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मंच के संस्मरण

एक होता है शब्द, एक होती है परंपरा

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वाचिक, एक होता है और एक होती है। जो होता है, वह है शब्द और जो होती है वो है एक परंपरा। यानी, होता है-वाचिक शब्द और होती है-वाचिक परंपरा। मैं ‘होता है’ और ‘होती है’ के बीच में गोता लगाना चाहता हूं। किसी तोते की तरह मचान पर बैठकर, जहां से मुझे वाचिक शब्द दिखाई दे और सुनाई दे वाचिक परंपरा। वाचिक परंपरा को जब मैं देखता हूं, तो कुछ अलग तरह से। कुछ अलग तरह से इसलिए कि मेरी शुरूआत ही वाचिक परंपरा से हुई। मेरा बचपन वाचिक परंपरा की नदी के किनारे किलोल करता रहा। पि र करीब एक दशक तक यानी 1968 से 1978 तक वाचिक परंपरा को दूर से देखा और उस दौरान मैं उत्तरार्ध, क्यों, ओर, वाम, पहल समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाला कवि बन गया। पि र लौटा वाचिक परंपरा की ओर।

वाचिक परंपरा का महत्व
वाचिक परंपरा को समझना इस देश की उस श्रुति परंपरा को जानना है, जिसके सहारे तमाम वेद, मानस समेत तमाम कथाएं और मिथक-मथी सामाजिक व्यथाएं कंठ दर कंठ, कर्ण दर कर्ण यात्राएं करती हुई हम तक आती हैं। वाचिक परंपरा इस देश के मूल मिजाज़ में है। जब भी हमारे घरों में सुखद कुछ होता था तो मानस पाठ या सत्यनारायण की कथा रखी जाती थी। सामूहिक रूप से लोग बैठते थे, सुनते थे। इस तरह सामूहिकता का एक अनुभव वाचिक परंपरा से जुड़ता है। यह अनुभव ही वाचिक परंपरा की ताकत है। परंपरा जितनी पुरानी है उतनी नई भी।
आज आई आई टी, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़, जामिया हमदर्द या दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज के विशुद्ध अंगरेज़ीदां छात्र-छात्राओं के बीच कविसम्मेलनों के प्रति ज़ोरदार आकर्षण देखता हूं, तो phफिर-फिर इस वाचिक परंपरा की ताकत को रेखांकित करता हूं। वाचिक परंपरा से चार दशक से अधिक समय तक जुड़े रहने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि हमारे समय और समाज के तापमान को नापने के बैरोमीटर हैं हमारे कविसम्मेलन। कविसम्मेलन में क्या पसंद किया जा रहा है, इससे समाज के बदलते मूड का पता लगाया जा सकता है।

समय और समाज का बदलता मूड
आगे होने वाली बातचीत के ज़रिए मैं समय और समाज के बदलते हुए मूड को मंच की मचान से पकड़ने की कोशिश करूंगा। मैं अपने और कविसम्मेलनों के अतीत पर निगाह डालता हूं तो मैं अशोक नामक एक बालक को हाफ पैंट बनियान पहने हुए घर के एक कमरे के दरवाज़े के बाहर कान लगाकर कुछ सुनते हुए पाता हूं। अंदर उसके कवि पिता श्री राधेश्याम ‘प्रगल्भ’ कुछ कवियों से, विद्वानों से काव्य-चर्चा कर रहे हैं। यह बात रही होगी 1958-59 की, और बालक रहा होगा सात-आठ साल का।
अंदर आदरणीय नीरजजी हैं, मुकुटबिहारी सरोज हैं, वीरेन्द्र मिश्र हैं, आनंद मिश्र हैं, शिशुपाल सिंह शिशु हैं, शिशुपाल सिंह निर्धन हैं। सब अपनी-अपनी तरह से जुटे हुए हैं। बीड़ी सिगरेट और दिलों से उठने वाला धुंआ है। शाम को कविसम्मेलन होना है। लेकिन हमारे घर में होनी है उनकी ख़्ाातिरदारी। कवि लोग तब सीधे मंच पर नहीं पहुंचते थे। जिस शहर में कविसम्मेलन हो रहा है, वहां के आत्मीयों-अंतरंगों के घर पहले पहंुचते थे। आत्मीयता का एक सिलसिला होता था। सबमें अपना-अपना नया रचा हुआ सुनाने की होड़ रहती थी।

सबका अपना-अपना अंदाज़
वो बालक हाफ-पैंट पहने हुए, जो निश्चय ही ख़्ााकी नहीं होती थी, कवियों की सेवा-टहल करने के मौके तलाशता रहता था। कमरे के दरवाजे़ से कान लगाकर सुनता रहता था। अंदर बातचीत में सुनाई देते थे कुछ गीत, जिनमें गांव के सौंदर्य का गुणगान होता था, इस बात का गर्व होता था कि हम गांव के हैं। एक गीत शिशुपाल सिंह निर्धन जी गाते थे-‘हम हैं रहबइया भइया गांव के, फूंस की मढ़इया और बरगद की छांव के।’ मेरे पिता श्री निर्धन को छोटे भाई की तरह मानते थे। सोहनलाल द्विवेदी अपनी कविता सुना रहे हैं, जिसमें गांधी जी के दो चरणों के पीछे पूरा भारत चला जा रहा है।
शाम की तैयारी है। शाम को कविसम्मेलन में सबको अपना-अपना खांेमचा लगाना है, स्वर का, शब्द का। सोम जी नया गीत लिखकर लाए हैं-
‘सागर चरण पखारै, गंगा शीश चढ़ावै नीर, मेरे भारत की माटी है चंदन और अबीर।’
कोई अपना मफ़लर भूल आया है, तो किसी दूसरे से मांग रहा है। कोई किसी के कुरते पर मुग्ध है, तो उसने अपना कुरता ही दे दिया है। लोग कुरता बदल रहे हैं, टोपी बदल रहे हैं, मफ़लर बदल रहे हैं, लेकिन कविता नहीं बदल रहे। गीत नहीं बदल रहे। सबका अपना अंदाज़ है। जिसके पास जो फन है, जिसके पास जोे पन है, उसके प्रति आ