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मंच के संस्मरण

सन् बयासी की उड़ान बया-सी

वर्ष बयासी जा रहा था। तिरासी आने वाला था। इस आवागमन उत्सव को तिनसुकिया के श्रोता एक कविसम्मेलन के रूप में सम्पन्न करना चाहते थे। शैल चतुर्वेदी जी का सुंदर हस्तलेख में पत्र मिला- आ जाओ, आसाम में नया साल मनाएंगे। पैसा भी पर्याप्त दिलाएंगे। मन हुआ कि यहां से बया-सी उड़ान भरें और तिरासी का पहला कार्यक्रम लिफ़ाफ़े की इजाफ़ीय भव्यता से करें। पहुंचे स्टेशन और लग गए आरक्षण की लाइन में। फार्म भर दिया- तिनसुकिया-मेल, यात्रा की तिथि- उनत्तीस दिसंबर, आयु- 31वर्ष, लिंग- पु.। यही सब डॉ. उर्मिलेश के लिए भी भर दिया। इकत्तीस की शाम तक पहुंचना था। उन्तीस और तीस की दो रातें लगेंगी और एक पूरा दिन। आश्वस्त थे कि सुखपूर्वक पहुंच जाएंगे तिनसुकिया। डॉ. उर्मिलेश मुझे टूण्डला में मिलने वाले थे। भले ही यात्रा लंबी थी, पर सोचा कि याड़ी साथ रहेगा तो सफ़र अच्छा कटेगा।

मेहरबानी दूरदर्शन की
दो दिन के लिए सब्जी-पूड़ी, पचरंगा अचार। रेलवे का टाइम-टेबिल, नई पुस्तक की पांडुलिपि, लेखन-सामग्री, पत्र-पत्रिकाएं और मिल्टन की पानी की बोतल एक थैले में। नई वी आई पी की अटैची में कपड़े। फोम के गद्दे वाला होल्डोल, जिसके एक साइड में रुई का तकिया और दूसरी साइड में अम्बाला का कंबल। तिनसुकिया-मेल की थ्री टायर बोगी में कुली जी ने सामान मुहब्बत के साथ लगा दिया। मेहरबानी दूरदर्शन की कि सहयात्री पहचान गए। गाड़ी चल दी। छ: के केबिन में हम पांच लोग बैठे थे। एक सहयात्री बोला- ‘एक कोई सवारी आई नहीं। मामाजी को यहीं सैट कर लेंगे।’ मैंने कहा- ‘मामाजी को ज़रूर सैट कर लेंगे, लेकिन सवारी टूण्डला पर आ जाएगी।’ दूसरा सहयात्री बोला- ‘टूण्डला तक तो मामाजी को बिठा लो। दूसरी बोगी की लैट्रीन में खड़े हैं।’ दोनों सहयात्री मामाजी को लेने चले गए। मैंने मौके का फ़ायदा उठाया और अपनी बर्थ पर फोम वाला होल्डोल खोल दिया। ऊपर एक झकाझक नई चादर बिछाई और करीने से चारों ओर से दबा दी। तकिए के नीचे राइटिंग पैड रखा और बर्थ पर पत्र-पत्रिकाएं बिखरा दीं। खाने वाला थैला खुंटी पर टांगा। अटैची के हैंडिल में जंजीर डालकर ताला लगा दिया।

कविता प्रेमी मामाजी
मामाजी भयंकर कविता-प्रेमी जीव निकले। स्थान बनाने के चक्कर में उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई। काकाजी के चार-पांच कवित्त ऊंची आवाज़ में सुनाए तो अगल-बगल की बर्थों के भी कान खड़े हो गए। अपनी बर्थ मंच बन चुकी थी और टूण्डला तक कविता के कई राउंड हो लिए थे। टूण्डला आने को हुआ तो मैं दरवाज़े पर आ गया। उर्मिलेश ने देखते ही हाथ हिलाया- ‘यहां हूं भाई साहब!’ उनके पास भी लगभग उतना ही और लगभग वैसा ही सामान था जितना और जैसा मेरे पास। मैंने और उर्मिलेश ने एक साथ एम. ए. किया था, सन् बहत्तर में। मैं चूंकि उनसे कुछ महीने बड़ा हूं इसलिए मुझे मलाल है कि वो मुझे भाईसाहब कहते हैं। अंदर आए तो मेरा बिछा बिस्तर देखकर उर्मिलेश में प्रेरणा और ईर्ष्या का मिश्रण हुआ होगा। अपनी झकाझक बैडशीट दिखाने की उतावली रही होगी। उन्होंने मामाजी से कहा-‘भाई साहब ज़रा उठिए। हम भी होल्डोल खोल लें।’ सब ने मदद की। टूण्डला के बाद कविताओं का दौर नहीं चला, चूंकि भोजनकांड होना था। बीच में एक के उ पर एक अटैचियां रखी गइंर्, उन पर अख़्ाबार। अख़्ाबारों पर दिव्य भोजन। मामाजी के पास आटे के लड्डू थे। वे बेचारे अख़्ाबार समेटकर बाहर फेंकने गए तो उर्मिलेश ने सोचा कि अपनी बर्थ पर गए, लेकिन वे तो आ गए। बर्थ छ:, सवारी सात, कोई बात नहीं! मामाजी ने बीच के स्थान पर चादर बिछा ली। सुख की नींद आई।
तीस तारीख़्ा की सुबह दुखभरा संदेशा लाई। मामाजी ने बताया कि ये रेलगाड़ी आपको पहली तारीख की सुबह तक ही तिनसुखिया पहुंचा पाएगी। हम दोनों ने उनसे बहस की- ‘माना कि भारत एक विशाल देश है, पर ये कैसे हो सकता है कि केन्द्र से किसी छोर तक पहुंचने में तीन रातें लगें!’ लेकिन मामाजी सही थे। यानी हम जिस कार्यक्रम के लिए जा रहे थे वहां समय से पहुंच ही नहीं सकते थे। पता नहीं गाड़ी तब तक कहां पहुंच चुकी थी। उर्मिलेश बोले- ‘अगला कोई बड़ा स्टेशन आता है तो उतर लेते हैं भाई साहब! साल की शुरूआत ख़्ाराब हो रही है।’ मैंने कहा- ‘डॉक्टर! अब निकल ही पड़े हैं तो लौटने की क्या जल्दी? हमारे पास पहुंचने के लिए अभी छत्तीस घंटे से ज़्यादा हैं।’ अचानक मामाजी ने राह दिखाई। बोले- ‘ऐसा करिए, जलपाईगुड़ी उतर जाइए। वहां से जाइए सिलीगुड़ी बागडोगरा हवाई अड्डा। और हवाई जहाज से गोहाटी होते हुए डिब्रूगढ़। डिब्रूगढ़ से तिनसुकिया होगा पचास-साठ किलोमीटर। आप लोग शाम से पहले तिनसुकिया।’

सवाल दो हवाई टिकटों का
रेलवे का टाइम-टेबिल तो हर कवि के पास रहता था, पर मेरे पास इंडियन एयर लाइन्स का शैड्यूल भी रहता था। मैंने उर्मिलेश का ज्ञानवर्धन किया- ‘ये शैड्यूल हर महीने बदलता है। मेरे पास पिछले महीने का है। चलो अच्छा है नया बागडोगरा में मिल जाएगा।’ मैं उन दिनों उर्मिलेश की तुलना में ज़्यादा हवाई यात्राएं करता था। उर्मिलेश की कविताओं का रौब मेरे शैड्यूल के सामने ठंडा पड़ गया। वे बोले- ‘हवाई-यात्रा लायक पैसे हैं?’ अब अपना रौब भी शीतलता को प्राप्त हो गया। मैंने कहा- ‘डॉक्टर! पिछले साल मैं सिलीगुड़ी गया था, वहां मारवाड़ी समाज के अनेक मित्र हैं। सुबह कटोरा लेकर निकलेंगे तो हवाई किराए लायक बटोरा कर ही लेंगे। उन्होंने पूछा- ‘किसी का नाम-पता याद है?’

एक चेहरा बार-बार
मेरी स्मृति में एक चेहरा बार बार साकार हो रहा था पर नाम याद नहीं आ रहा था। मैं उर्मिलेश से बोला- ‘एक हैं अल्हड़ जी के परममित्र। मेरे भी चाहक हैं। अक्सर आयोजन कराते हैं। सिलीगुड़ी पहुंचेंगे तो उनका नाम भी पता चल जाएगा। उर्मिलेश उधेड़बुन में थे। उन्हें भरोसा-सा नहीं हो रहा था कि हम पहुंच सकते हैं। निष्कर्षत:, मेरे हठ के आगे आत्मसमर्पण करते हुए बोले- ‘चलिए चलते हैं सिलीगुड़ी तक। और कुछ नहीं तो वहां कामाख्या देवी के दर्शन करके ही लौट आएंगे।’ मैं उछल पड़ा- ‘कमाल है डॉक्टर! देवी नहीं देवता!! उनका नाम है कामाख्या गोयल!!!’
कामाख्या देवी के दर्शन को कौन जाता। सुबह-सुबह पहुंच गए कामाख्या जी के घर। वे हमें देखते ही खिल उठे। जब पैसे की बात आई तो बोले- ‘इन दिनों हाथ तंग है, पर इन धनकुबेरों की दोस्ती कब काम में आएगी, बंदोबस्त हो जाएगा।’ वे डॉ. उर्मिलेश से पहली बार मिले थे, लेकिन कादम्बिनी में उनकी एक ग़ज़ल न केवल पढ़ चुके थे बल्कि अपनी सांस्कृतिक मंडली से उसका गायन भी करा चुके थे।
अब एक बार फिर डॉ. उर्मिलेश के कॉलर ऊंचा करने की बारी थी। कामाख्या जी ने ग़ज़ल का एक शेर भी सुना दिया- ‘बिखरी उदास शाम को रंगों में बांध लें, आओ कि जि़ंदगी को उमंगों में बांध लें।’ प्रशंसा होने लगे तो कवि सब कुछ भूल जाता है। कामाख्या जी बोले- ‘अभी उस लड़के को बुलाता हूं जिसने ग़ज़ल गाई थी।’ मैंने कहा-‘पैसे का जुगाड़ कराओ गुरू, फ्लाइट पकड़नी है। फ्लाइट नहीं मिली तो उमंगों में रंग नहीं भर पाएंगे।’

फिर एक नई मुसीबत
हवाई किराए के अतिरिक्त हजार पांच सौ रुपए और मिल गए, लेकिन बागडोगरा हवाई अड्डे पर पता चला कि उस दिन फ्लाइट केवल गोहाटी तक है। डिब्रूगढ़ तक नहीं जाएगी।
गोहाटी पहुंच जाएगी बारह बजे तक। वहां से तिनसुकिया है बाई रोड़ सात सौ किलोमीटर। एक बार पि र उर्मिलेश ने कहा- ‘देवी के दर्शन करके लौट चलते हैं भाई साहब!’ पर मैं कहां मानने वाला था।
बारह बजे हम गोहाटी में टैक्सी वालों से मोलतोल कर रहे थे। इतनी लंबी यात्रा के लिए टैक्सी वाले झिझक रहे थे। शायद हमारे ही हित में। आतंकवाद अपने यौवन पर था और हमारे उत्तर भारतीय चेहरे हमारी जान के लिए संकट बन सकते थे। एक श्यामवर्णी ठिगना लेकिन हृष्टपुष्ट असमी ड्राइवर हमें ले जाने को तैयार हुआ। वह केवल उतनी हिंदी समझता था जितनी अपनी सुविधा के लिए समझना चाहता था। हम कहें तेज़ चलाओ तो धीमा कर देता था। बीच के ऊबड़खाबड़ रास्तों पर तेज़ चलाता था। जब कहें कि जल्दी पहुंचना है तो किसी भी चाय के ढाबे पर रोक देता था। थोड़ी देर तो हम तनाव में रहे पि र चिंता छोड़ दी। हम दोनों रास्ते के दोनों ओर की प्राकृतिक छटा का आनंद लेने लगे।

कच्ची सुपारियां खाइंर्
दूर-दूर तक हरियाली और बांसों से बने हुए सुरम्य मकान। आयत और वर्गों में बंटी हुई सफेद दीवारें। किसी अगले पड़ाव पर जब ड्राइवर चाय पीने के लिए रुका तो हमने सुपारी के वृक्ष के नीचे से कच्ची सुपारियां बीनीं और खाइंर् भी। सुपारी ने सर्पदंश जैसा असर दिखाया। हम दोनों से सर घूमने लगे। ख़्ाूब तेज़ पसीना आया। पता नहीं कितना पानी पी गए, तब राहत मिली।
डिब्रूगढ़ पहुंचते-पहुंचते रात घिर आई। बयासी जा रहा था तिरासी आने वाला हो गया। पर तिनसुकिया दूर था। कहीं बीच मार्ग में इस बार हमने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा। उतरकर नए साल की शुभकामनाएं दीं, गले मिले। मैंने कहा- ‘डॉक्टर! माना कि अभी हम तिनसुकिया से दो घंटे दूर हैं पर आशा की एक किरण अभी भी है। डिक्की से अटैचियां निकालो, तीसरा दिन है, कपड़े तो बदल लेते हैं।’

नीले आकाश के नीचे
तो साहब, वहां बीच सड़क पर, नीले आकाश के नीचे, सांय-सांय सन्नाटे में, बांसों के झुरमुट और टी वी टी टुट टुट के बीच, चाय बागान की सौंधी महक लेते हुए, हमने मंच वाले दिव्य कपड़े निकाले। मिल्टन की बोतल के पानी से मुंह धोया। लैक्टोकैलेमाइन की थोड़ी-थोड़ी क्रीम चेहरे पर लगाई। तीन दिन के उलझे बालों से कंघे का संघर्ष कराया। उर्मिलेश ने कपड़ों पर सैंट छिड़का जो आसाम की उस शस्य श्यामला सड़क पर दूर-दूर तक फैल गया। ड्राइवर हमें बड़े कौतुक से निहार रहा था। मैंने उससे ब्रजभाषा में कहा- ‘दायरी के! अब तौ खैंच लै।’ वो हिन्दी तो नहीं समझा पर ब्रजभाषा समझ गया। उर्मिलेश की सैंट की महक की गति से भी तेज़ उसने गाड़ी दौड़ाई। ध्वनि की गति से भी तेज़। शायद प्रकाश की गति से भी तेज़। दो बजे से पहले हम तिनसुकिया लग चुके थे। सीधे पहुंचे सभागार। अंतिम कवि के रूप में श्री बालकवि बैरागी काव्यपाठ कर रहे थेे।
और मेरे पि्रय पाठको, कृपया देखो उस ठाठ को। जो उस समय था हमारा। वैसा भव्य स्वागत अब तक न तो हमारा हुआ था और उम्मीद है कि आगे भी नहीं होगा। हमें पुष्पहारों से लाद दिया गया। हमारे सम्मान में अनवरत, समयनिरपेक्ष और अनहदनाद के समान तालियां बजीं। इसलिए नहीं कि हम अच्छे कवि थे, इसलिए भी नहीं हम कविता सुनाकर पैसा कमाने आए थे, इसलिए भी नहीं कि हमारे बिना कविसम्मेलन पूर्ण न होता, बल्कि इसलिए कि हम पूरा आसाम आतंकवाद की पगडंडियों को पार करके आए थे। स्वागत सम्पन्न होने के बाद बैरागी जी ने हमें समय दिया कि हम लोग एक-एक कप चाय पी लें। तब तक वे एक कविता और सुना देंगे।

दूर हो गई सारी थकान
अचानक शरदजी उठकर नेपथ्य में आ गए। उन्होंने सुनाया एक लतीफ़ा, जो क्षमा करिएगा मैं आपको अभी नहीं बता सकता। उसका विषय था-‘एक चूहे ने हथिनी को जाल से मुक्त किया।’ हमारी मुक्त हंसी से सफ़र की सारी थकान दूर हो गई। कविता हम कोई भी सुनाते वो तो जमनी ही थी।
पिछले दिनों उर्मिलेश मिले। उन्होंने उस रोमांचक यात्रा का स्मरण दिलाया तोे मैंने उन्हें अपना एक मुक्तक सुनाया-
जो मेहनत करी, तेरा पेशा रहेगा,
न रेशम सही तेरा रेशा रहेगा।
अभी कर ले पूरे, सभी काम अपने,
तू क्या सोचता है, हमेशा रहेगा!
मुझे क्या पता था कि उर्मिलेश नहीं रहेंगे। हल्का सा भी आभास होता तो ये मुक्तक नहीं सुनाता। हरगिज़ नहीं सुनाता।