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चौं रे चम्पू

राष्ट्रीय सहारा में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित

शनि का हाईकोर्ट

औरत सनी देव के चौंतरा पै चढ़ि गईं, जीत भई उनकी? —मामला हार-जीत का है ही नहीं। स्त्री द्वारा पुरुष के सामने अपने अस्तित्व की रक्षा करने का है। भेदभाव क्यों हो? यह लड़ाई महिलाओं द्वारा पूजा किए जाने के पक्ष में उतनी शायद नहीं थी, जितनी स्वयं को दूजा मानने और दोहरे मानदण्ड अपनाने के विरुद्ध थी।


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एकता में भरापूरा शून्य

उस समय मैं शून्य में था। इन दिनों मैं प्रायः शून्य में ही रहता हूं। यह तो निर्विवाद है कि शून्य का आविष्कार भारत में हुआ, इसलिए एक देशप्रेमी होने के नाते मुझे शून्य से प्यार होना चाहिए। शून्य से प्यार करना मेरा धर्म है, एक से प्यार करना मेरा कर्तव्य है।


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गए गावतकिए नए चावचकिए

पिछले दस साल में कविसम्मेलन बहुत बदल गए हैं चचा। मंच पर अच्छी कविता के मानक बदल रहे हैं। अनेक अच्छे कवि मंच पर आए, वक्त की आंधियों से प्रभावित नहीं हुए, भले ही उन्हें कम निमंत्रण मिलें।


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गए गावतकिए नए चावचकिए 

    —चौं रे चम्पू! बरसन ते हम कबीसम्मेलन में नायं गए। मोय चौं नायं बुलावै?   —पिछले दस साल में कविसम्मेलन बहुत बदल गए हैं चचा। पता नहीं आपको कैसे लगें!   —ख़राब है गए कै अच्छे भए?   —मंच पर अच्छी कविता के मानक बदल रहे हैं। अनेक अच्छे कवि मंच पर आए,…


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अंड-बंड और टिकिट फ़ंड

आपके प्रश्न में उत्तर है और उत्तर में उत्तराखंड। क्या अंड-बंड? घोड़ा शक्तिमान प्रचंड, पश्च वाम टांग खंड-खंड। आक्रामक षंड, हस्त तीव्र मारक दंड! राष्ट्रपति भवन-धायक विधायक अब पाते हैं, खाते ना अघाते मधुर श्री श्री श्रीखंड। सत्ता की अलबत्ता बिछी है बिसात, तेरी-मेरी क्या बिसात, रात में और सघन रात उद्दंड! क्या अंड-बंड? दंड का माप नहीं, माप का दंड नहीं, फिर क्या मापदंड?


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अंड-बंड और टिकिट फ़ंड  

      —चौं रे चम्पू! होरी पै लोग अंड-बंड चौं बोल्यौ करैं? –चचा, आपके प्रश्न में उत्तर है और उत्तर में उत्तराखंड। क्या अंड-बंड? घोड़ा शक्तिमान प्रचंड, पश्च वाम टांग खंड-खंड। आक्रामक षंड, हस्त तीव्र मारक दंड! राष्ट्रपति भवन-धायक विधायक अब पाते हैं, खाते ना अघाते मधुर श्री श्री श्रीखंड। सत्ता की अलबत्ता बिछी…


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मन तो करता है

गुलाल तो बस बालों में रह गया है. कल देखते तो सर्वांग गुलालित्य था। होली के लिए विभिन्न चैनल इन दिनों कार्यक्रम बना रही हैं। होली का पूर्वाभ्यास चल रहा है। एक चैनल ने ‘रंग-रसिया’ कार्यक्रम के लिए मुझे भी बुलाया। गीत-संगीत, नृत्य, रास, कविता के सामूहिक रस-वर्षण में चचा, आनंद आया।


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मन तो करता है  

  —चौं रे चम्पू! होरी में तो अभी टैम ऐ, तेरे बारन में रंग-गुलाल कौन्नै डाद्दियौ?   —गुलाल तो बस बालों में रह गया है. कल देखते तो सर्वांग गुलालित्य था। होली के लिए विभिन्न चैनल इन दिनों कार्यक्रम बना रही हैं। होली का पूर्वाभ्यास चल रहा है। एक चैनल ने ‘रंग-रसिया’ कार्यक्रम के लिए…


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पीठ पर पीर का पर्वत

बहुत कम उम्र में सार्थक काम कर जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ दुष्यंत कुमार का नाम लिया जा सकता है। भारतेन्दु अठारह सौ पचास में आए और पिचासी में चले गए। आप उन्नीस सौ तेतीस में आए और पिचहत्तर में चले गए। बयालीस की उम्र कोई उम्र नहीं है। जब देश में जब इमरजेंसी का अंधेरा-सा आया था, वे बहुत बेचैन थे। और उस छोटे से काल-खंड में उन्होंने जो लिखा, अद्भुत है।


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चाहिए सम्प्रदाय के शायर 

      —चौं रे चंपू! दुस्यंत कुमार की बात पूरी नायं करैगौ का? तू मिल्यौ ओ उन्ते? —नहीं चचा! काश, उनसे मिलना हुआ होता। वैसे, किसी भी रचनाकार से मिलना, उसके साहित्य से मिलना होता है। उस दिन दुष्यंत कुमार की पुत्रवधू दीपिका जी ने सही कहा कि जितने ज़रूरी वे अपने जीवनकाल में…


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