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चौं रे चम्पू

राष्ट्रीय सहारा में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित

सज़ा न हो तो मज़ा न हो

  सज़ा न हो तो मज़ा न हो    —चौं रे चम्पू! जिन्दगी में मजा कैसै आवै? —चचा! मज़ा हमेशा सज़ा से आता है। अगर जीवन में कोई व्यक्ति, भाव अथवा पदार्थ आपको जाने-अनजाने सज़ा न दे, आप मज़ा नहीं ले सकते। सज़ाजन्य दुख के निराकरण के लिए मज़ा पैदा करना एकमात्र विकल्प होता है, ताकि हम दिए गए दुख से निजात पा सकें। —उदाहरन दैकै समझा। —अब इसे लतीफ़ा कहना या सच्चाई, एक नौजवान अपनी मोटरसाइकिल लेकर पैट्रोल पम्प पर पहुंचा और बोला कि पचास रुपए का पैट्रोल डाल दे। पैट्रोलकर्मी ने कहा कि भैया ढक्कन तो खोल। नौजवान बोला ढक्कन नहीं खोलूंगा। पैट्रोल को मेरी इस मोटरसाइकिल के ऊपर छिड़क दे औरइसमें दियासलाई लगा दे। मैं चला, नमस्ते। —वाह भई वाह! —ज़ाहिर सी बात है कि अब पैट्रोल की बढ़ती क़ीमतों के कारण वह अपना वाहन चलाने की सामर्थ्य खो चुका है। पैट्रोल-वृद्धि की सज़ा पर, इस प्रकरण से ज़्यादा मज़ेदार और क्या होगा? बताइए! हम हंस लिए। सोचते थे कि पैट्रोल की क़ीमत बढ़ जाएगी तो सड़क पर वाहन कम हो जाएंगे,लेकिन वाहन तो बढ़ते ही जा रहे हैं। यह दूसरी सज़ा है। तीसरी सज़ा यह कि वाहनों की बढ़त से, मौसम की मार से, सड़क के गड्डों से या नियमों के न-पालकों से लग जाते हैं जाम। जब जाम लग जाता है तो पैट्रोल की खपत बढ़ जाती है। आप नहीं चल रहे, आपकी गाड़ी का इंजन चल रहा है। पैट्रोल जल रहा है। गाड़ी पैट्रोल पी रही है। ऐसी स्थिति में आप क्या पिएं! —तसल्ली रक्खैं! अपने गुस्सा कूं पीमैं! —तसल्ली और ग़ुस्से के संतुलन के लिए मान लीजिए वे ऑफ़िस से लौटते समय आंग्ल-मदिरा शॉप से एक अद्धा ख़रीद कर लाए थे कि समय पर घर पहुंच जाएंगे तो जाम लगाएंगे। पर जाम तो यहीं लग गया। ये तो मैंने आपको बता ही दिया कि उनकी गाड़ी में सद्यःसृजित बाटलिपुत्र क्षेत्र था।बाटली के ढक्कन की चुन्नटें चटका कर और दो-चार घूंट गटका कर एक जाम में दो जाम का मज़ा लिया। पैट्रोल महंगा हो गया उसके बावजूद उन्होंने मज़ा लिया। —हम सुनि रए ऐं तौ हमैंऊं तौ मजा आय रह्यौ ऐ! —आगे और सुनिए। स्थाई जाम में फंसे पड़ौस के कार-चालक ने देखा कि बगल में दूसरा जाम-काण्ड चल रहा है। वे दरवाज़ा खोलकर निकल आए, बोले, मेरे पास दो ख़ाली गिलास हैं, नीट क्यों पी रहे हैं? मेरे पास सोडा भी है। जामवाद मैत्री बढ़ाता है। दूसरा व्यक्ति पहली गाड़ी में आ जाता है।जाम टकराए जाते हैं। अद्धा ख़ाली हो जाता है। श्रद्धा एक-दूसरे में बढ़ जाती है। सड़क का गड्डा नहीं भरता। जैसे-तैसे आगे वाली गाड़ियां सरकने लगती हैं। लेकिन पीछे वाली रुकी हुई हैं, क्योंकि उनके आगे के जाम में जामोत्सव चल रहा था।…


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गॉड को चाहिए थे आईपॉड और आईपैड

गॉड को चाहिए थे आईपॉड और आईपैड

गॉड को चाहिए थे आईपॉड और आईपैड   —चौं रे चम्पू! जे पतरी सी सिलेट-पट्टी सी का ऐ तेरे हाथ में? —स्लेट-पट्टी! ये बहुत अच्छा नाम दिया आपने इसका। इस स्लेट-पट्टी में आसमान के ग्रह-नक्षत्रों के दशलव-बिन्दु, बनती हुई छायाएं, बदलती हुई आकृतियां, दल के दल बादल, ज्ञान की हवा के झोंके, दोस्तों की दोस्तियां, लिखने की क़लम, संगीतकार के साज़, चित्रकार की कूची, फ़िल्मकार काकैमरा, विद्वानों के पुस्तकालय, कारीगर का छापाखाना, खेलने के मैदान, दिमाग़ी कसरत के अखाड़े, क्या नहीं है! —नाम का ऐ जा सिलेट-पट्टी कौ? —चचा इसको कहते हैं आईपैड-टू। अंग्रेज़ी में लिखो तो आई छोटी है और पैड की पी बड़ी है। जो आदमी अपनी ‘आई’ को, यानी अपने ‘मैं’ को छोटा रखे वह अपने पैड को बड़ा कर सकता है। यह कम्प्यूटर की दुनिया का आधुनिकतम उपकरण है। इसे बना कर नई पीढ़ियों को सौंपने वाला स्टीवजॉब्स नहीं रहा।                 —उमर का ई वाकी? —बिचारा पचपन-छप्पन की उम्र में ही चला गया। पचपन की उम्र में तो मैं लिख रहा था, ‘पचपन का है पर बचपन का हो ले, तेरा नवजीवन आया’। कम्प्यूटर की पायल बांध कर मैं बाल नृत्यगोपाल हो गया था। पिछले चार महीने से इस स्लेट-पट्टी को लेकर स्वयं को ब्रह्मांड का नागरिक माननेलगा हूं। आईपैड से पहले आईमैक, आईपॉड, आईफोन, आईट्यूंस, आईक्लाउड एपल तकनीक से बने। इतने सिमटे हुए आकार में उपभोक्ताओं को अकल्पनीय सुविधाएं परोसने वाला स्टीव जैसा कोई तकनीक-नियोजक अब तक दुनिया में नहीं हुआ। पूरी दुनिया ने उसका लोहा माना! कंपनियों नेसोना-चांदी काटी। —भौत अमीर ओ का? —सो तो था, पर ज्ञान का कारोबारी था। तपस्वी-मनस्वी था, यशस्वी था। कुंवारी मां की संतान था। जॉब्स दम्पति ने गोद लिया। जॉब्स एक मैकेनिक थे। स्टीव औपचारिक पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया। सोलह साल की उमर में निर्वाण की तलाश में नीब करौरी कैंची धाम वाले बाबा के पास आयाथा। उसको राधा-कृष्ण बहुत अच्छे लगते थे। बौद्ध धर्म से प्रभावित हुआ। भारत का आध्यात्मिक चिंतन उसको अद्भुत लगता था। यहां से जब वापस गया तो निर्वाण की नींव पर निर्माण में लग गया। एक ओर प्रेम, दूसरी ओर शांति, तीसरी ओर अपनी आई को छोटा रखना, ये भारत से सीख करगया था। फिर उसका आदर्श बना एडीसन, जिसने संसार में सर्वाधिक आविष्कार किए। अपने पिता के कारखाने में एक दोस्त के साथ…


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कटोरे की तरफ़ देखा तक नहीं

चौं रे चम्पू —चौं रे चम्पू! का सोच में पड़ौ ऐ रे? —चचा! मैं कुबेर जी के जाने के बाद उनकी पांच बिल्लियों के व्यवहार पर हैरान हूं। मीडियाकर्मी, कवि-लेखक, चित्रकार कुबेर दत्त विद्रोही स्वभाव के व्यक्ति थे। मेरे अनन्य! घनघोर प्रेम रखते थे, घनघोर शिकायतें भी। दिव्य होने के उपरांत रात के बारह बजे…


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जीने की हर अदा के शौकीन साठे जी

जीने की हर अदा के शौकीन साठे जी   —चौं रे चम्पू! ऐसौ कौन सौ दान ऐ जामैं तुमारौ कछू नुकसान नायं? —ज्ञान दान है चचा! देने से और बढता है और तुम्हारा उसमें कुछ जाता भी नहीं है। —नायं लल्ला! अज्ञानी कूं ज्ञान देऔगे तौ तुमारौ समय लगेगौ और ज्ञानी कूं ज्ञान की दरकार ई का ऐ?…


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स्तम्भ लेखन और बिन-बंधन लेखन

स्तम्भ लेखन और बिन-बंधन लेखन   –चौं रे चम्पू! तोय ‘चौं रे चम्पू’ स्थाई स्तम्भ लिखत भए कित्ते बरस है गए रे? —चार साल पूरे होने वाले हैं चचा। —स्तम्भ लिखिबे में और बिन-बंधन लिखिबे में का फरक ऐ? –स्तम्भ लेखन स्तम्भित किए रहता है। सहजता को पी जाता है। जो रचनात्मक साहित्य अपने आप निकलकर आता है, उसकी प्रक्रिया स्तम्भ-लेखन की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न होती है। वैसे ’बिन-बंधन’ आपने अच्छाशब्द-युग्म बनाया। बिन-बंधन-लेखन में हम संवेदनाओं और सजगताओं के आवेगों में स्वतःस्फूर्त लिखने…


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हिन्दी गाने फैले हिन्दी की गाने वाले नहीं

हिन्दी गाने फैले हिन्दी की गाने वाले नहीं   —चौं रे चम्पू! आज हिन्दी दिवस पै कित्ती जगै जायगौ भासन दैबे? —चचा, भाषण देते-देते भी एक ऊब सी हो गई है। हिन्दी के लिए रोने या गाने वाले लोग अब उदासीन पीठ पर बैठे हैं। सितम्बर में अचानक प्रेम उमड़ता है। अक्टूबर-नवम्बर में रामलीलाएं और लोकोत्सवधर्मिता! दिसम्बर आते-आते भूल…


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प्रेम घृणा में तब्दील न हो

प्रेम घृणा में तब्दील न हो   —चौं रे चम्पू! कोई नई अनहौनी भई होय सो बता। है कोई? —चचा, अनहोनियां होना तो प्रकृति का नियम है। भूमण्डल पर अनहोनियां न हों तो हमारा ह्रास या विकास कैसे हो! विकास कई बार ह्रास लगता है और ह्रास लगने जैसी अनहोनी में विकास के बीज छिपे…


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किसमें ताक़त है देश को जोड़ने की

किसमें ताक़त है देश को जोड़ने की   —चौं रे चम्पू! रामलीला मैदान में अन्ना के आन्दोलन के दौरान सबते अच्छी चीज का भई? —चचा! तुम सबसे बुरी बात सुनने को तैयार नहीं हो क्या? —ना! सबते बुरी सुनिंगे ई नायं! कोई नायं सुनैगौ। नक्कारखाने में तूती की आवाज है जायगी। तू तौ सबते अच्छी…


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अनाचारों के पिताजी हैं भ्रष्टाचार जी

अनाचारों के पिताजी हैं भ्रष्टाचार जी   —चौं रे चम्पू! अन्ना के आन्दोलन की ख़ूबी का ऐं रे? —ख़ामियां नहीं पूछोगे? —खामी हम सुनिंगे ई नायं! दिल की आग में दिमाग कौ घी मत डार। —चलो ख़ूबियां बताता हूं। पहली और सबसे बड़ी बात ये है चचा, कि आज़ादी के चौंसठ साल बाद, पहली बार…


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कल आज और कल का विवेक

कल आज और कल का विवेक   —चौं रे चम्पू! भिरस्ट कौन ऐ रे? —सब भ्रष्ट हैं। —तू भिरस्ट ऐ? —मैं मनुष्य हूं चचा। कोई देवता नहीं हूं। वेद-पुराण और हर धर्म का इतिहास देख लो, कभी न कभी, कहीं न कहीं दैवीय व्यक्तित्वों से भी चूक हुई है। ये बात दूसरी है कि उनकी…


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