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चौं रे चम्पू

राष्ट्रीय सहारा में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित

सिडनी मोबाइल गाथा

मेरा आईफ़ोन एयरपोर्ट से घर जाते हुए कहीं गिर गया था। कहां-कहां नहीं ढूंढा! ‘लॉस्ट एंड फ़ाउंड’ में फ़ोन करवाया। एप्पल के हर उपकरण में ‘फ़ाइंड माई फ़ोन’ लगाया, पर नहीं पाया। व्यथित-मन रात में अपना फ़ेसबुक पेज खोला तो देखा कि मेरे मैसेंजर पर किन्हीं मार्क साहब का संदेश था…..


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गुप्त दानवीर

चचा, आप जिसे दान मानते हैं, वैसा तो नहीं, पर सुपात्रों के लिए समय-दान करता हूं। सैकड़ों भूमिकाओं, विमोचनों और ग़ैरधनोपार्जक कामों में जो श्रमदान किया है, सो अलग। पत्थर उठाकर सड़क नहीं बनाता, पर शब्द उठाकर ऐसी जगह रख देता हूं जो पत्थर पर खोदे जा सकें।


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बिना काम के दाम

सुंदर, साफ-सुथरा, प्रदूषणविहीन देश! हर आदमी के पास आधुनिक सुखपूर्ण जीवन की सारी सुविधाएं, फिर भी बिना काम मुफ़्त के दाम नहीं चाहते वहां के नागरिक।


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देहदान महादान

आपकी बहूरानी अब स्वस्थ है, उन्हें घर ले आया और अपनी देह भविष्य के लिए अस्पताल को दे आया। चिकित्सा विज्ञान में जितनी तेज़ी से प्रगति हो रही है, उतनी तेज़ी से अभी मनुष्य की चेतना विकसित नहीं हुई। विदेशी लोग यहां से मानव अंगों की तस्करी कराते हैं और हमारे रोगी तड़प-तड़प कर मर जाते हैं।


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सैल्फ़, सुल्फ़ा और सैल्फ़ी

क्या सुनना चाहते हैं? मालवी, ब्रजभाषा, हिंदी में आंखों देखा हाल अथवा अंग्रेज़ी की लाइव रनिंग कमेंट्री! आई कैन डू एनी थिंग फ़ॉर यू। आफ़्टर द फ़ाइटिंग, साधूज़ आर आस्किंग हाउ डू यू डू?


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पपड़ियां और चूना

व्यस्त थे, लेकिन महबूब स्टूडियो में शाम चार बजे बुला लिया। पहुंच गए जी सैट पर। टीवी मॉनीटर के पास हमें प्रेमपूर्वक बिठा दिया गया। अमित जी एक मध्यवर्गीय परिवार के कमरे में सूट पहन कर सोफे पर बैठे हुए शॉट के लिए तैयार थे। ऐक्शन के साथ ही कमरा हिला, दीवारों से चूना गिरा और वे धूल-धूसरित हो गए।


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ब्रज की बगीचियां

मुकेश जी के साथ बचपन की ख़ूब सारी यादें ताज़ा हुईं। वे मेरे बाल-सखा रहे हैं। उनसे बड़ी ईर्ष्या होती थी। वे कला-क्षेत्र में थे और मैं विज्ञान में। वे संगीत सीखते थे और मैं फिज़िक्स, कैमिस्ट्री और गणित में उलझा हुआ था। अपनी कक्षाओं से खिसक कर मैं उनकी कक्षा में बैठ जाता था।


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मटियामेट हो गई जवाबदेही

धन्य हैं हमारे जंगल अभियंता! सरकारी नीति-नियंता! कोई विधायक घोड़े की टांग तोड़ता है, कोई कुर्सी नहीं छोड़ता है, पर जंगल की ओर ध्यान कोई नहीं मोड़ता है। सिमट गए जंगल-सनेही, मटियामेट हो गई जवाबदेही।


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उत्तर मिल गया

रिश्ते बिना मुस्कान के। मामले ज़र, जोरू, ज़मीन, मकान और दुकान के। मुंसिफ़, मसाइलों से परेशान! जज, गगनचुम्बी फ़ाइलों से परेशान। बयान बाज़ नहीं आते हेराफेरी से। न्याय मिलता है मगर देरी से। यहां कोई भी तो किसी का नहीं है। झगड़े मिटाना ही तो सीखा नहीं है। ये मंडी है मृतप्राय मुंडों की। यहां गुपचुप गोपन गलियां हैं गुंडों की।


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खगोलकुंडा का कोहिनूर

सरकार बाहर से शासन देखती है और कोर्ट अंदर से। शायद सरकार नहीं चाहती, क्योंकि कोहिनूर से भाग्य और दुर्भाग्य की कहानियां जुड़ी हुई हैं। इसे रखने वाले पुरुष शासक नेस्तनाबूद हो गए, जबकि महिलाओं ने भरपूर शासन किए। बला दूर ही भली। आ गया, तो कहीं ले न जाय विपक्षी लली। सुप्रीम कोर्ट संभावना की खिड़की खुली रखना चाहता है।


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