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    जरुरी है एक जून की रोटी

    (एक जून की रोटी दो जून को दो बार मिले तो चेहरा खिले)

    गांव में अकाल था,

    बुरा हाल था।

    एक बुढ़ऊ ने समय बिताने को,

    यों ही पूछा मन बहलाने को—

    ख़ाली पेट पर

    कितनी रोटी खा सकते हो गंगानाथ?

    गंगानाथ बोला— सात!

    बुढ़ऊ बोला— ग़लत।

    बिलकुल ग़लत कहा,

    पहली रोटी खाने के बाद

    पेट खाली कहां रहा?

    गंगानाथ, यही तो मलाल है,

    इस समय तो

    सिर्फ़ एक रोटी का सवाल है।

    एक रोटी न मिले,

    तो चेहरा न खिले!

    मुरझा कर भूख की क़ब्र में समा जाएगा,

    या बेसब्र आवेश में तमतमा जाएगा।

    जवाब होगा जंग के जुनून का,

    एक रोटी से एक जून का।

    देखो, कामना नहीं है खोटी,

    ज़रूरी है एक जून की रोटी।

    जब पड़ते हैं इस रोटी के भी लाले,

    तो टूटने लगते हैं ज़बान के ताले।

    और फिर उसके बाद

    भरे हुए पेट को चाहिए

    महकता किचन,

    पुलाव बिरयानी मटन चिकन!

    नान परांठा रायता मटर बंदगोभी,

    दो बार दो जून को भी,

    गुलाबजामुन रबड़ी जलेबी के साथ!

    क्यों गंगानाथ?

    गंगानाथ की बढ़ गई हैरानी,

    मुंह में नहीं था लार का भी पानी।

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