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चौं रे चम्पू

राष्ट्रीय सहारा में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित

आंतरिक ऊष्मा की किरणें

आंतरिक ऊष्मा की किरणें

दोस्त, प्रियंकर बंधुसम, साथी, मन का मीत। हितू, हितैषी, शुभैषी, हमजोली, मनजीत!
संगी, संगतिया, सखा, सहचर, सखी, अज़ीज़। जिगरी, याड़ी, यार, या यारा मादक चीज़।
हितकामी स्नेही कहो, मितवा या कि हबीब, मित्र भले मिल ना सके, दिल के रहे क़रीब।


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खोपड़ी की खपरैल तले

खोपड़ी की खपरैल तले

—चौं रे चम्पू! सुनी ऐ कै तैनैं कोई कबता लिखी ऐ, दो अपरैल और नौ अपरैल के बारे में, का लिखी ऐ? —चचा, लिख दी, भेज दी, छप गई। ताज़ा कविता याद थोड़े ही रहती है। —अरे, हमेऊं बताय दै लल्ला! —चचा, कविता में पूछा गया था कि दो अप्रैल ग्यारह का इंडिया गेट और…


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झेल नहीं सकते तो घर बैठिए

झेल नहीं सकते तो घर बैठिए

—चौं रे चम्पू! तैंनै बगीची के पहलवानन कूं किरकिट कौ सौक लगाय कै बुरौ कियौ। जे कोई खेल ऐ? —क्या बात कर दी, चचा! क्रिकेट में सारी ज्ञानेन्द्रियों कीसहायता से मनुष्य का हर प्रकार का कौशल काम में आता है। आदमी बुलेट की तरह दौड़ता है। चील की नज़रों से कैच लेता है। बल्ला घुमाने से पहले सचिन की चौकसी देखी है? फील्डरज़मीन पर रगड़ते हुए या चार कलामुंडी खाते हुए बॉल को रोकता है। बल्ले के बादल से फिर भी रनों की बरसात होतीहै। ये खेल, खेलों का खेल है। खेलों का राजा है! —हट्ट परे! खेलन कौ राजा! खेलन की रानी हमारी हॉकी! वाय तौ…


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मीनाक्षियां और मसूराक्ष के मंसूबे

मीनाक्षियां और मसूराक्ष के मंसूबे

—चौं रे चम्पू! हर बखत काम, हर बखत काम! जे अच्छी बात नायं। कछू पल सकून के चौं नायं निकारै? —चचा एक हफ़्ते से भागम-भाग लगी है, इसमें तो कोई शक नहीं, पर सुकून मिला तब, जब आपकी बहूरानी ने एक कविता सुनाई। —अपनी लिखी कबता सुनाई का? —नहीं, अपनी नहीं सुनाई। इधर नागार्जुन का बड़ा हल्ला चल रहा है। जिधर देखो…


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अकादमिक अकड़ का अखाड़ा ऑक्सफोर्ड

अकादमिक अकड़ का अखाड़ा ऑक्सफोर्ड

—चौं रे चम्पू, तेरी यूके की जात्रा कैसी रई रे? —चचा सात दिन की यात्रा थी। सात लोग साथ में थे। सातजगह कार्यक्रम हुए। साथ में तुम्हारी बहूरानी भी थी तो ऐसाआनन्द आया जैसे सातवें आसमान पर कोई पहुंच जाए। बताने के लिए सात घंटे चाहिए। लिखने के लिए कम से कम सात अध्याय हों। —और सात जनमन तक सुनैं तेरी बातन्नैं! —सात जन्मों की क्या चलाई चचा, चलो अभी सात मिनिट हीकाफ़ी हैं। मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा आया ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में, क्योंकि वहां न जाने कितने जन्मोंकी शैक्षिक आत्माएं घूम-विचर रही   थीं। भटक रही थीं तो नहीं कह सकता, क्योंकि उनकीउपस्थिति से कोई बेचैनी नहीं हुई। उस इलाक़े में जाकरएक अलग तरह की अकादमिक शांति की अनुभूति हुई। —अरे हमारे तक्ससिला और नालन्दा कौ मुकाबलौ कोई करसकै का? —लेकिन जिस दुनिया को हम आधुनिक कहते हैं उसे बनाने मेंइस विश्वविद्यालय का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजी बोलनेवालों का ये सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। अजब तरह कावातावरण है। पूरा शहर जैसे किताबों में, शब्दों में और ज्ञान-विज्ञान में भी डूबा हुआ है और बीयर की दुकान पर चुस्की भी लगाता है। —बीयर की दुकान? —हां चचा, एक बड़ी दिव्य बीयर की दुकान देखी मैंने। बहुतपुरानी! सौ डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुरानी। छोटी सी जगह,पुराना फर्नीचर। कोई कुर्सी टूट भी जाती है तो नई कुर्सीबिल्कुल पुरानी जैसी ही बनाई जाती है। एक छोटा सा कमराहै जिसकी दीवारों और छतों पर फ्रेमबद्ध टाइयां टंग रही हैं। —टाइयां! कैसी टाइयां रे? —उन विद्यार्थियों की जो यहां से पढ़कर गए हैं। जाते-जातेनिशानी बतौर पब को अपनी टाइयां भेंट कर गए। हज़ारों टाइयां हैं। जिसकी टाई है, एक पर्ची पर उसका नाम भीनत्थी है। आज की नहीं हैं, सौ-पचास साल पुरानी हैं। भदरंगहो गई हैं। जिन कागज़ों पर नाम लिखे हैं, वे पीले पड़ चुकेहैं। लेकिन एक मधुर सा अहसास तो होता है कि ये हज़ारोंहज़ार टाइयां जिन गलों में बंधी होंगी, वे गले यहां स्वयं कोतर करने के लिए ज़रूर आते रहे होंगे। इस स्थान से उनकाप्रेम रहा होगा। पश्चिम की ये बात मज़ेदार है…


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शापग्रस्त पापग्रस्त समंदर खारे का खारा

शापग्रस्त पापग्रस्त समंदर खारे का खारा

—चौं रे चम्पू, जापान में तौ गज़ब है गयौ रे, का नई खबर ऐ? —खबरें तो अच्छी नहीं हैं चचा! नुकसान का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। छब्बीस दिसंबर दो हज़ार चार को हम भी अपने देश के दक्षिण में सुनामी का कहर झेल चुके हैं। जापान में तो दोहरी मार पड़ी। वहां भयंकर…


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फेस-संवर्धक केश-कर्तक नरेश

—चौं रे चम्पू, देर कैसे है गई! —चचा, महीने भर से बाल नहीं कटाए थे, आज सोचा तुम थोड़ा इंतज़ार कर लोगे और क्या! वहां बैठा तो पूरे दो घंटे निकल गए। —दो घंटा में बार कटे तेरे? —अरे चचा. एक बार उस दुकान में घुस जाओ तो दो घंटे लगना मामूली बात है। अब…


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यही प्रार्थना है और कुछ नहीं

यही प्रार्थना है और कुछ नहीं

—चौं रे चम्पू! का भयौ ओ अयोध्या में?

—बारह अक्टूबर इक्यानवै को, अयोध्या में तीन महान संगीतकारों, पं. भीमसेन जोशी, उस्ताद अमजद अली खां और उस्ताद अमीनुद्दीन खां डागर के साथ मैं भी गया था एक सद्भावना कार्यक्रम में। उसकी टेप मिल गई मुझे। बीस साल पुराना संगीत सुना, बातें सुनी।…


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डिजिटलन का खलबलन

डिजिटलन का खलबलन

—चौं रे चम्पू! तेरी कालौनी में कोई बाचनालय पुस्तकालय है कै नायं?
—चचा कम्युनिटी सैंटर में एक कमरा लायब्रेरी के नाम का बनाया गया है। किताबों के चार-पांच रैक हैं,पर वहां इक्का-दुक्का ही कोई आता है। अल्मारियां बन्द रहती हैं। दिलचस्पी न होने का एककारण यह भी हो सकता है कि जिस तरह की किताबों की ज़रूरत आजकल है, उस तरह की वहां मिलती नहीं। दूसरी वजह एक और है चचा।…


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बैनीफिट ऑफ डाउट

बैनीफिट ऑफ डाउट

—चौं रे चम्पू! जे किरकिट में अम्पायरन कौ का काम ऐ? —चचा अम्पायर का मतलब है साम्राज्य, और किरकिट का ये जो खेल है, वो है साम्राज्यवादी खेल। जनता के लिए गेट के बाहर अखाड़े और रजवाड़े के अंदर किरकिट के बाड़े। राजाओं ने ये खेल अपने लिए शुरू किया। चचा, मैदान में जब राजा…


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