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    युवा का उल्टा वायु

    (युवा हवाओं और धाराओं के विपरीत चलकर भी मंज़िल पाते हैं।)

     

    युवा का उल्टा वायु

    वायु माने हवा,

    हवा का उल्टा वाह

    बस यही युवा की चाह।

    चाहिए

    वाह, वाह, वाह।

     

    दिल के अरमानों के

    पंख निकल आए हैं,

    उड़ना सीख लिया है

    यों पर फैलाए हैं।

    बादल के ऊपर जो

    फैला नीलगगन है,

    उड़ने की मस्ती में

    मन हो रहा मगन है।

    अच्छा लगे न सूरज

    गर वो देता कोई सलाह।

    वाह जी

    वाह, वाह, वाह।

     

    धरती की गोदी से

    निकली तरुणाई है

    बाहर आकर खुल कर

    लेती अंगड़ाई है।

    संकल्पों की माला

    इसने आज पिरोई,

    बहता ये पानी है

    रोक न पाए कोई।

    मुश्किल है जो मंज़िल

    इसने पकड़ी है वो राह।

    बोलिए

    वाह, वाह, वाह!

     

     

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