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चौं रे चम्पू

राष्ट्रीय सहारा में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित

पीठ पर पीर का पर्वत

बहुत कम उम्र में सार्थक काम कर जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ दुष्यंत कुमार का नाम लिया जा सकता है। भारतेन्दु अठारह सौ पचास में आए और पिचासी में चले गए। आप उन्नीस सौ तेतीस में आए और पिचहत्तर में चले गए। बयालीस की उम्र कोई उम्र नहीं है। जब देश में जब इमरजेंसी का अंधेरा-सा आया था, वे बहुत बेचैन थे। और उस छोटे से काल-खंड में उन्होंने जो लिखा, अद्भुत है।


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सम विषम दिल

सम विषम दिल

‘दिल है कि ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह, या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं।’ या तो भैया प्रदूषणमुक्त दिल्ली कर दे या ऐसा कर दे कि यहां से सब भाग खड़े हों। दिल्ली कई बार उजड़ी है, इस बार प्रदूषण के नाम पर सही।


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घुमंतू के लेकिन किंतु परंतु

—चौं रे चम्पू! आगरा ते कब आयौ? —आगरा के बाद तो लखनऊ भी हो आया चचा! —लखनऊ मैं का हतो? —इस्पात मंत्रालय द्वारा आयोजित राजभाषा संगोष्ठी थी। विषय था, ‘इस्पात प्रौद्यौगिकी में तकनीकी शब्दावली’। देशभर में इनके जितने उपक्रम हैं सबके राजभाषा अधिकारी वहां आए हुए थे। दिन में यूनिकोड के प्रयोग पर चर्चाएं हुईं,…


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हृदय की ज़मीन पर नाचती मीरा

हृदय की ज़मीन पर नाचती मीरा   —चौं रे चम्पू! आज बज़ट की उपलब्धीन ते अलग कोई कथा हतै तेरे पास? —कथा नहीं है, ’कथा’ नाम की पत्रिका है। इसके संस्थापक संपादक कथाकार मार्कंडेय थे, आजकल इसे अनुज निकाल रहे हैं। अनुज जामिआ मिल्लिआ इस्लामिआ मेंमेरे शोधछात्र रहे हैं। ‘दूरदर्शन की हिन्दी : अभिव्यक्ति एवं…


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कस्बाती से शहराती हुई कानाबाती

कस्बाती से शहराती हुई कानाबाती   —चौं रे चम्पू! पुस्तक मेला आइबे वारौ ऐ, लोकार्पनन की बहार रहैगी, तू जायगौ? —चचा, लोकार्पणों की बहार तो आ चुकी है। अब लोकार्पण नहीं, ’बुक लॉन्च’ कहा जाता है। पेंगुइन द्वारा प्रकाशित पंकज दुबे का पहला उपन्यास एक साथ दो भाषाओंमें लॉन्च हुआ। दिल्ली में हुए लॉन्चार्पण में…


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सूरज को सर्दी लगी

सूरज को सर्दी लगी —चौं रे चम्पू! बसंत पंचमी है गई, सर्दी जाइबे कौ नाम ई नायं लै रई? —ऐसी बात तो नहीं है चचा, दिन तो अब गर्म होने लगे हैं। अपनी ये मंकी टोपी उतारिए, देखिए अच्छा लगेगा। —जे मंकी टोपी नाय़ं, बड़े ढंकी ऐ रे। केजरीवाल के मफलर और टोपी दोऊन कौ…


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धरना यूं ही चाल्लैगा

धरना यूं ही चाल्लैगा —चौं रे चम्पू! धरना कौ मतलब का ऐ रे? —धरना शब्द की व्युत्पत्ति और उसकी मूल धातु की कोई प्रामाणिक जानकारी फिलहाल मेरे पास नहीं है, लेकिन अनुमान का धरना देकर कह सकता हूं किअलग-अलग धातुओं को धरा पर धरा जाए तो धरना होना चाहिए। धरना शब्द संज्ञा भी है और…


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प्रेम की टाइमलाइन

प्रेम की टाइमलाइन —चौं रे चम्पू! प्रेम कौ रंग लाल चौं मानौ जाय? —इसलिए, क्योंकि ख़ून का रंग भी लाल होता है। जब तक वह हृदय की धमनियों में दौड़ता रहता है, प्रेम भी बना रहता है। बाहर निकलते ही कत्थई हो जाता है। फिर गाढ़ा और गाढ़ा। काला हो जाता है। प्रेम तभी तक…


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वे फूंक-फूंक ये फांक-फांक

वे फूंक–फूंक ये फांक–फांक   —चौं रे चम्पू! राजनीती में जे कैसौ दौर आयौ ऐ रे? —चचा, ये दौर है स्वच्छता और सावधानी का। स्वच्छता घटी तो जनता नटी, सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी। बड़ी-बड़ी पार्टियां को ’आप’ की थाप भारी पड़ गई। जो हार गए, वे फूंक-फूंक कर कदम रखेंगे, जो जीत गए, वे…


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क्रिसमस ट्री पर झूलें गणेश

क्रिसमस ट्री पर झूलें गणेश   —चौं रे चम्पू! जे तेरे थैला में का ऐ रे? —आपके लिए कपड़े लाया हूं चचा। —अरे, जे लाल-लाल कपरा! हनुमान जी जैसी पोसाक हम थोरेई पहिरिंगे लल्ला! —अरे चचा, हनुमान जी आकाश मार्ग से जड़ी-बूटी लाए थे, उन्हीं की तरह आज आपको सांता-क्लॉज़ बनना होगा। ये दाढ़ी भी…


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