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मंच के संस्मरण

मोह में भंग और भंग में मोह

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साठ के दशक की शुरूआत तक तो मामला बहुत सीधा-सरल था, न वाणी अनर्गल थी न उसमें गरल था। कारण यह कि आज़ादी मिलने से पहले का विद्रोह भंग हो चुका था लेकिन आज़ादी के बाद का मोहभंग व्यापक स्तर पर नहीं हुआ था। नेहरू के शांति-कपोतों का कांड-ए-पर-कतर नहीं हुआ था। बासठ का चीन का युद्ध नेहरू के कबूतरों के लिए पहला झटका था। उस दौरान हम सबके सब प्राय: नेहरू जी के कबूतर थे। झटका खाया तो होश सा कुछ आया कि भारत का स्वातंत्र्य अभी तरा नहीं है, पंचवर्षीय योजनाओं की विफलता ने बताया कि सब कुछ हरा-भरा नहीं है।

कवि गा रहा था प्रेम के गीत
लेकिन विफलताओं की संध्या-सुंदरी कविसम्मेलन के मंचों पर धीरे-धीरे उतरी। अग्रेज़ीदां बुद्धिजीवियों को शायद विश्वसंदर्भों के कारण मोहभंग की काली रात डरा रही हो पर मंच पर कवि प्रेम के गीत गा रहा था। अपने देश में प्रेम के गीत। युद्ध हुआ तो प्रेम में देश आने लगा। नेहरू जी ने कांग्रेस को कुछ इस तरह से परोसा था कि कश्मीर कुमारी से कन्या माता तक और आसामा से गुजराता तक भारत के वासियों को ‘दो बैलों की जोड़ी’ पर पूरा भरोसा था। हिन्दी मंच के कवियों और श्रोताओं के लिए कांग्रेस की दो बैलों की जोड़ी प्रेमचंद के हीरा-मोती से कम नहीं थी।
छद्म सुख कब तक जिया जा सकता है और बिना नशे की शराब को कब तक पिया जा सकता है। मंच पर शृंगार के चपल-चांचल्य के स्थान पर जीवन और मृत्यु के संदर्भ मुखरित होने लगे। सुरीली आवाज़ में, ओजस्वी कंठ में। सपने अभी मरे नहीं थे, फूल अभी झरे नहीं थे। इस बात को स्वीकारने में संकोच नहीं होना चाहिए कि निजी सपनों और राष्ट्रीय सपनों के अंतर को समझने की व्यावहारिक शुरूआत वाचिक परंपरा में कायदे से नहीं हो पाई थी।
उस समय जो वैयक्तिक चेतना थी उसमें आप निज के दुख-सुखों की बात कर रहे थे। यह भी था कि निज के सुख-दुख आप देश के सुख-दुख से अलग महसूस करते थे। अचानक राष्ट्र का सुख-दुख सामने आया तो आप अपना सुख-दुख भुलाने लगे। तब तक यह समझ में आना शुरू नहीं हुआ था, कि निज के सुख-दुख भी राष्ट्र के सुख-दुख से जुड़े होते हैं। इसके व्यापक संदर्भ हैं। प्रेम में देश समाया रहता है और देश में प्रेम, यह बात समझ में साफ तौर पर नहीं आ पा रही थी। गीतों और कविताओं में निराशा रूप बदल-बदलकर रोमानी पैंतरे दिखा रही थी। अब मंच पर नीरजजी के अनुसार- कारवां गुज़र चुका था, .गुबार बाकी था देखने के लिए। नौजवानों के स्वप्न झरे फूल से और मीत शूल से चुभने लगे।
ज़िंदगी के द्वार पर विसंगति
व्यक्तिगत पीड़ा का रोमानीकरण इस समय के कविसम्मेलनों का मुख्य स्वर है। निजी विसंगतियों को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया जा रहा था। भारतभूषण जी गा रहे थे- ‘ये विसंगति जिं़दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई, चाह में है और कोई, बांह में है और कोई।’ मृत्यु पर बहुत लिखा गया। जीवन पर बहुत लिखा गया। देवराज दिनेश ओजस्वी वाणी में सुनाते थे- ‘जीवन क्या है, लहरों सा लहराना, हंसना, खिलना शोर मचाना।’ नीरजजी की कविताओं में जीवन-मृत्यु का रूपक पलट-पलट कर आता था। मेरे पूज्य पिता राधेश्याम ‘प्रगल्भ’ ने कहा कि जीवन है परीक्षा कक्ष के तीन घंटे का समय। पहला घंटा बचपन बीत जाने पर बजता है, दूसरा जवानी ख़त्म होने पर तथा तीसरा बुढ़ापे के बाद, काल का चपरासी मौत का बजाता है। परीक्षा ख़त्म होती है, कॉपी छिन जाती है। इस रूपक को नीरजजी ने ‘मेरा नाम जोकर’ के अपने एक गीत में इस्तेमाल किया और वाचिक परंपरा में ही सही श्रेय भी मेरे पिता को दिया। ये नये रूपक थे, ये भक्तिकालीन नहीं थे। ये सूफी परंपरा से भी नहीं उपजे थे। ये रूपक आज़ादी के भ्रामक मोह से मुक्त होना चाहते थे।

मोह में भंग
आज़ादी का मोह कोई माथे की बिंदी तो था नहीं जो रात में सोते वक़्त खाट के पाये से चिपका दी जाए। वो मोह छुट्टल सांड के ठप्पे की तरह सरकार की नगरपालिका ने हमारे दिमाग़ों के नितंबों पर दाग रखा था। ऐसे कैसे जाता? क़ुंए में नहीं मोह में भंग पड़ी हुई थी और मोह था कि भंग हुआ नहीं चाहता था। निशा-निमंत्रणों के मोह में भंग की ख़ुमारी विद्यमान थी। चीन का युद्ध समझ में नहीं आ रहा था। पर इतना समझ में आ रहा था कि राष्ट्र पर संकट का एक पहाड़ है जिसे सबको मिल-जुलकर उठाना है। इक्का-दुक्का हास्य कवि होते थे। या तो बनारस के या हाथरस के। वे भी हास्य-रस में वीर-रस ला रहे थे। काका जी गा रहे थे-‘इतना दम है देखो मेरी सूखी हुई कलाई में, आज्ञा हो तो आग लगा दूं फौरन दियासलाई में।’
कवि प्रदीप भी राष्ट्रीय कविसम्मेलनों में जाते थे और ये बात तो सब जानते हैं कि ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ गीत सुनकर नेहरू जी रो दिए थे। लता जी द्वारा गाए जाने से पहले इस गीत को मंचों पर सुनकर कितने लोग रोए इसका कोई हिसाब हमारे पास नहीं और बकौल किशन सरोज ‘कांटों बिंधे गुलाब हमारे पास नहीं।’
बतियाना चाहता हूं बासठ के दौरान अपने बालकत्व के बवालत्व पर। अगली बार सही। अभी तो जीवन के मोह में अपनी कल्पनाओं की थोड़ी भंग डालता हूं और पेश करता हूं एक कविता-
जि़न्दगी एक किताब है,
आकार में दिल सी,
पवित्र इतनी कि गीता,
.कुरान, बाइबिल सी।

एक विद्युत की चमक,
एक दमकती मंजि़ल सी,
यों तो पहाड़,
पर महसूस करो तो तिल सी।

एक दूरी के बावजूद
सबमें शामिल सी,
मीठी दुश्मनी सी,
पे्रमी क़ातिल सी।

कभी बड़ी आसान,
कभी मुश्किल सी,
कभी निपट अकेली,
कभी खिलखिलाती महपि़ ल सी।

कभी दिल्ली की
झिलमिल कालौनी जैसी गंदी,
कभी किसी गंदी कालौनी की
झिलमिल सी।

कभी मधुमक्खी का छत्ता,
कभी चींटी के बिल सी,
कभी घटाओं जैसी कुटिल,
कभी गणित की तरह जटिल सी।

कहीं स्लेट जैसी साफ़,
कहीं टूटी पैंसिल सी,
कहीं सिग्नेचर्स के साथ अप्रूव्ड,
कहीं खुन्दक में कैंसिल सी।
कभी उंगली पकड़ाने वाली
कभी टक्कर में मुक़ाबिल सी।

और कहीं मुझ जैसी जाहिल
और आपके समान क़ाबिल सी।

पर मैं तो इतना चाहता हूं कि
जि़न्दगी हल्की-फुल्की हो
न कि पत्थर की सिल-सी,
वो अगर बूढ़ी झुर्रियों में भी मिले
तो किसी बच्चे की इस्माइल सी।