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मंच के संस्मरण

ढिंचिक-ढिंचिक वाली रामचरित-मानस

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गीत मंच पर चला तो ख़ूब चला। जमा तो रात-रातभर जमा। हृदय की ताल पर तालियां बटोरीं गीत ने। श्रोताओं को झुमा-झुमा दिया आंतरिक संगीत ने। गीली भावनाओं के पनीले गीतकार, रस की साधना से रसीले गीतकार और अनुभव की ज्ञानझंकृति से सुरीले गीतकार। इन कोमलकांत पनीले, रसीले और सुरीले गीतकारों के बीच इक्का-दुक्का कंटीले गीतकार भी हुए, जिन्होंने जीवन के चीत्कार के साथ सुर साधा। जिन्होंने बिखरे हुए आक्रोशों को बांधा। जिन्होंने मुफलिसों-वंचितों के हित में सहित भाव का खिचड़ा रांधा। ऐसे ही गीतकार थे- मुकुट बिहारी सरोज।

सरोज जी बांकी अदा के कवि
18 सितंबर स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज की पुण्यतिथि है। काका हाथरसी जी की तो यह पुण्यतिथि भी है और जन्मतिथि भी। सन् 2002 में इसी दिन उन्हें ‘काका हाथरसी पुरस्कार’ दिया जाना था। वे घनघोर बीमार चल रहे थे फिर भी समारोह में आने को लेकर उमंगित थे। पूरा सभागार उनकी प्रतीक्षा करता रहा और वे सीधे काका जी से पुरस्कार लेने ऊपर चले गए।
सरोज जी बांकी अदा के कवि थे, जिनकी क्षमता अभी भी आंकी जानी है। वाचिक परम्परा में ऐसे कवि बिरले हुए हैं जो अपनी आन-बान-शान में सरोज जी की तरह विशिष्ट हों। सरोज जी की ‘महानों’ से पटरी न%E