     बात बात में बात बढ़ गई बिना बात की बात, इसने कुछ ऐसा कह डाला उसने मारी लात।   लात पड़ी तो इसने उठकर दिया पेट में घूंसा, उसने इसके मुंह में गैंदा फूल तोड़ कर ठूंसा।   होंठ हो गए पीले-पीले चेहरा हो गया लाल,…


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